Chunav side effects : MP में प्रिंटिंग इंडस्ट्री को बड़ा नुकसान; भोपाल में 1 करोड़ रुपए के कारोबार पर असर, रद्दी हुए पंपलेट्स फ्लेक्स और बैनर

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मध्यप्रदेश में पंचायत चुनाव कैंसिल होने से कैंडिडेट्स के सपनों पर पानी फिर गया है। प्रचार के लिए जो नए कुर्ते सिलवाए थे, उनकी कलफ भी नहीं निकल पाई तो पंपलेंट्स, फ्लेक्स और पोस्टर पर छपी खुद की तस्वीरें रद्दी बन गई हैं। इन्हें वापस लेने कैंडिडेट्स आ ही नहीं रहे हैं। ये कहानी भोपाल ही नहीं इंदौर, जबलपुर, ग्वालियर, रायसेन, अशोकनगर समेत सभी जिलों की है। पहले और दूसरे चरण के लिए ही 2 लाख से ज्यादा कैंडिडेट्स ने नामांकन भरे थे। इनकी प्रचार सामग्री अब प्रिंटिंग प्रेस पर ही रद्दी बन गई है। संचालक कैंडिडेट्स से सामग्री ले जाने की गुहार लगा रहे हैं, लेकिन कैंडिडेट्स यह कहकर मना कर रहे हैं कि अब यह सामग्री उनके कोई काम की नहीं है।

प्रदेश के भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, निवाड़ी, अलीराजपुर, पन्ना, नरसिंहपुर, हरदा और दतिया में एक ही चरण में वोटिंग होना थी। इसके लिए 20 दिसंबर तक नामांकन भरे गए थे। 23 दिसंबर को स्क्रूटनी की गई थी। पहले और दूसरे चरण के लिए 2 लाख 15 हजार कैंडिटेट ने फाॅर्म भरा था। वोटिंग से 10 दिन पहले चुनाव कैंसिल हो गए। ऐसे में पंच-सरपंच या जिला-जनपद सदस्य बनने का सपना देख रहे नेताओं के चेहरों पर मायूसी छा गई है। यही मायूसी अब प्रिंटिंग प्रेस के संचालकों के चेहरों पर भी नजर आ रही है।

चुनाव के कैंसिल होने की खबरों के चलते आए ही नहीं

चुनाव के कैंसिल होने की संभावना के चलते कैंडिटेट प्रिटिंग प्रेस पर छपवाने के लिए रखी चुनाव सामग्री लेने ही नहीं पहुंचे। हालांकि, एडवांस के तौर पर किसी ने 20% तो किसी ने 50% तक रुपए जमा करवाए थे। भोपाल के एमपी नगर जोन-1 स्थित प्रिंटिंग प्रेस संचालक आशीष दुबे ने बताया कि उनके यहां कई कैंडिटेट ने पंपलेट्स समेत अन्य सामग्री छपवाने के लिए दी थी, जो इसे लेने के लिए एक सप्ताह बाद भी नहीं आए। उन्होंने कहा कि कोरोना के चलते पहले ही कारोबार ठप रहा। चुनाव से उम्मीद थी, लेकिन सरकार की वजह से वह कैंसिल हो गए। अब बड़ा नुकसान हो गया।

भोपाल में 150 से ज्यादा प्रिंटिंग प्रेस

भोपाल जिले में 187 ग्राम पंचायतें हैं। यहां पंच-सरपंच के साथ बैरसिया-फंदा जनपद और जिला पंचायत सदस्यों के लिए चुनाव हो रहे थे। अधिकांश ने प्रिंटिंग प्रेस पर सामग्री छपवा ली। कुछ लेकर गए तो कुछ ने सामग्री उठाई ही नहीं, जो अब प्रिंटिंग प्रेस में ही रद्दी बन रही है। संचालक कैंडिटेट से गुजारिश कर रहे हैं, ताकि वे सामग्री ले जाएं, लेकिन कई कैंडिटेट ने कह दिया है कि चुनाव कैंसिल होने से अब सामग्री उनके लिए काम की नहीं है। जाहिर है कि यह सामग्री अब रद्दी में बिकेगी, जो नुकसान की भरपाई नहीं कर पाएगी।

भोपाल में 150 से ज्यादा प्रिंटिंग प्रेस हैं। यदि एवरेज 50% के हिसाब से एडवांस राशि जमा करवाई भी गई है तो लगभग 1 करोड़ रुपए का घाटा संचालकों को उठाना पड़ रहा है। चुनाव के चलते प्रति प्रिंटिंग प्रेस पर एवरेज 1 लाख रुपए का काम मिला था।

रायसेन में लाखों रुपए कर दिए खर्च

जिले के सांची ब्लॉक के वार्ड- 3 मेहगांव पंचायत से जिला पंचायत सदस्य के लिए पूजा राकेश चौकसे चुनावी मैदान में जोर-शोर से उतरी थीं। चुनाव निरस्त होने के बाद वे काफी निराश हैं। राकेश चौकसे ने बताया- सांची ब्लॉक के मेहगांव सामान्य महिला सीट से पत्नी पूजा चौकसे ने फॉर्म भरा था। वे नया घर बनवा रहे हैं, उसके लिए कुछ राशि जमा करके रखी थी। पत्नी चुनावी मैदान में उतरीं, तो उन्होंने यह राशि चुनाव प्रचार के लिए लगा दी। उन्होंने पोस्टर, बैनर, प्रचार रथ, डीजे पंपप्लेट आदि पर ढाई से तीन लाख रुपए खर्च कर दिए।

अशोकनगर में प्रिंटिंग प्रेस वालों का पैसा अटका

यहां पंचायत चुनाव के दौरान 23 दिसंबर को चुनाव चिन्ह आवंटित किए गए थे। उसके बाद से ही प्रचार सामग्री तैयार करवाने प्रत्याशियों ने प्रिटिंग प्रेस का रुख कर लिया था। ऑर्डर मिलते ही बैनर, पोस्टर और पंपप्लेट की छपाई रात-दिन जारी थी। ऐसे में कुछ प्रत्याशी तो अपनी सामग्री प्रचार के लिए ले गए, लेकिन अधिकतर उम्मीदवार असमंजस के बीच सामग्री को नहीं ले जा पाए। उम्मीदवारों ने किसी को 20 प्रतिशत तो किसी को 50 प्रतिशत राशि देकर बैनर पोस्टर बनवाए थे। मंगलवार को चुनाव रद्द होने की सूचना आई तो प्रिटिंग प्रेसवालों ने प्रत्याशियों को फोन घनघनाया, लेकिन कई ने तो फोन अटेंड ही नहीं किए।

प्रिंटिंग इंडस्ट्री के लिए बड़ा नुकसान

ऑल इंडिया फेडरेशन ऑफ मास्टर्स प्रिंटर्स (एआईएफएमपी) भोपाल के अध्यक्ष मनोज अग्निहोत्री कहते हैं कि लोकसभा, विधानसभा या नगरीय निकाय की तुलना में पंचायत चुनाव में सबसे अधिक उम्मीदवार मैदान में उतरते हैं। इस बार भी पहले-दूसरे चरण में ही प्रदेशभर में पंच, सरपंच, जिला-जनपद सदस्य के लिए करीब 2 लाख उम्मीदवार मैदान में उतरते। ऐसे में तहसील की प्रिटिंग में भी काफी काम होता है, लेकिन चुनाव कैंसिल हो गए और प्रिंटिंग से जुड़े काम नहीं हो सकेंगे।

इसलिए प्रिंटिंग पर ज्यादा जोर

गांव के चुनाव होते हैं, इसलिए पोस्टर, फ्लैक्स, बैनर आदि लगाए जाते हैं।

सबसे ज्यादा कैंडिडेट्स इसी चुनाव में मैदान में उतरते हैं। इसलिए तहसील की प्रिंटिंग प्रेस पर भी काम मिलता है।

इस चुनाव में खर्च को लेकर ज्यादा माॅनिटरिंग नहीं होती।

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