मुख्तार अंसारी की मुकम्मल कहानी : दबंगई की धुन और गुंडों के साथ ने बना दिया माफिया, जब श्रीप्रकाश शुक्ला से हुआ सामना....

उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में कई ऐसे नेता हुए जिन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी छाप छोड़ी है. चाहे आजादी के पहले का समय रहा हो या बाद का. लेकिन 70 के आखिरी दशक में सड़क और रेलवे के ठेकों की लड़ाई ने इस इलाके की फिजा खराब कर दी. इस इलाके में माफिया पैदा होने लगे. ठेकों की गारंटी पर पहले उन्होंने अपने आकाओं के लिए बंदूकें उठाईं. बाद में खुद राजनीति में उतर गए.

80 के दशक में माहौल बदल रहा था. पिछड़े पूर्वांचल में विकास के पैसे आने लगे थे. लेकिन रेलवे, सड़क, शराब, बालू खनन ही नहीं, टैक्सी स्टैंड तक के ठेके वही ले पाते थे जो बाहुबली होते थे. इलाके में शिक्षा का माहौल था लेकिन यहां से बेरोजगारों की फौज निकल रही थी. रोजगार की तलाश में हताश युवा कब किस माफिया के चंगुल में फंस जाए कोई नहीं जानता था. ऐसे लोग अपने आका के एक इशारे पर मरने-मारने को तैयार थे. कट्टा रखना शान समझा जाता था. कई लोग साइकिल पर बंदूकें लेकर चला करते थे.

पूर्वांचल का ही एक जिला है गाजीपुर. कहा जाता है कि यहां अफीम, अपराधी और अफसर साथ-साथ पैदा होते हैं. यह भूमिहार बहुल इलाका है, कुछ लोग इसे 'भूमिहारों का वेटिकन' भी कहते हैं. बनारस यहां से करीब है और कहा जाता है कि गाजीपुर वालों को बनारस में ही सबकुछ मिलता है, केवल गुंडई छोड़कर. इसकी ट्रेनिंग यहीं मिल जाती है. पुराने लोगों को हत्याओं की कहानी जुबानी याद रहती हैं. चाय-पान की दुकानों पर चर्चा राजनीति से शुरू होती है लेकिन खत्म अपराध की कहानी पर ही होती है.

गाजीपुर के ही युसुफपुर-मुहम्मदाबाद में 1963 में मुख्तार अंसारी का जन्म हुआ. उनके दादा आजादी के आंदोलन में भाग ले चुके थे और परिवार इलाके के इज्जतदारों में गिना जाता था. लोग अपनी समस्याएं लेकर 'फाटक' पहुंचते थे. मुहम्मदाबाद स्थित मुख्तार का घर आज भी फाटक के नाम से जाना जाता है. कुछ लोग इसको 'बड़का फाटक' भी बोलते हैं. मुख्तार मजबूत कद-काठी और दबंग स्वभाव के थे. उन्हें करीब से जानने वाले कहते हैं कि बचपन से ही वह मनबढ़ थे. वह जो कहें वही हो यह उनके स्वभाव में था. वह अपनी क्लास में सबसे लंबे थे. क्रिकेट-वॉलीबॉल से लेकर हॉकी में रुचि रखते थे. निशानेबाजी उनका शौक रहा.

मुख्तार का हनुमान गेयर

गाजीपुर के वरिष्ठ पत्रकार राजकमल बताते हैं कि इंटर की पढ़ाई के बाद मुख्तार ने गाजीपुर के पीजी कॉलेज में दाखिला लिया. वहां उनकी दोस्ती हुई साधू सिंह से और मकनू सिंह दोनों सगे भाई थे. दोनों गोरखपुर के बड़े ब्राह्मण नेता के लिए काम करते थे. जिनकी अदावत ठाकुर माफिया से थी. ब्राह्मण और ठाकुर माफिया रेलवे के ठेके के लिए एक-दूसरे से भिड़ते रहते थे. उस दौरान पूर्वांचल के गोरखपुर और आसपास के जिलों में आए दिन गोलियां चलती थीं. साधू सिंह की संगत से मुख्तार को मंजिल दिखने लगी. उन्हें लगने लगा कि अगर लंबा रास्ता तय करना है तो 'बाहुबली' बनना पड़ेगा. चाहे इसके लिए कुछ भी करना पड़े. मुख्तार का तकिया कलाम बना 'हनुमान गेयर'. किसी भी तरह का काम हो अगर मुख्तार को पसंद आ गया तो वह कहते रहे हैं कि हनुमान गेयर लगावत हईं, (यानी हनुमान गेयर लगा रहा हूं). अभी भी कहते हैं कि हनुमान गेयर लगाना पड़ेगा. हनुमान गेयर यानी साम दाम दंड भेद से यह काम करना है. दूसरा गुट अपने आका को यही बताता है कि अरे वहां तो हनुमान गेयर लगा है.

सच्चिदानंद राय की हत्या-मुख्तार का नाम

80-90 के दशक में गाजीपुर जिले की एक और खासियत थी. राज्य हाइवे से सरकारी बसें इस जिले को पार करके चला करती थीं. जैसे बनारस-गाजीपुर-गोरखपुर. बलिया-गाजीपुर-बनारस लेकिन किसी सरकार में इतना दम नहीं था कि वह गाजीपुर के इंटरनल इलाकों से सरकारी बसें मुख्यालय तक चला ले. इन सारे रूटों पर माफिया का कब्जा था जो अपने-अपने बेड़े की बसें चलवाते थे. इसे जनता का भी समर्थन मिलता था, क्योंकि बसों की टाइमिंग फिक्स थी, मुहम्मदाबाद से गाजीपुर, बनारस के लिए बस कितने बजे चलेगी, कब पहुंचेगी, कहां-कहां कब रुकेगी यह तय था. लोग बताते हैं कि इनकी लोकप्रियता इतनी थी कि लोग इससे घड़ी मिलाने की बात करते थे. सच्चिदानंद राय भी दबंग किस्म के थे. उनसे जुड़े लोगों की बसें मुहम्मदाबाद से चलती थीं. बताया जाता है कि मुख्तार से जुड़े लोग भी इस कारोबार में थे. किसकी बस कब निकलेगी इसको लेकर विवाद हो गया. सच्चिदानंद राय वहां मौजूद नहीं थे. मुख्तार भारी पड़ गए. सच्चिदानंद को यह नागवार गुजरा. कहा जाता है कि फनफनाए सच्चिदानंद मुख्तार के घर 'फाटक' तक चढ़ गए. मुख्तार ने इसे प्रतिष्ठा का सवाल बना लिया. कुछ दिन बाद ही सच्चिदानंद राय की हत्या हो गई. नाम मुख्तार का आया लेकिन कुछ साबित नहीं हो सका. इससे पहले शूटर माला गुरु की हत्या में भी नाम लिया गया था लेकिन सच्चिदानंद की कहानी बड़ी हो गई. एक-एक कर ऐसी कहानियां जुड़ती गईं और मुख्तार माफिया की नगरी में 'बड़े' होते गए.

ब्रजेश सिंह बनाम मुख्तार


मुख्तार और ब्रजेश सिंह के रास्ते पहले अलग-अलग थे. दोनों की कोई निजी दुश्मनी नहीं थी. लेकिन साधू सिंह मुख्तार के संघी थे, उस इलाके में खास दोस्त को संघी कहते हैं. साधू सिंह के परिवार की दुश्मनी एक जमीन के टुकड़े को लेकर ब्रजेश सिंह के परिवार से हो गई. इस लड़ाई में साधू सिंह के गैंग के पांचू सिंह ने ब्रजेश सिंह के पिता वीरेंद्र सिंह की हत्या कर दी. साधू सिंह की संगत की वजह से ब्रजेश सिंह मुख्तार को दुश्मन मानने लगे. अदावत बढ़ती गई. मुख्तार ठेका-पट्टी में तेजी से अपना पैर फैलाते जा रहे थे. उधर ब्रजेश बदले की आग में जल रहे थे. आजमगढ़ के तरयां में एक ही दिन 7 लोगों की हत्या कर दी गई. इसमें ब्रजेश सिंह का नाम आया. वह ठाकुरों की आपस की लड़ाई थी. लेकिन इस हत्याकांड के बाद यह तय हो गया कि पूर्वांचल में दो ही लोगों की दबंगई चलेगी. एक गुट मुख्तार के साथ जुड़ गया तो दूसरे ने ब्रजेश सिंह की शरण ली. अब ठेका नाक का सवाल बन गया. ब्रजेश सिंह साहिब सिंह की सरपरस्ती से अलग होकर खुद मैदान में उतर चुके थे. पुलिस उन्हें खोज रही थी लेकिन उसके पास कोई फोटो नहीं थी जिससे ब्रजेश की पहचान हो सके. कहा जाता है कि बनारस से इलाहाबाद की तरफ ब्रजेश भारी पड़ते और बनारस से गाजीपुर-मऊ की तरफ मुख्तार. ऐसे में गैंगवार लाजमी था और इसमें कई लोगों की जानें गईं. साधू सिंह को पुलिस कस्टडी में मार दिया गया. हत्यारे पुलिस की वर्दी में आए थे, आरोप ब्रजेश सिंह पर लगा. साधू अपनी पत्नी और नवजात बच्चे को देखने हॉस्पिटल आए थे पुलिस कस्टडी में ही उन्हें मार दिया गया. हत्यारे पुलिस की वर्दी में थे, आरोप ब्रजेश सिंह पर लगा. उसी दिन साधू सिंह के गांव मुदियार में हमला हुआ और उनके भाई और मां समेत 8 लोगों की निर्मम हत्या कर दी गई. इस हमले में कुल 21 लोग घायल हुए थे

भाई विधायक बना-मुख्तार महत्वाकांक्षी

मुख्तार का परिवार कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़ा था. उनके पिता सुभानुल्लाह अंसारी भी राजनीति में दखल रखते थे. मुख्तार के बड़े भाई अफजाल ने उसे आगे बढ़ाया और 1985 में पहली बार कम्युनिस्ट पार्टी से विधायक चुने गए. सीट थी गाजीपुर की मुहम्मदाबाद. कांग्रेस के दौर में भाई को चुनाव जिताने में मुख्तार का बड़ा हाथ माना गया. इसके बाद मुख्तार की राजनीतिक महत्वाकांक्षा हिलोरे मारने लगी. मुख्तार अब अपनी छवि चमकाने में लग गए. गाजीपुर में उस समय हैंडलूम का काम भी प्रमुखता से होता था. लेकिन बिजली की समस्या थी. मुख्तार ने इसे मुद्दा बना लिया. उन्होंने अफसरों पर दबाव बनाया कि उन्हें तय करना होगा कि इलाके में बिजली कितने घंटे आएगी. इसका असर दिखने लगा. लोगों को लगने लगा कि मुख्तार उनके लिए लड़ सकते हैं. 'फाटक' पहुंचने वालों की संख्या बढ़ने लगी.

जब पहली बार सजा विधायकी का ताज

मुख्तार गाजीपुर में ही किसी सीट से विधायकी का चुनाव लड़ना चाहते थे लेकिन बात बैठ नहीं रही थी. उन्होंने बीएसपी का दामन थाम लिया. मायावती ने उन्हें 1996 में मऊ से मैदान में उतरने का आदेश दिया. मऊ की सीट मुस्लिम बहुल है और यह मुख्तार के लिए वरदान साबित हुई. मुख्तार 96 में पहली बार बीएसपी से विधायक चुने गए. इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा. तब से 2017 तक वे लगातार यहां से चुने जाते हैं. पहली बार चुनाव जीतने के बाद दुनियादारी का दायरा उन्होंने थोड़ा और बढ़ा लिया. जब मुहम्मदाबाद में 24 घंटे लाइट रहती तो लोग अंदाज लगा लेते कि मुख्तार शहर में हैं. कहा जाता कि लखनऊ से निकलने के पहले वह बिजली विभाग के अधिकारियों से यह मुकर्रर करा लेते कि बिजली नहीं कटनी चाहिए. फिर 'फाटक' पर दरबार लगता. झगड़े में फंसी जमीनें हों, पार्टनरशिप का विवाद हो, शादी करके भी कोई लड़का लड़की को रखने को तैयार न हो, किसी की बेटी की शादी पैसों की वजह से न हो रही हो, किसी ने किसी की जमीन पर कब्जा जमा लिया हो, पीएचसी पर डॉक्टर न आ रहा हो, कोई सड़क न बन रही हो. सरकारी महकमे के लोग किसी को परेशान कर रहे हों, किसी दफ्तर में किसी का काम न हो रहा हो तो लोग फाटक पहुंचते. मुहम्मदाबाद के ही एक बुजुर्ग बताते हैं कि मुख्तार के 'कारिंदे' शहर में घूमा करते थे. किसी के सताए लोग उनसे आसानी से संपर्क कर लेते. फैसला फाटक पर होता और वहीं से फरमान जारी हो जाते. समझाया प्यार से ही जाता लेकिन सामने वाले को पता होता कि ना मानने के नतीजे क्या होंगे.

786 नंबर की गाड़ियां और 'एक्सपर्ट' ड्राइवर

मुख्तार को एसयूवी का शौक रहा. उनके एसयूवी के बेड़े में कई गाड़ियां होती थीं. उन गाड़ियों की सीरीज कोई भी हो लेकिन आखिरी नंबर 786 हुआ करता था. कई लोग तो यह भी बताते हैं कि मुख्तार किस गाड़ी में बैठे हैं इसका अंदाजा लगाना मुश्किल होता था. मुख्तार और उनके लोगों को करीब से जानने वाले बताते हैं कि मुख्तार की गाड़ी या उनके काफिले की गाड़ी का ड्राइवर बनना आसान नहीं था. ड्राइवर वही बन सकता था जो दुश्मनों को दूर-दूर से पहचानता हो और किसी भी रास्ते से गाड़ी निकालने में एक्सपर्ट हो.

श्रीप्रकाश शुक्ला से सामना

गाजीपुर-बनारस इलाके से जुड़े पुराने पत्रकार बताते हैं कि 1995-96 में श्रीप्रकाश शुक्ला अपराध की सीढ़ियां तेजी से चढ़ रहा था. बहन से छेड़खानी करने वाले की हत्या कर वह बैंकॉक भागा फिर लौटा तो गैंगस्टर बनकर. उसकी उम्र कोई 22-24 साल रही होगी. उसे बिहार के माफिया सूरजभान की सरपरस्ती मिल गई. इसके बाद वह ठेके पट्टे, रंगदारी, फिरौती, हत्या की सुपारी जैसे कामों में लग गया. वह मान बैठा था कि अगर तेजी से नाम कमाना है तो बड़े बरगदों को गिराना होगा. उसने हरिशंकर तिवारी को धमकी दे दी जो बड़े नाम के साथ विधायक भी थे.

कहा जाता है कि तिवारी श्रीप्रकाश शुक्ला के मामा को साथ लेकर घूमने लगे ताकि वह गोली न चला सके. तिवारी की पुरानी अदावत वीरेंद्र प्रताप शाही से थी. दोनों के बीच खूनी गैंग में पूर्वांचल कई बार थर्राया, कई लाशें गिरीं. लेकिन 90 के आखिरी दशक में दोनों को स्थायित्व मिल गया था. राजनीति में सक्रिय होने के बाद अब उस तरह की अंधेरगर्दी हो भी नहीं सकती थी. हरिशंकर तिवारी तो बच गए लेकिन वीरेंद्र शाही को श्रीप्रकाश शुक्ला ने लखनऊ में दिनदहाड़े गोलियों से भून दिया. इसके बाद बिहार के मंत्री बृजविहारी प्रसाद की उसने हत्या कर दी. उसका अंदाज देखकर बड़े से बड़े माफिया डर गए. बताया जाता है कि लखनऊ में एक बार मुख्तार का काफिला निकला लेकिन कुछ दूर जाते ही श्रीप्रकाश शुक्ला को मुख्तार के ड्राइवर ने पहचान लिया. इसके बाद से गाड़ियां वहां से निकलीं और सीधे फाटक पर आकर रुकीं. श्रीप्रकाश शुक्ला के एनकाउंटर तक तूफान से पहले की शांति बनी रही.

मुख्तार पर हमला

मुख्तार 1996 में मऊ से बीएसपी के विधायक चुन लिए गए थे. 15 जुलाई 2001 को मुख्तार का काफिला मऊ से मुहम्मदाबाद के लिए निकला. विरोधियों ने पहले से तैयारी कर रखी थी. उसरी चट्टी में ट्रक पर सवार हमलावरों ने मुख्तार को टारगेट करके गोलियां बरसानी शुरू कर दीं. इसमें मुख्तार के सरकारी गनर और प्राइवेट गनर समेत 3 लोग मारे गए. कहा जाता है कि मुख्तार की गाड़ी से गोली चली और हमलावरों में से एक मनोज राय वहीं ढेर हो गया. बिहार का मूल निवासी मनोज राय बनारस में रहता था और गायकी में उभर रहा था. मुख्तार के जानी दुश्मन ब्रजेश सिंह और त्रिभुवन सिंह के खिलाफ इस मामले में नामजद रिपोर्ट दर्ज कराई गई. यह मामला अब भी चल रहा है. कहा जाता है कि इस वाकये के बाद ही ब्रजेश सिंह ने इलाका छोड़ दिया और फिर मुंबई पहुंचा. वहां सुभाष ठाकुर और इसके बाद दाऊद से मिला. दाऊद के जीजा की हत्या का बदला लेने के लिए जेजे हत्याकांड हुआ, जिसमें ब्रजेश का नाम आया. ब्रजेश सिंह को 2008 में ओडिशा से गिरफ्तार किया गया.

कृष्णानंद ने ध्वस्त किया अफजाल का किला

हमले के बाद गैंगवार होना तय था. उधर, गाजीपुर में एक नया लड़का अपनी जगह बना रहा था नाम था कृष्णानंद राय. ब्रजेश अमूमन भूमिगत रहकर काम करता था. उसे एक चेहरे की जरूरत थी जिसकी कमी कृष्णानंद राय ने पूरी की. ब्रजेश को यह यकीन था कि अगर मुख्तार को कमजोर करना है तो उनकी राजनीति खत्म करनी होगी. मुस्लिम बहुल मऊ में यह संभव नहीं था जहां से मुख्तार जीतते थे. लेकिन मुहम्मदाबाद से लगातार चुने जाते रहे उनके भाई अफजाल को घेरना आसान था क्योंकि वहां मुस्लिम आबादी 10 फीसदी ही थी. कृष्णानंद राय ने यहीं से मुख्तार के परिवार को चुनौती दे दी. 2002 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने अफजाल अंसारी को हरा दिया और बीजेपी विधायक चुने गए.

मुख्तार और एलएमजी कांड

2002 में मुख्तार मऊ से विधायक चुन लिए गए. उन्होंने खुद पर हुए हमले से सहानुभूति बटोरने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी. तब मोबाइल और वीडियो रिकॉर्ड करने का जमाना नहीं था. वह छोटी मोटी सभाओं में कहा करते कि भूमिहारों और सवर्णों से मेरी कोई दुश्मनी नहीं है. हमारा परिवार तो इन्हीं के बल पर हमेशा चुनाव जीतता रहा है. लेकिन आप लोगों ने देखा कि मेरी दुश्मनी किससे है. अगर मुझे जिंदा रहना है तो कुछ न कुछ तो करना पड़ेगा. उधर, कृष्णानंद राय बुलेट प्रूफ गाड़ी से चला करते थे. उन्हें ब्रजेश का बैकअप था. उधर, आरोप लगा कि मुख्तार सेना के एक भगोड़े से एलएमजी खरीदने की जुगत में लगे हैं. उन पर पोटा के तहत केस दर्ज करने वाले एसटीएफ में डिप्टी एसपी शैलेंद्र सिंह ने दावा किया कि उन्होंने मुख्तार को यह कहते हुए सुना था कि कृष्णानंद राय की बुलेट प्रूफ गाड़ी सामान्य राइफल से नहीं भेदी जा सकती इसलिए एलएमजी का इंतजाम करना है. इसके लिए 1 करोड़ में सौदा तय हो रहा था. शैलेंद्र सिंह ने केस तो दर्ज कर एलएमजी भी बरामद कर ली लेकिन मुख्तार को गिरफ्तार करने की हसरत अधूरी रह गई. उन पर इतने दबाव पड़े कि उन्हें इस्तीफा देना पड़ा. उन पर मुकदमे भी लाद दिए गए. अब योगी सरकार ने उन पर लगे मुकदमे वापस लिए हैं, लेकिन नौकरी की अवस्था वह पार कर चुके हैं. इसलिए बहाली पर विचार नहीं हो पाया.

कृष्णानंद राय की हत्या

2002 में विधायक चुने जाने के बाद कृष्णानंद राय की पब्लिक डीलिंग बढ़ गई थी. कहीं न कहीं उन्हें यह लगने लगा था कि चुने हुए जनप्रतिनिधि पर हमला करना आसान नहीं होगा. इससे भी बड़ी बात यह थी कि 2005 में मुख्तार पर मऊ में दंगा कराने के आरोप लगे थे. भरत मिलाप पर हुए पथराव के बाद शुरू हुई हिंसा में कई लोग मारे गए थे. कुछ फुटेज में दावा किया गया था मुख्तार खुली जिप्सी में घूमकर एक पक्ष को दूसरे के खिलाफ भड़का रहे हैं. हालांकि उनका कहना था कि वह लोगों को समझा रहे थे. मुख्तार निर्दलीय विधायक चुने गए थे, पर सपा सरकार का बरदहस्त हासिल था. राज्यपाल राजेश्वर राव के मऊ दौरे के बाद मुख्तार पर शिकंजा कस गया. मुख्तार ने 25 अक्टूबर 2005 को समर्पण कर दिया और गाजीपुर जेल चले गए. मुख्तार के जेल जाने के बाद कृष्णानंद और लापरवाह हो गए. गाहे बगाहे वह बिना बुलेटप्रूफ गाड़ी के भी निकल जाते.

29 नवंबर 2005 को उन्हें करीमुद्दीनपुर इलाके के सेनाड़ी गांव में एक क्रिकेट मैच का उद्घाटन करने जाना था. हल्की हल्की बारिश हो रही थी. वह बुलेटप्रूफ गाड़ी छोड़कर सामान्य गाड़ी में चले गए. इसकी मुखबिरी हो गई. शाम 4 बजे के आसपास जब वह अपने गांव गोडउर लौट रहे तो बसनियां चट्टी पर उन्हें घेर लिया गया और एके-47 से अंधाधुंध फायरिंग की गई, तकरीबन 400 गोलियां चलाई गईं. कृष्णानंद समेत 7 लोग मारे गए. कृष्णानंद राय के शरीर से 67 गोलियां निकाली गईं. यह सामान्य हत्या नहीं थी. यह बताने के लिए था कि आपके इलाके में आपके लोगों के बीच घुसकर मारा है. कृष्णानंद राय की चुटिया उस समय फेमस हो चुकी थी. कहा जाता है कि हमलावरों में से एक हनुमान पांडेय ने उनकी चुटिया काट ली थी. बाद में उसी दौरान का एक ऑडियो सामने आया जिसमें मुख्तार जेल से ही एक माफिया से बात कर रहे हैं और बता रहे हैं चुटिया काट लिहिन.

कृष्णानंद राय की हत्या के बाद पूर्वांचल जल उठा. बसें फूंकी गईं, सरकारी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया गया. बीजेपी के कद्दावर नेता राजनाथ सिंह ने मुलायम सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. हाई कोर्ट के आदेश पर जांच सीबीआई को सौंपी गई. राय की पत्नी अलका राय की याचिका पर केस दिल्ली ट्रांसफर किया गया लेकिन सबूतों के अभाव में 3 जुलाई 2019 को दिल्ली की सीबीआई कोर्ट ने मुख्तार, अफजाल समेत सभी आरोपियों को बरी कर दिया.

गाजीपुर जेल में 'माननीय' मुख्तार

2005 में मुख्तार ने गाजीपुर जेल को ठिकाना बना लिया. अब जो दरबार कभी फाटक पर लगता था वह गाजीपुर जेल में लगने लगा. ऐशो आराम के सारे इंतजाम वहीं तैयार कर लिए गए. यूपी के डीजीपी रहे बृजलाल ने मीडिया से बात करते हुए बताया था कि मुख्तार ताजी मछली खा सके इसलिए जेल परिसर में तालाब खुदवा दिया गया. एक डिप्टी एसपी अखबार लेकर जाते थे. एक दारोगा मुख्तार के प्रेस किए कपड़े पहुंचाने का काम करते थे. निशानेबाजी का शौक इतना कि जेल में गुलेल से निशानेबाजी की प्रैक्टिस करते. गाजीपुर के वरिष्ठ पत्रकार राजकमल कहते हैं कि मुख्तार और ब्रजेश सिंह के लोगों में एक खास अंतर यह भी है कि इस गैंग के लोग निशानेबाजी में पारंगत हैं. पहले कई ऐसी हत्याएं हुईं जिनमें केवल एक गोली का इस्तेमाल हुआ और टारगेट खत्म हो गया. वहीं ब्रजेश सिंह एंड गैंग का नाम जहां भी आता है वहां बर्स्ट फायरिंग हुई, यानी मैग्जीन खाली कर दी. मुख्तार के लिए काम करने वाले लोगों का भरोसा राइफल पर रहा है, वहीं ब्रजेश सिंह पर जो पहला आरोप हत्या का लगा था, उसमें एके-47 का इस्तेमाल हुआ था.

2009 तक राजनीतिक हालात बदले. सूबे की कमान मायावती के हाथ में थी. गाजीपुर जेल में एसटीएफ ने छापा मारा तो मुख्तार की सेल में फ्रिज, कूलर, गैस सिलिंडर समेत कई सामान मिले. इसके बाद मुख्तार को मथुरा जेल भेज दिया गया. इसके बाद परिस्थितियां बदलीं तो उन्हें लखनऊ- उन्नाव होते हुए 2018 में बांदा जेल भेज दिया गया.

मुख्तार के लिए जेल है मुफीद

कहा जाता है कि मुख्तार को जेल से कभी गुरेज नहीं रहा. एक व्यापारी से रंगदारी मांगने के आरोप में उनकी गिरफ्तारी दिल्ली में हुई थी. तिहाड़ में उनकी मुलाकात सुभाष ठाकुर से हुई जिन्हें बाबा कहा जाता है. जानकारों का कहना है कि वहां से उन्हें नया दर्शन मिला. केवल बाहुबल से कुछ नहीं होगा, सत्ता की हनक साथ होनी चाहिए वरना एक हवलदार भी जिस दिन अपनी पर आ जाएगा तो फाटक के दरवाजे पर नोटिस चस्पा कर देगा. जेल में नए साथी मिलते हैं जो जरूरत पड़ने पर काम आते हैं, जरायम से जुड़े लोगों की जिंदगी जुदा होती है जो जबान के लिए जान दे भी सकते हैं और ले भी सकते हैं. मुख्तार को तिहाड़ से ही यह ज्ञान भी मिला कि जब दबाव ज्यादा हो तो जेल सबसे मुफीद जगह है, बशर्ते अपनी शर्तों पर रहने की आजादी मिले. इसलिए मुख्तार ने कभी जेल से परहेज नहीं किया. गाजीपुर जेल तो उनके घर जैसी थी. बाकी जिन जेलों में रहे वहां उनके पहुंचने के पहले कारिंदे पहुंच गए. जेल के आसपास के इलाके में ये लोग ठिकाना बना लेते हैं. किराए पर घर ले लेते हैं. आना जाना और मिलना जुलना जारी रहता है. धंधे की सारी खबरें समय पर मुख्तार को मिलती रहती हैं. हालांकि उन्हें जेल से पेशी पर ले जाने के दौरान मारने की साजिश भी हुई. बिहार के एक गुंडे लंबू शर्मा को 6 करोड़ में इस काम की सुपारी दी गई. बम बनाने में माहिर लंबू को 50 लाख रुपये पहले मिलने थे. इसके लिए वह बिहार की जेल से भाग निकला था. पेशी के दौरान मुख्तार अंसारी को बम से उड़ाने का प्लान था लेकिन उससे पहले ही पुलिस ने उसे किसी और मामले में गिरफ्तार कर लिया.

बांदा से रोपड़ फिर बांदा में ठिकाना

2013-14 से प्रदेश की फिजा बदलने लगी थी. 2012 में सपा की सरकार बनने के बाद से ही अपराधियों के हौसले बुलंद होने लगे थे. कई वाकये ऐसे सामने आए कि 2 मर्डर करके कोई जेल चला गया और आया तो ठेले वालों तक से रंगदारी मांगने लगा. जनता त्रस्त हो चुकी थी. केंद्र में 2014 में मोदी सरकार आ चुकी थी. ऐसे में 2017 में जनता ने पूरी तरह सत्ता पलट दी. योगी आदित्यनाथ सूबे के मुख्यमंत्री बने. अपराधमुक्त प्रदेश बनाने का वादा करके सत्ता में आई बीजेपी सरकार ने कड़े एक्शन लिए. अपराधियों के जाल को तोड़ना सरकार का एजेंडा बन गया. 2018 में कृष्णानंद राय की हत्या में आरोपी और मुख्तार के लिए काम करने वाले मुन्ना बजरंगी की बागपत जिला जेल में गोली मारकर हत्या कर दी गई. कहा जाता है इस घटना के बाद से मुख्तार को यूपी की जेल असुरक्षित लगने लगी. इसी दौरान पंजाब के एक व्यापारी ने शिकायत दर्ज कराई कि मुख्तार के आदमी ने उससे रंगदारी मांगी है. यह मामला सही है या बनाया गया है, यह तो जांच के बाद ही पता चलेगा लेकिन कोर्ट के आदेश पर मुख्तार को पंजाब की रोपड़ जेल भेज दिया गया. इधर, कई मामलों में यूपी की अदालतों में मुख्तार को पेश होने के लिए कहा गया लेकिन वह स्वास्थ्य का बहाना बनाकर कन्नी काटते रहे. मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा. कोर्ट ने आदेश दिया कि मुख्तार को यूपी की जेल में जाना होगा. इसके बाद उन्हें बांदा की जेल में लाया गया. फिलहाल वह बांदा की जेल में बंद हैं.

कौमी एकता दल, बीएसपी में विलय और अधूरी हसरत

मुख्तार विधायक तो लगातार चुने जाते रहे लेकिन सांसद बनने की इच्छा अधूरी ही रह गई. 2009 में देश में लोकसभा चुनाव हो रहे थे. बनारस की सीट बीजेपी के हाथ से निकल चुकी थी. पार्टी इस प्रतिष्ठित सीट को हर हाल में हासिल करना चाहती थी. इलाहाबाद से बीजेपी सांसद मुरली मनोहर जोशी को बीजेपी ने बनारस का उम्मीदवार बना दिया. दूसरी ओर बीजेपी से खार खाई मायावती ने मुख्तार अंसारी को बीएसपी का टिकट दे दिया. मुख्तार तब आगरा सेंट्रल जेल में बंद थे उन्होंने वहीं से पर्चा दाखिला किया. बनारस की लड़ाई रोचक हो गई, मुकाबला जोशी बनाम अंसारी हो गया. भीषण गर्मी में वोट पड़ रहे थे. लेकिन मुस्लिम इलाकों में अलग जोश था. कहा जाता है कि दोपहर में हल्ला हुआ कि मुख्तार जीत रहे हैं. इसके बाद बीजेपी कार्यकर्ता फिर से सक्रिय हुए. लोगों को घर से निकाल-निकालकर बूथ तक पहुंचाया गया. मुरली मनोहर जोशी मात्र 17000 वोट से मुख्तार को हरा पाए. हालात फिर बदले और मुख्तार को बीएसपी से निकाल दिया गया. इसके बाद अफजाल, मुख्तार और सिगबतुल्ला तीनों भाइयों ने मिलकर कौमी एकता दल नाम की पार्टी बनाई. 2014 में मुख्तार घोसी संसदीय सीट से उम्मीदवार बने लेकिन सफलता नहीं मिली. 2017 में कौमी एकता दल का बीएसपी में विलय हो गया और मुख्तार को मऊ सदर से टिकट मिल गया. मुख्तार फिर विधायक बन गए.

मुख्तार पर मुकदमे

मुख्तार पर कुल 45 मुकदमे दर्ज हुए, इनमें 7 मामले गाजीपुर-मऊ की कोर्ट में विचाराधीन हैं. 3 मामलों में वह निर्दोष पाए गए हैं. कृष्णानंद की हत्या मामले में भी सीबीआई कोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया है. फिलहाल 3 मामले लखनऊ की एमपी एमएलए कोर्ट में चल रहे हैं. एक मामला लखनऊ की जिला अदालत में चल रहा है. गाजीपुर में एक चार्जशीट फाइल हो चुकी है. एक मामले में फाइनल रिपोर्ट लग चुकी है. बाकी मामलों में जांच जारी है. अधिकतर मामलों में गवाह नहीं पहुंचे या तो गवाहों की हत्या हो गई. लेकिन एक मामला है जिसमें माना जाता है कि गवाही पूरी होगी. बनारस से विधायक रहे और मोदी के खिलाफ सांसद का चुनाव लड़ चुके अजय राय के भाई अवधेश राय की बनारस में हत्या कर दी गई थी. मुख्तार इसमें आरोपी हैं. अजय राय गवाही देने में सक्षम हैं हालांकि मुख्तार से चुनावी समझौता करने के बाद इसके कयास भी लगते हैं कि हो सकता है इस मामले में भी कोई बीच का रास्ता निकल जाए.

बेटा शूटर, सांसद है भाई

गाजीपुर की राजनीति में अंसारी परिवार ने जो हैसियत आजादी के पहले से ही हासिल की वह बहुत कम लोगों के खाते में है. अंसारी के दादा मुख्तार अहमद अंसारी को गांधी जी के सबसे करीबी लोगों में गिना जाता था. वह 1926-27 में कांग्रेस के अध्यक्ष रहे. मुख्तार के नाना उस्मान अंसारी ब्रिगेडियर थे और 1947 की लड़ाई में उन्होंने पाकिस्तान की फौज को धूल चटाई और शहादत के बाद उन्हें महावीर चक्र से नवाजा गया. भारत के उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी रिश्ते में मुख्तार के चाचा लगते हैं. मुख्तार के भाई अफजाल 1986 से लेकर 96 तक लगातार विधायक रहे. उनके दूसरे भाई सिगबतुल्ला भी 2012 से 17 तक विधायक रहे. मुख्तार के दो बेटे हैं अब्बास और उमर. मुख्तार की तरह अब्बास को भी निशानेबाजी का शौक है. वह शॉटगन शूटिंग के चैंपियन रह चुके हैं. दूसरे भाई उमर ने विदेश में पढ़ाई की है. 2017 के चुनाव में उन्होंने मऊ में अपने पिता के लिए प्रचार की कमान संभाली थी. क्योंकि अब्बास घोसी विधानसभा सीट से खुद चुनाव लड़ रहे थे हालांकि वे 7000 वोटों से हार गए. मुख्तार अंसारी की पत्नी अफशां अंसारी दो बार चर्चा में आईं. पहली बार जब मुख्तार के साथ ही उन्हें दिल का दौरा पड़ा, हालांकि बाद में लखनऊ पीजीआई के डॉक्टरों ने कहा था कि दोनों को कोई समस्या नहीं थी. दूसरी बार जब उन्होंने ब्रजेश सिंह और त्रिभुवन सिंह से अपने पति की जान को खतरा बताया था. मोदी सरकार में मंत्री रहे मनोज सिन्हा को हराने वाले मुख्तार के भाई अफजाल अंसारी ने बीबीसी से कहा था कि आज हम लोगों की पहचान मुख्तार से होती है. लोग कहते हैं कि ये मुख्तार के भाई हैं. मुख्तार कुछ गलत लोगों की संगत में पड़ गए. वह दावा करते हैं कि कोई ऐसा नेता बता दीजिए जो जेल में रहते हुए तीन चुनाव जीता हो. मुख्तार पर मुकदमे राजनीति से प्रेरित होकर थोपे गए हैं.

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