"कागजों में बने प्राचार्य, जमीन पर अब भी इंतजार! MP में पदोन्नति के 2 महीने बाद भी नहीं मिली पोस्टिंग, भड़के शिक्षक"

 
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ऋतुराज द्विवेदी,रीवा/भोपाल। (राज्य ब्यूरो) मध्य प्रदेश के शासकीय हाईस्कूलों और हायर सेकेंडरी विद्यालयों में प्रशासनिक व्यवस्था गंभीर संकट के दौर से गुजर रही है। एक तरफ सूबे के तमाम शिक्षण संस्थानों में प्राचार्यों के सैकड़ों पद लंबे समय से रिक्त पड़े हैं, जिसके कारण शैक्षणिक और प्रशासनिक कामकाज बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। वहीं दूसरी ओर, सरकार द्वारा पदोन्नति की प्रक्रिया पूरी किए जाने के बावजूद पात्र व्याख्याताओं को उनके नए पदों पर पदस्थ नहीं किया गया है। आदेश जारी होने के दो महीने से अधिक का समय बीत जाने के बाद भी स्थिति जस की तस बनी हुई है, जिससे शिक्षकों के बीच गहरी नाराजगी और असंतोष का माहौल बनता जा रहा है।

स्कूल शिक्षा विभाग के आदेश के दो महीने बाद भी व्याख्याताओं को क्यों नहीं मिला नया पद?
विभागीय दस्तावेजों और टाइमलाइन के मुताबिक, स्कूल शिक्षा विभाग ने गत 25 अगस्त को औपचारिक आदेश जारी कर राज्यभर के 196 व्याख्याताओं को प्राचार्य के पद पर पदोन्नत किया था। इस उम्मीद के साथ कि अब विद्यालयों को स्थायी प्रशासनिक मुखिया मिल जाएंगे, शिक्षकों ने राहत की सांस ली थी।

इतने महत्वपूर्ण आदेश को जारी हुए दो महीने से अधिक का वक्त बीत चुका है, लेकिन इसके बावजूद लोक शिक्षण आयुक्त कार्यालय (DPI) की तरफ से इन पदोन्नत शिक्षकों की नई पदस्थापना (पोस्टिंग) के आदेश जारी नहीं किए गए हैं। नतीजतन, ये सभी शिक्षक कागजों पर तो प्राचार्य बन चुके हैं, लेकिन मैदानी स्तर पर अपने नए पदों का कार्यभार संभालने के लिए अब भी दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर हैं।

शासकीय शिक्षक संगठन के कार्यकारी अध्यक्ष उपेंद्र कौशल ने क्या गंभीर सवाल उठाए हैं?
इस पूरे प्रशासनिक विलंब को लेकर कर्मचारियों और शिक्षकों के संगठनों ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। मध्यप्रदेश अधिकारी-कर्मचारी संयुक्त मोर्चा के प्रदेश उपाध्यक्ष एवं शासकीय शिक्षक संगठन मध्यप्रदेश के कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष उपेन्द्र कौशल ने सरकार और विभाग की कार्यशैली पर कड़े सवाल उठाए हैं।

उपेन्द्र कौशल ने मीडिया के सामने अपनी बात रखते हुए स्पष्ट शब्दों में कहा कि जब प्रदेश के विद्यालयों में प्राचार्यों के हजारों पद खाली पड़े हैं और विभाग द्वारा व्याख्याताओं को पदोन्नति का लाभ दिया भी जा चुका है, तो फिर दो महीने बीत जाने के बाद भी पदस्थापना के आदेश न जारी होना पूरी तरह समझ से परे है। उन्होंने कहा कि विभागीय प्रक्रियाओं में इस तरह की अनावश्यक सुस्ती और प्रशासनिक विलंब के कारण योग्य शिक्षक अपने नए दायित्वों को संभालने के अवसर की लंबी प्रतीक्षा करने को विवश हैं।

रिटायरमेंट की कगार पर खड़े शिक्षकों की परेशानी और विभाग की कार्यप्रणाली पर असर
इस विलंब का सबसे मानवीय और गंभीर पहलू उन शिक्षकों से जुड़ा है जो अपनी सेवा के अंतिम चरण यानी सेवानिवृत्ति (Retirement) के बेहद करीब पहुंच चुके हैं। उपेंद्र कौशल ने विशेष रूप से रेखांकित किया कि इस सूची में कई ऐसे वरिष्ठ शिक्षक और व्याख्याता भी शामिल हैं, जो अब रिटायरमेंट की आयु के करीब आ गए हैं।

यदि समय रहते उन्हें नई पदस्थापना नहीं मिली, तो वे बिना अपने नए पद का लाभ उठाए ही सेवानिवृत्त हो जाएंगे, जो उनके साथ एक बड़ा अन्याय होगा। प्राचार्यों के पद लंबे समय तक रिक्त रहने से स्कूलों की दैनिक प्रशासनिक निगरानी, छात्र-छात्राओं की पढ़ाई, परीक्षा संबंधी गतिविधियां और अन्य संस्थागत व्यवस्थाएं लगातार प्रभावित हो रही हैं। समय पर पोस्टिंग न होने से न केवल शिक्षकों का मनोबल गिर रहा है, बल्कि स्कूलों का शैक्षणिक माहौल भी बिगड़ रहा है।

जनजातीय कार्य विभाग की नई सूची और शिक्षकों में बढ़ रही नाराजगी की पूरी स्थिति
एक तरफ जहां स्कूल शिक्षा विभाग के अंतर्गत आने वाले पदोन्नत व्याख्याता अपनी पोस्टिंग के आदेश का इंतजार कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ प्रशासनिक विसंगतियों का एक और उदाहरण सामने आया है। हाल ही में, जनजातीय कार्य विभाग ने अपनी प्रक्रिया के तहत 272 शिक्षकों की पदोन्नति सूची जारी कर दी है।

दो अलग-अलग विभागों की अलग-अलग चाल और सुस्त प्रशासनिक तंत्र के कारण शिक्षकों में अब खुलकर आक्रोश देखा जा रहा है। शासकीय शिक्षक संगठन ने कड़े शब्दों में स्कूल शिक्षा विभाग को चेतावनी दी है कि वे बिना किसी और विलंब के तत्काल प्रभाव से पदोन्नत व्याख्याताओं की पदस्थापना के आदेश जारी करें। संगठन ने यह भी मांग की है कि जो शिक्षक अपनी सेवा के अंतिम पड़ाव पर हैं, उनके मामलों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए ताकि वे अपने सेवाकाल में कम से कम नए पद का सम्मान और लाभ प्राप्त कर सकें।

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