भोपाल के रविन्द्र भवन में नाबालिग आदिवास बच्ची से दुष्कर्म मामले में पुलिस की जांच संदेहास्पद: हाईकोर्ट सुनवाई के दिन मऊगंज पहुँची ACP, पुनः बयान लेने के नाम पर पीड़ित परिवार का किया सामाजिक हनन
भोपाल/मऊगंज, संवाददाता।भोपाल के रविंद्र भवन परिसर में 30 जनवरी 2025 को एक आदिवासी नाबालिग के साथ कथित दुष्कर्म के प्रयास के मामले में जांच की कार्यप्रणाली को लेकर नए प्रश्न खड़े हो गए हैं। उच्च न्यायालय में सुनवाई की तिथि के दिन ही जांच अधिकारी एसीपी टीटी नगर भोपाल अंकिता खातरकर पुलिस दल के साथ मऊगंज पहुँचीं और परिजनों के अनुसार नाबालिग को उसके ननिहाल से थाने लाकर पुनः बयान दर्ज किए गए।
परिवार का आरोप है कि नाबालिग को थाने में कई घंटों तक बैठाया गया। यह मामला एबीवीपी के पूर्व संगठन मंत्री भगवान सिंह राजपूत सहित एक अन्य व्यक्ति के विरुद्ध कथित दुष्कर्म प्रयास के आरोपों से संबंधित है। हालांकि आरोपों की अंतिम पुष्टि न्यायालय द्वारा की जाएगी। लेकिन पुलिस जांच के नाम पर बार बार बयान की आड़ में दबाब बना रही है।
FIR दर्ज कराने में कथित देरी
परिजनों का कहना है कि घटना के बाद जब वे भोपाल के श्यामला हिल्स थाने पहुँचे, तो उन्हें दोपहर से देर रात तक बैठाए रखा गया। उनका आरोप है कि प्रारंभ में समझौते का दबाव बनाया गया और बिना FIR दर्ज किए लौटा दिया गया। बाद में वरिष्ठ अधिकारियों के हस्तक्षेप से मऊगंज में “जीरो FIR” दर्ज हुई। धारा 161 और 164 CrPC के तहत बयान न्यायालय में दर्ज कराए गए और केस डायरी भोपाल भेजी गई।
भोपाल में जांच, फिर दोबारा बयान
भोपाल पुलिस ने नियमित FIR दर्ज कर जांच एसीपी अंकिता खातरकर को सौंपी। इसके बाद पीड़िता और उसके पिता को भोपाल बुलाकर पुनः बयान लिए गए और घटनास्थल का नक्शा-पंचनामा तैयार किया गया। परिवार का कहना है कि छह माह पूर्व भी 161 का पूरक बयान दिया जा चुका है। इसके बावजूद आज फिर से थाने में बयान लेने की कार्रवाई ने उन्हें चिंतित किया है। बयान की कार्यवाही तो ठीक है लेकिन पुलिस द्वारा सामाजिक दुर्व्यवहार और अपमान करने से आहत हैं। यदि पुलिस को बयान ही लेना है तो जांच अधिकारी सामान्य सिविल ड्रेस में अकेले जाकर भी बयान ले सकती हैं और कानून में इसका स्पष्ट प्रावधान भी है। बाबजूद इसके दल बल के साथ घर आकर गांव वालों के सामने थाने लाना, पुलिस की कार्यवाही पर सवाल खड़ा करती है।
धमकी और दबाव के आरोप
परिजनों ने आरोप लगाया है कि शिकायत वापस लेने के लिए दबाव और धमकियाँ दी जाती रहीं। इन शिकायतों की जानकारी संबंधित अधिकारियों को दी गई थी।
एक वर्ष बाद भी स्थिति स्पष्ट नहीं
घटना को एक वर्ष से अधिक समय बीत चुका है। परिजनों के अनुसार चार्जशीट, मेडिकल रिपोर्ट और FSL रिपोर्ट की स्थिति को लेकर स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है। आरोपितों की गिरफ्तारी को लेकर भी परिवार सवाल उठा रहा है।
कानून विशेषज्ञों का कहना है कि गिरफ्तारी जांच की आवश्यकता पर निर्भर करती है, लेकिन गंभीर आरोपों वाले मामलों में जांच की गति और पारदर्शिता महत्वपूर्ण होती है।
उच्च न्यायालय की निगरानी
जांच में कथित देरी और सुरक्षा चिंताओं को लेकर पीड़िता के पिता ने उच्च न्यायालय की शरण ली है। न्यायालय ने स्टेटस रिपोर्ट और केस डायरी तलब की है। अगली सुनवाई में जांच की प्रगति पर स्पष्टता अपेक्षित है।
POCSO की भावना और बाल-अनुकूल प्रक्रिया
POCSO कानून के तहत नाबालिग पीड़ित के साथ संवेदनशील और बाल-अनुकूल प्रक्रिया अपनाना अनिवार्य है। पहले से 164 CrPC का बयान दर्ज होने के बावजूद पुनः थाने में बयान लेने की आवश्यकता पर कानूनी हलकों में चर्चा है। वहीं बयान के नाम पर पीड़िता व उसके परिवार का सामाजिक हनन कानून का दुरुपयोग है।