REWA : कड़ी मेहनत और सच्ची लगन से ज्योति से कमाया बघेली में नाम, बड़े हिस्से में बघेली लोक संस्कृति को किया जा रहा पसंद



रीवा। जिस परिवार की कई पीढ़ियां शिक्षक के रूप में सेवाएं दे रही हों, वहां उसी क्षेत्र में बच्चों को भेजने की इच्छा परिवार की अधिक होती है। ऐसा ही लोक गायिका ज्योती तिवारी के साथ भी हुआ। परिवार के लोग चाहते थे कि पहले अच्छी पढ़ाई करें फिर कैरियर के बारे में सोचें। ज्योती का ध्यान संगीत के क्षेत्र में था, भोजपुरी, मैथिली कलाकारों की बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए बघेली लोकगीतों की प्रस्तुति बड़े मंचों पर दी तो इसे पसंद करने वाले काफी अधिक मिले। अब राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने का प्रयास कर रही हैं।

ऐसा रहा ज्योति का सफर 

ज्योती बताती हैं कि मेरा जन्म रीवा के छोटे से गांव टिकुरी में हुआ था। दो बहनों के बाद मैं तीसरे नंबर की थी और मुझसे छोटा एक भाई था । गांव के ही सरकारी स्कूल में मेरी शिक्षा दीक्षा हुई। उसके बाद माध्यमिक शिक्षा के लिए रीवा के मॉडल स्कूल में एडमिशन लिया था । मैं गांव में पहली लड़की थी जिसने मॉडल स्कूल जैसे रीवा शहर के प्रतिष्ठित स्कूल में एडमिशन लिया हो । हमारा गांव तो शहर से काफी नजदीक था लेकिन लोगों में अभी भी संपूर्ण जागरूकता का अभाव था। 

अभी भी लड़कियों की शिक्षा को प्राथमिकता में नहीं समझा जाता था । मेरे दादा सरकारी स्कूल में हेडमास्टर थे और मेरे पिताजी भी शिक्षक थे तो दोनों लोग शिक्षा के महत्व को समझते थे। पर मेरी विशेष रूचि संगीत मे थी, खासकर लोकगीतों में। मैं घंटों बैठकर अपनी दादी के साथ विंध्य क्षेत्र के प्रसिद्ध लोक गीतों के बारे में बातें करती रहती थी । शुरुआत में समस्याएं आई लेकिन बाद में संगीत के क्षेत्र में जाने के लिए घरवालों का मुझे पूरा सहयोग मिला । संगीत के क्षेत्र में शुरुआत मॉडल स्कूल से हुई और बाद में मंचीय कार्यक्रम होने लगे थे । ज्यादातर कार्यक्रम शाम को होते थे जिससे घर लौटने में देर रात हो जाती थी । 

गांव में अभी भी किसी लड़की का देर रात घर लौटना अच्छा नहीं माना जाता था । 
कई सारे लोगों ने नकारात्मक प्रतिक्रियाएं दी और कहा की लड़की है इस तरह रात में कार्यक्रम में जाना अच्छा नहीं है । ऐसा माहौल बन गया कि मेरा कार्यक्रमों में गीत गाना बंद हो जाएगा। लेकिन उस समय मेरे दादा ने काफी सपोर्ट किया और मेरी संगीत के क्षेत्र में सक्रियता बनी रही। कुछ ही दिनों बाद आकाशवाणी रीवा में बी ग्रेड में मेरा लोकगीत गायन में चयन हो गया था। जिस दौर में लोग फिल्मी गानों को ही भी सफलता की सीढ़ी मानते हैं उस दौर में बघेली लोकगीत गीत गाना काफी ज्यादा प्रेरित नहीं किया जाता है । लेकिन मेरी रुचि अपने बघेली लोकगीत गायन में सबसे ज्यादा की थी क्योंकि उसमें जो मिठास है अपने माटी की सुगंध है वो किसी भी फिल्मी गीत में नहीं मिल सकती है । मेरा मानना है कि लोकगीत गायन सिर्फ एक कला नहीं है बल्कि अपनी संस्कृति और सभ्यता को बचाने का एक अभियान भी है। मुझे लगता था कि अपने विंध्य और बघेलखंड की विरासत को राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचाने के कार्यक्रमों का आयोजन होना चाहिए था । कुछ दिनों बाद साल 2015 से विंध्य महोत्सव का आगाज हुआ था । कई चरणों की चयन प्रक्रिया के बाद विंध्य महोत्सव में मेरा चयन हुआ था और मैंने बघेली गीत सोहर गाई थी जिसे लोगों ने काफी पसंद किया था । उसके बाद कहीं जिला संभाग एवं राज्य स्तरीय प्रतियोगिता एवं कार्यक्रम में मैंने हिस्सा लिया था ।

तब जाकर मेरे गांव के कुछ लोगों और रिश्तेदारों में मेरे संगीत के प्रति सकारात्मक माहौल बनना शुरू हुआ था । तब से मुझे पूर्ण आत्मविश्वास हो गया कि बघेली को राष्ट्रीय स्तर पर जरूर ले जाऊंगी। 

फिर साल 2019 में राष्ट्रीय संगीत समारोह प्रतियोगिता सुर संगम का 31वां आयोजन जयपुर में होना तय हुआ था। जिला संभाग प्रदेश स्तर की चयन प्रक्रिया ओं के बाद लोक गीतों की सूची में मेरा चयन राष्ट्रीय स्तर पर हुआ और जयपुर में मुझे गाने का अवसर मिला। वहां हर राज्य के लोक गीतों का गायन हुआ और एक से बढ़कर एक लोक गीतों की प्रस्तुति हुई लेकिन यह मेरे लिए जीवन का सबसे गौरवपूर्ण क्षण था कि हमारे बघेली लोकगीत को राष्ट्रीय स्तर पर प्रथम पुरस्कार प्राप्त हुआ था । उस कार्यक्रम में बॉलीवुड की कई हस्तियां मौजूद थी। वहां कई लोग ऐसे थे जिन्होंने बघेली का पहली बार नाम सुना था लेकिन प्रथम पुरस्कार आने के बाद उनकी उत्सुकता बढ़ी और विंध्य क्षेत्र के बघेली लोक गीतों की धमक पूरे देश में लोगों ने जानी। 

फिर कुछ दिनों बाद गुजरात के सूरत में भी लोकगीत प्रस्तुति हुई थी। अब मेरे जीवन का सिर्फ एक ही उद्देश्य है कि अपने बघेली लोक गीतों को विश्व स्तर पर वैभवपूर्ण स्थान दिलाना है । आज भोजपुरी ,मैथिली आदि भाषाओं के लोकगीतों की लोग सराहना करते हैं लेकिन हमारे विंध्य क्षेत्र के बघेली लोक गीतों में जो मिठास है वह उसको सबसे अलग करती है और यही मिठास मुझे वैश्विक स्तर पर ले जाना है । मुझे गर्व है कि आज पाश्चात गीतों की संस्कृति में मैंने अपने मिट्टी की संस्कृति बघेली लोकगीतों का चुनाव किया है।

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