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कविता- पिता जो थे..

अब भी अमिट है अंतस में जुग-जुग पुरानी वो बारहखड़ी जब घुप्प अंधेरे ही उछरते थे ढोर-डांगर ठाण से, घरर-घरर घट्टी से लगी छेड़ती थी मिसरी-सी प्रभाती पटेलन बुआ तो उठ खड़े होते थे पिता जो थे घर-भर के बाबा सा समेटकर कथरी-गोदड़ी चल पड़ते थे रोज़-रोज़ ही खेत-बाड़ी की जानी-बूझी पगडंडियों पर और लौटते टेम-बेटेम तो धक्क-से रह जाते कलेजे कि अब बस बरसेंगे सवाल- कौन कहां है? किसने क्या खाया रुच-रुच या बे-मन से? किसने क्या क्यों नहीं पीया? कौन रूठा पड़ा है सूनी गुवाड़ी में? ऐसे ही इस-उसके सुख-दुःख के बहाने बांच लेते अंगनाई में पनपते डाल-पातों का भविष्य। यों ही क्षितिज के उस पार निहारते चल पड़ते फिर से संघर्ष की अनथक यात्रा पर। ....अब जब-जब भी खुलते-जुड़ते हैं घर-कपाट यहां वह जानी-पहचानी आवाज़ बरबस कौध-सी उठती है भीतर ही भीतर कहीं गहरे में।


ग़ज़ल- मैले मन धो गए

खिड़की, दरवाज़ों, कुंदों पर बिंबित-से हो गए पिताजी। अब भी लगता है चुपके से धरती पर सो गए पिताजी।

धोखा, चोरी, झूठ, तकाज़े, दूर रहे सबसे हम अब तक, सीख-सिखावन रीति-नीति से नेह-बीज बो गए पिताजी।

बूझ लिया गर, ‘कैसे हैं जी?’ बोले, ‘बस है नहीं हिंडोला,’ इसी तरह हंसते-बतियाते मैले मन धो गए पिताजी।

मालिश-पट्टी, भाव-भजन सब ज्यों के त्यों ही धरे रह गए, आंखों ही आंखों के सन्मुख क्यों कैसे खो गए पिताजी।

भैया-भाभी लल्ला-लल्ली, रहे ताकते अपलक आतुर, पीछे मुड़कर देख न पाए, एक बार जो गए पिताजी।

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