कीजिये राम राजा के दर्शन ! ऐसे राजा जो राज महल से नहीं, बल्कि रसोई घर से देते है भक्तों को आशीर्वाद, जानिए इसके पीछे की धार्मिक मान्यता : इंदिरा गांधी को करना पड़ा था इंतजार

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दुनिया के लिए राम भगवान हैं, लेकिन ओरछा में राजा है। ऐसे राजा जो राज महल से नहीं, बल्कि रसोई घर से अपना राजपाठ चलाते हुए अपनी शरण में आए भक्तों को आशीर्वाद देते हैं। यह सुनकर आप चौंक सकते हैं, लेकिन यह हकीकत है। एक बार ओरछा के रामराजा के दर्शन करने आईं तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को भी पट बंद होने के कारण आधे घंटे इंतजार करना पड़ा था। ऐसी मान्यता है कि दीपावली पर भगवान राम दिन में ओरछा में वास करते हैं और रात्रि शयन अयोध्या में करते हैं। 

आचार्य राकेश अयाची ने बताया कि कथाओं के अनुसार, संवत् 1631 में ओरछा स्टेट के शासक मधुकर शाह कृष्ण भक्त तो उनकी रानी कुंवरि गणेशी रामभक्त थीं। राजा मधुकर शाह ने एक बार रानी कुंवरि गणेशी को वृंदावन चलने का प्रस्ताव दिया पर उन्होंने अयोध्या जाने की जिद की। राजा ने कहा था कि राम सच में हैं तो ओरछा लाकर दिखाओ। महारानी कुंवरि गणेशी अयोध्या गईं। वहां उन्होंने प्रभु राम को प्रकट करने के लिए तप शुरू किया। 21 दिन बाद भी कोई परिणाम नहीं मिलने पर वह सरयू नदी में कूद गईं, लेकिन भगवान श्रीराम बाल स्वरूप में उनकी गोद में बैठ गए।

भगवान ने ओरछा चलने को लेकर रखी थी तीन शर्तें

श्रीराम जैसे ही महारानी की गोद में बैठे तो महारानी ने ओरछा चलने की बात कह दी। भगवान ने तीन शर्तें महारानी के समक्ष रखीं।

पहली शर्त थी कि ओरछा में जहां बैठ जाऊंगा, वहां से उठूंगा नहीं।

दूसरी यह है कि राजा के रूप में विराजमान होने के बाद वहां पर किसी और की सत्ता नहीं चलेगी।

तीसरी शर्त यह है कि वह खुद बाल रूप में पैदल पुष्य नक्षत्र में साधु-संतों के साथ चलेंगे।

महारानी कुंवरि गणेशी की रसोई में भगवान को ठहराया गया था।

महारानी कुंवरि गणेशी की रसोई में भगवान को ठहराया गया था।

महल की बजाय रसोई में विराजे राजाराम

श्रीराम के ओरछा आने की खबर सुन राजा मधुकर शाह ने उन्हें बैठाने के लिए चतुर्भुज मंदिर का भव्य निर्माण कराया था। रानी चाहती थीं कि मंदिर ऐसी जगह हो कि महल से सीधे भगवान के दर्शन कर सकें, इसलिए चतुर्भुज मंदिर रानी के महल के ठीक सामने बनाया गया था। मंदिर को भव्य रूप दिए जाने की तैयारी के चलते महारानी कुंवरि गणेशी की रसोई में भगवान को ठहराया गया था।

भगवान श्रीराम की शर्त थी कि वह जहां बैठेंगे, फिर वहां से नहीं उठेंगे। यही कारण है कि उस समय बनवाए गए मंदिर में भगवान नहीं गए। वह आज भी सूना है और राजा राम महारानी की रसोई में विराजमान हैं। जहां वर्तमान में अलग मंदिर बनाया गया है। भगवान साढ़े 400 साल से रसाेई में ही विराजित हैं।

दिन में 4 बार गार्ड ऑफ ऑनर

आचार्य राकेश अयाची का कहना है कि ओरछा में रामराजा सरकार का ही शासन चलता है। चार पहर आरती होती है। सशस्त्र सलामी दी जाती है। राज्य सरकार द्वारा यहां पर सशस्त्र गार्ड तैनात किए गए हैं। मंदिर परिसर में कमरबंद केवल सलामी देने वाले ही बांधते हैं। इन जवानों को करीब दो लाख रुपए प्रतिमाह वेतन राज्य शासन की ओर से दिया जाता है। ओरछा की चार दीवारी में कोई भी वीवीआईपी हो, राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री हो, उन्हें सलामी नहीं दी जाती है। इन्हें सलामी वाले राम भी कहा जाता है।

इंदिरा गांधी ने किया था आधा घंटे इंतजार

31 मार्च 1984 में सातार नदी के तट पर चंद्रशेखर आजाद की प्रतिमा अनावरण कार्यक्रम के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ओरछा पहुंची थीं। वह मंदिर में दर्शन करने पहुंचीं, लेकिन दोपहर के 12 बज चुके थे। भगवान को भोग लग रहा था। पुजारी ने पट गिरा दिए थे। अफसरों ने पट खुलवाने की बात कही, लेकिन तत्कालीन क्लर्क लक्ष्मण सिंह गौर ने इंदिरा गांधी को नियमों की जानकारी दी। इसके बाद इंदिरा गांधी करीब 30 मिनट इंतजार करती रहीं।

रामराजा प्रांगण में सावन भादौ के दो खंभे

आचार्य राकेश अयाची ने बताया कि रामराजा प्रांगण में सावन भादौ के दो खंभे हैं, यह बड़े आश्चर्यजनक खंभे हैं। किवंदति है कि राजा वीर सिंह के समय में सावन भादौ नाम के दो प्रेमी-प्रेमिका थे। इस जोड़े की ऑनर किलिंग हुई थी, मरने के बाद भी लोगों ने इस जोड़े को आपस में मिलते हुए देखा है। इस प्रेमी जोड़े की याद में सूफी संत के कहने पर सावन भादौ नाम के दो मकबरे बनवाए गए हैं। ऐसा भी कहा जाता है कि यह आपस में मिल जाते थे पर अभी तक ऐसा किसी ने देखा नही हैं।

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