REWA : रीवा में 50 गायों की मौत का मामला सुर्खियों में : 260 गायों को दिनभर में सिर्फ खाने के नाम पर 30 KG भूसा, तड़पते हुए जो गाय एक बार बैठी, तो दोबारा उठ नहीं पाई

रीवा जिले के रायुपर कर्चुलियान ब्लॉक की चोरगडी गौशाला। ये गौशाला 50 से ज्यादा गायों की मौत के बाद सुर्खियों में है। दो दिन पहले ही चार से पांच गायों ने तड़प-तड़प कर दम तोड़ दिया। दो से तीन गायों की खाल तो बुधवार को ही निकाली गई। भूख से तड़पते हुए जो गाय एक बार बैठी, तो दोबारा उठ नहीं पाई। 100 मवेशियों की क्षमता वाली इस गौशाला में 250 गायें हैं। खाने के नाम पर इनके सामने दिनभर से सिर्फ 30 किलो भूसा डाला जाता है। यहां मौजूद हर गाय सिर्फ हडि्डयों का ढांचा भर हैं। लगता है जैसे, इन्हें मरने के लिए यहां छोड़ दिया है। 

बुधवार दोपहर 3 बजे। दोपहर के कारण गौशाला का स्टाफ नहीं था। यहां सिर्फ मवेशी भूख से तड़प रहे थे। शेड के अंदर दो खनौटे दिखे। एक में पानी, दूसरा खाली था। टीम गौशाला के पीछे तालाब पर पहुंची। बदबू इतनी कि एक मिनट रुकना भी मुश्किल था। तालाब के चारों तरफ गिद्ध और कौवे मवेशियों के शवों पर बैठकर दावत उड़ा रहे थे। गांव के कुत्ते भी मस्त घूमते हैं। यहां मवेशियों के कंकाल पड़े हैं।

थोड़ी ही दूर गड्‌ढा से भी बदबू आ रही थी। आगे गए तो हडि्डयां दिखीं। थोड़ा आगे घास के बीच 30 से ज्यादा गोवंशों की हडि्डयां पड़ी थीं। इसी तरह, वहां दो जगह ढेर लगे थे। दूसरे ढेर की तरफ भी 20 से ज्यादा गायों के कंकाल थे। वहीं, कुछ मवेशियों के शव पड़े थे, जिनकी मौत दो चार दिन में हुई थी।

तीन महीने में 75 से ज्यादा गायों की मौत

नाम न बताने की शर्त पर ग्रामीण ने बताया कि ठंड के मारे यहां एक दो गाय रोजाना मर रही है। गायों की खाल उतारने वाले व्यापारी के पास 75 से ज्यादा की खाल का स्टॉक है। गौशाला प्रबंधन गाय का शव उठाने के एवज में खाल और हडि्डयां दे देता है। बाकी रकम के नाम पर कुछ नहीं दिया जाता।

दिखाने के लिए रखा है 5 क्विंटल भूसा

वैसे तो गौशाला के अंदर 5 क्विंटल भूसा है, लेकिन वह सिर्फ दिखाने के लिए है। 250 गायों के सामने खाने के नाम पर 30 से 50 किलो भूखा डाल देते हैं। यानी एक गाय के हिस्से में दिनभर में 250 ग्राम भूसा भी नहीं आता। हालांकि, कुछ दिन पहले तक धान का पैरा था, अब वह भी नहीं है।

दो सेवक और तीन गोबर उठाने वाली महिलाएं, उन्हें भी वेतन नहीं

ग्राम पंचायत द्वारा देवशरण पटेल और रामदास पटेल को यहां नियुक्त किया है। इन्हें करीब एक साल से वेतन नहीं मिला। वहीं, अर्चना पटेल इन्हीं के घर की सदस्य है। उसे गोबर उठाने में लगाया गया है। इसी तरह, तीन महीने पहले उर्मिला साकेत और ममता साकेत को गोबर उठाने की जिम्मेदारी दी है। इन्हें रोजाना 200 रुपए मानदेय तय है, लेकिन तीन माह से वह भी नहीं मिला। इनकी ड्यूटी सुबह 10 से 12 बजे और शाम को 4 से 6 बजे तक रहती है। यहां कोई चौकीदार नहीं है।

तड़प-तड़प कर दम तोड़ रही गायें

यहां भूख, ठंड और समय पर इलाज नहीं मिलने से गायें तड़प-तड़प कर दम तोड़ रही हैं। प्रबंधक के नाम पर सचिव की नियुक्ति है, लेकिन वह भी ध्यान नहीं देता। दावा है कि बजट भी समय पर नहीं मिलता। सामाजिक संगठन और ग्रामीण भी मदद नहीं करते, बल्कि गौशाला का बोझ बढ़ाते हैं।

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