अपना इंदौर : जानिए 1983 से साबूदाने की खिचड़ी का राज़ : कब से शुरू हुई खिचड़ी? क्या है साबूदाना खिचड़ी और कैसे होती है तैयार?

भिया थोड़ा नीम्बू और डालो... ऊपर से आलू का मिच्चर भी डाल दो... औरहां एक दो-मोटे वाले चिप्स के चम्मच और 1 हरी मिर्ची भी। यदि आप इस डायलॉग को सुनें तो समझ जाइए कि ये आदमी 100 परसेंट एक साबूदाने खिचड़ी के ठेले या दुकान पर खड़ा है। लगभग हर इंदौरी इसी तरह खिचड़ी के मोबाइल ठियों पर खड़ा गुहार लगाए रहता है। बहुत बोलने और बहुत खाने वाले शहर इंदौर की एक बेहद फेमस आइटम है (खाने की) साबूदाने की खिचड़ी। सिर्फ 20 रुपए में भूख मिटा देने वाला यह स्नैक सस्ता, सुलभ, टेस्टी और अनंतानंद देने वाला है। इंदौर वाले तो मानते हैं कि इसे तो मना करने पर भी पाप लगता है और उपवास कर रहा भी खुशी-खुशी इसे खाकर अर्चना का एक तरीका मानता है।

क्या है साबूदाना खिचड़ी और कैसे होती है तैयार?

1983 से इसे बना रहे सांवरिया खिचड़ी वाले बताते हैं कि साबूदाने को धोकर फिर उसे पीतल के बड़े भगोने में धीमी आंच पे पानी की भाप पर उबले हुए आलू और मूंगफली के दाने के साथ पकाया जाता है। जब भी कोई ग्राहक आता है तो उसके लिए ताजी खिचड़ी तैयार करते हैं, ऑर्डर के साथ ही सबसे पहले उसका होता है इंदौरीकरण! यानी मसालों का दौर...

सेंधा नमक, काला नमक, शक्कर बुरा, काली मिर्ची, अनार दाना, धनिया पत्ती, आलू का मिक्चर और नींबू निचोड़कर बनता है, यह अद्भुत स्वाद जो यह पढ़ते ही कइयों के मुंह में गंगा-जमुना ला देगा, ये मेरा दावा है ....फिर उसपे चम्मच का काम करते दिखाई देते 2 मोटे आलू के चिप्स उस पर लम्बी छरहरी हरी तली हुई मिर्च, आहाहाहा..... मिर्च से गार्निश पेपर की प्लेट में आई इस बेहतरीन स्वादिष्ट, पौष्टिक और कहने को फरियाली डिश से आपकी आत्मा तृप्त हो जाएगी, आप एक प्लेट और खाएंगे ये पक्का है।

अब इसकी कहानी, कब से शुरू हुई खिचड़ी?

फलाहार कब फरियाली हुआ और कब साबूदाने की खिचड़ी और बड़े बनने लगे ये शोध और विवाद का विषय हो सकता है... फिर भी हमने जांच -पड़ताल (रिसर्च) किया और वो ऐसा है... साबूदाना भारत में 1880 के करीब चावल के सब्सटीट्यूट के रूप में महाराजा त्रावनकोर के माध्यम से भारत आया था। पुर्तगाल, ब्राजील और चाइना तीन देशों से इसका आयात होता था। इसे सागू का दाना जो सगुदाना हुआ और अंत में अपभ्रंश होकर साबूदाना।

इंदौर में खिचड़ी...

वैसे साबूदाना की खिचड़ी घरों में व्रत के दौरान दशकों से बनाई जाती है, पर इंदौर में लगभग 80 साल पहले (आजादी के पहले) सराफे में बद्रीलाल जोशी जी ने पहला ठेला/ दूकान प्रारम्भ की। आज उनके पुत्र कमल किशोर व्यास बीते 30 सालाें से इसे उसी परम्परा के साथ चला रहे हैं।

सांवरिया सेठ की खिचड़ी

सराफे में ही सांवरिया सेठ की खिचड़ी बेहद पापुलर है इंदौर में...। सराफे में जैन मंदिर के पास सांवरिया सेठ की खिचड़ी नाम से फेमस इस ठिये ने साबूदाने की खिचड़ी को नयी पहचान दी है। 1 रुपए से शुरू हुई प्लेट आज 20 रुपए की है, सबसे फेमस स्वाद वाली खिचड़ी यहीं सराफे में मंदिर के सामने इनके ठेले पर मिलती है।

इंदौर में साबूदाने के फेमस ठिए

सांवरिया खिचड़ी सराफा, व्यास जी सराफा, गीता भवन चौराहा और लगभग 2000 से ज्यादा ठेलों पर ये जायका मिलता है। इंदौर में आने वालों के लिए खास टिप - आप इंदौर आएं तो भिया यह साबूदाना खिचड़ी जरूर-जरूर खाएं।

- समीर शर्मा, इंदौरवाले (9755012734)

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