ARYAN KHAN CASE : नशे के जाल में जकड़ती जा रही युवा पीढ़ी : बढ़ती ही जा रही तस्करी और सेवन की तादाद, सामाजिक चेतना से ही टूटेगा नशे का जाल

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नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी ) द्वारा मुम्बई में की गई ताजा कार्रवाई ने रेव पार्टियों के चलन के उस खतरनाक दौर को उजागर किया है, जो लगातार अनेक विकृतियों का सबब बनता जा रहा है। नशीले पदार्थों के उत्पादन से लेकर तस्करी और सेवन की तादाद बढ़ती ही जा रही है। सबसे बड़ी चिंता यह कि युवा पीढ़ी नशे के जाल में जकड़ती जा रही है। ऐसी पार्टियों को धनाढ््य वर्ग अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ता दिखे, तो यह चिंता और बढ़ जाती है। मुम्बई से गोवा जा रहे कू्रज में रेव पार्टी में मादक पदार्थों की सहज उपलब्धता और अभिनेता शाहरुख खान के बेटे आर्यन खान और अन्य की मौजूदगी बताती है कि बिगड़ैल रईसजादों को कानून का खौफ नहीं है। वहीं कानून की पालना कराने वाले भी आम तौर पर बेखबर ही रहते हैं।

एनसीबी कह रही है कि वह आर्यन व उसके साथियों के जरिए पेडलर यानी नशे की सप्लाई करने वालों तक पहुंचना चाहती है। वहीं आर्यन के वकील नया कुछ बरामद नहीं होने का हवाला देकर बचाव में जुटे हैं। बॉलीवुड में अभिनेताओं की बिगड़ैल संतानों का यह कोई अकेला उदाहरण नहीं है। कोई भी अभिभावक हमेशा यही चाहता है कि उसकी संतति ऐसा काम नहीं करे, जो समाज में बदनामी का कारक बने। चाहे मजाक में ही हो, शाहरुख खान खुद अपने बेटे के लिए अनैतिकता के तमाम दरवाजे खोलने पर खुश होने की बात कहते हों, तो भला सामाजिक दृष्टि से कौन इसका पक्ष लेगा? ले भी क्यों? हमारी संस्कृति में तो वर्ग-समुदाय में फर्क किए बिना बच्चों में संस्कार पिरोने के तमाम सूत्रों का उल्लेख है। देखा जाए तो भारतीय सिने जगत को समाज का दर्पण कहा जाता है। यानी हमारी नई-पुरानी पीढ़ी काफी कुछ सिनेमा से भी सीखती है। चाहे सुशांत सिंह राजपूत की मौत का मामला हो या नामी तारिकाओं के ड्रग्स सेवन करने वालों की सूची में आए नाम, बॉलीवुड में एक के बाद एक चेहरे नशे के धुएं में छिपे नजर आए।

यह केवल बॉलीवुड ही नहीं, पूरे समाज के लिए चिंता की बात है। चिंता इसलिए भी क्योंकि जहां भी धन का अकूत प्रवाह दिखता है, ऐसी ही रेव पार्टियों में युवा पीढ़ी नजर आती है। पंजाब, गोवा, मुंबई ही नहीं देश के हर कोने में राह से भटके युवाओं की फौज खड़ी होती दिख रही है। एनसीबी को चाहिए कि वह नशा माफिया की जड़ तक पहुंचे और इन्हें संरक्षण देने वालों को भी सींखचों के पीछे करे। कानून-व्यवस्था से परे यह मसला सामाजिक ताने-बाने से जुड़ा ज्यादा है। सामाजिक बदलाव के प्रयास राजनीति से दूर रखकर किए जाएं, तब ही बेहतर नतीजों की उम्मीद की जा सकती है।

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