रीवा में युवा पीढ़ी इन दिनों डिप्रेशन की शिकार : बच्चों और युवाओं के अंदर बढ़ रही मोबाइल गेम की लत, हर माह 70 से अधिक मरीज आ रहे SGMH

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विंध्य रीजन की युवा पीढ़ी इन दिनों डिप्रेशन की शिकार है। आलम है कि रीवा जिले के बच्चों और युवाओं के अंदर सबसे ज्यादा मोबाइल गेम की लत बढ़ रही है। ऐसे में हर माह 70 से अधिक मरीज संजय गांधी स्मृति हॉस्पिलट (SGMH) के मानसिक रोग विभाग आ रहे है।

SGMH के मासिक रोग विभाग के सहायक प्राध्यापक डॉ. धीरेन्द्र मिश्रा ने बताया कि इन दिनों सबसे ज्यादा केस गेमिंग डिसआर्डर के आ रहे है। ये समस्या 15 वर्ष के किशोर से लेकर 21 वर्ष के युवाओं हैं। जो मोबाइल गेम की आदत से डिप्रेशन की बीमारी को बढ़ा रहे है।

आभासी दुनिया को मान रहे सच

विशेषज्ञों की मानें तो किशोर वर्ग मोबाइल गेम कि लत के कारण आभासी दुनिया को सच मानने लगते हैं। समय के साथ यह लत और बढ़ने लगती है। जब तक माता-पिता को आभास होता है। तब तक किशोर इसकी लत लग चुकी होती है। ऐसे में समय के साथ मरीज डिप्रेशन में चला जाता है।

बढ़ रहा चिड़चिड़ापन

गेमिंग डिसऑर्डर के शिकार लोगों का व्यवहार बदल रहा है। वह जरूरी काम को छोड़ गेमिंग में परेशान रहते है। ज्यादा गेम खेलने से दिमाग में परिवर्तन आ जाता है। जब गेम की लत से दूर किया जाता है तो उनमें चिड़चिड़ापन आ जाता है। साथ ही उनकी प्रवृत्ति हिंसक हो जाती है।

कैसे बचाएं गेम की लत से

चिकित्सकों का कहना है कि किशोर और युवाओं को गेमिंग डिसऑर्डर के शिकार ना हो, इसके लिए माता-पिता को जागरूक रहने की जरूरत है। किशोरों को जरूरत पड़ने पर ही फोन दे। प्यार से समझाएं। साथ ही परिवार में खो जाए, कुछ ऐसा करें। इसके अलावा आउटडोर गेम के लिए प्रोत्साहित करना जरूरी है।

चाइनीज कंपनियां कर रही युवाओं को टारगेट

विशेषज्ञों की मानें तो चाइनीज कंपनियां युवाओं को टारगेट कर रही है। मोबाइल गेम में किशोर और युवा ही होते हैं। गेम को इसी उम्र के लोगों को टारगेट करने से डिजाइन किया जाता है। जब किशोर गेम खेलते हैं तो उन्हें अंक दिए जाते हैं। जिससे उन्हें प्रोत्साहन मिलता है। जिससे गेम खेलने की रुचि बढ़ती है। इस आभासी दुनिया को किशोर वर्ग सच मानने लगता है।

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