MP : कोरोना काल में तमाम फॉर्मूलों की रानी बनकर उभरी तुलसी : दामों में उछाल के साथ 300 रुपये किलो में बिक रही पत्तियां

इंदौर। कोरोना काल में आयुर्वेदिक औषधियों के प्रति लोगों के बढ़े रुझान के बीच तुलसी तमाम फॉर्मूलों की रानी बनकर उभरी है। तुलसी के दामों में सवा सौ फीसद तक उछाल आ चुका है। आयुर्वेद इंडस्ट्रिज चला रहे लोगों के मुताबिक लॉकडाउन के बाद से कच्चे माल के तौर पर तुलसी की मांग बढ़ी जो अब तक बरकरार है। तमाम औषधियों के बीच सबसे ज्यादा खपत का नतीजा है कि तुलसी के दाम बढ़ने के बाद नीचे नहीं आ रहे।

इंदौर व आस-पास आयुर्वेदिक औषधियों के निर्माण की करीब 80 ईकाईयां चल रही हैं। पूरे मप्र में 605 आयुर्वेद उद्योगों को औषधियों-जड़ी-बूटी प्रोसेसिंग के लायसेंस मिले हुए हैं। मप्र आयुष चिकित्सा परिषद के अध्यक्ष और सिंडिकेट हर्बल के प्रमुख राजेश सेठिया के अनुसार कोरोना महामारी का प्रकोप देश में आने के साथ ही आयुर्वेद के प्रति रुझान बढ़ा और साथ ही औषधियों की मांग भी।

सबसे ज्यादा मांग उन जड़ी-बूटियों की बढ़ी जिनका उपयोग काढ़े में हो रहा था या जो प्रतिरक्षा क्षमता बढ़ाने वाली मानी जाती है। तुलसी, काली मिर्च, दालचीनी, आंवला, अश्वगंधा से लेकर हर जड़ी-बूटी के दाम में उछाल भी आया। हालांकि समय के साथ फिर दाम कम भी हुए लेकिन तमाम जड़ी-बूटियों के बीच सबसे ज्यादा दाम बढ़े तो वो है तुलसी। सेठिया के अनुसार मार्च-अप्रैल तक तुलसी की पत्तियों के दाम 120 से 125 रुपए प्रति किलो तक थे। अब तुलसी पत्तियां 300 रुपए किलो के दाम में इंडस्ट्रीज को मिल पा रही है। इसकी खास वजह भी है। तुलसी का उपयोग कोरोना काल के बाद से लगातार बढ़ा है। दरअसल इम्युनिटी बूस्टर से लेकर कफ, खांसी, ज्वर तक की प्रत्येक औषधी में तुलसी का उपयोग हो रहा है। चाहे वो सिरप हो या गोलियां। लोगों के बीच तुलसी के अर्क के सीधे सेवन का चलन भी तेजी से बढ़ा है। इसी के चलते दाम में बढ़त बरकार है।

दूसरे नंबर पर गिलोय

तुलसी के बाद गिलोय दूसरी ऐसी जड़ी-बूटी है जिसके दाम में उछाल बरकरार है। सेठिया के अनुसार गिलोय के दाम अब 80 से 85 रुपए प्रतिकिलो है। पहले 40 रुपए किलो में गिलोय आनी से उपलब्ध हो जाता था। आंवला के दाम में भी उछाल आया है। 60 से 70 रुपए प्रतिकिलो बिकने वाला सूखा आंवला अब 100 रुपए किलो तक बिक रहा है।च्यवनप्राश के बढ़े उपभोग को इसकी वजह माना जा रहा है। हालांकि अब आंवले और गिलोय के दामों में थोड़ी कमी भी नजर आने लगी है। नीमच में जड़ी-बूटियों की सबसे बड़ी मंडी है। उसी मंडी से दाम भी तय हो रहे हैं।

90 देशों में निर्यात

आयुष चिकित्सा परिषद के अनुसार इंदौर के आस-पास ज्यादातर इंडस्ट्रीज ऐसी है जो तमाम जड़ी-बूटियों के अर्क और सत्व यानी एक्सट्रेक्ट का निर्माण करती है। दुनिया के 90 देशों में इन उद्योगों से माल निर्यात हो रहा है। एक्सपोर्टर और जीआर हर्बल के संचालक राहुल मारवाल के अनुसार जड़ी-बूटियों के एक्सट्रेक्ट की मांग सबसे ज्यादा साउथ अफ्रीका और आसपास के देशों से हैं। इसके साथ पाकिस्तान, श्रीलंका बांग्लादेश तक इंदौर और मप्र से माल जा रहा है। बॉम से लेकर ऑइल तक ये देश यहां से ही मंगवा रहे हैं। कोरोना काल का असर ये नजर आ रहा है कि इंदौर क्षेत्र में करीब 100 और नए उद्यमियों ने आयुर्वेद उद्योगों के लिए लायसेंस बनवा लिया है या प्रक्रिया कर रहे हैं।

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