जानिए कैसे बनते हैं चरस और गांजा : हिमाचल प्रदेश के मलाणा में सिकंदर के वंशज चरस बेचकर कमा रहे 108 करोड़, इस मंदिर को छूने पर 5 हजार जुर्माना

 
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हिमाचल में चुनावी शोर चरम पर है, इस शोर के बीच एक ऐसा शांत गांव है, जहां कहने को ‘दुनिया की सबसे पुरानी डेमोक्रेसी’ चल रही है। ये जनतंत्र ढूंढते हुए मैं मलाणा टैक्सी स्टैंड से 3 किलोमीटर का अपहिल ट्रैक कर इस गांव में दाखिल होता हूं, जो किसी रहस्यमयी दुनिया जैसा है। यहां के लोग खुद को सिकंदर महान का वंशज कहते हैं, उसकी तलवार यहां के किसी मंदिर में होने का दावा है।

वे एक ऐसी भाषा बोलते हैं, जो दुनिया में किसी को समझ नहीं आती। समाज से बाहर शादी नहीं करते और न ही किसी बाहरी को छूते हैं। हालांकि मेरे ज्यादातर भ्रम ‘माल लोगे’ सवाल से टूट जाते हैं। ये रहस्य चरस फूंकने से निकले धुंए जैसा ही है, जो पल भर में हवा में गायब हो जाता है।

मलाणा में घुसते ही मैं काले हाथों वाले एक समंदर के बीच पहुंच जाता हूं। यहां हर घर, मोहल्ले में मां-बाप और बच्चे साथ मिलकर चरस घिस रहे हैं। न सिकंदर है और न ही उसकी तलवार। ठाकुरों का एक गांव है, जो शुद्ध रक्त की कहानियों की आड़ में खुलेआम छुआछूत कर रहा है।

अपनी कोर्ट, अपनी संसद, अपने कानून और अपनी सजा है। सच सिर्फ एक है- चरस। जो जितनी ज्यादा बना रहा है, उतना ज्यादा कमा रहा है। स्कूल खाली है और बच्चे हर दिन 10 हजार कमाने के चक्कर में हाथ घिस रहे हैं और ‘काला सोना’ बना रहे हैं।

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मिस्ट्री विलेज मलाणा 3 महीने में कमा रहा 108 करोड़ रुपए
हिमाचल प्रदेश की पार्वती घाटी में बसा छोटा सा गांव मलाणा। 2,450 लोगों की आबादी वाला ये गांव दुनियाभर में जितना मशहूर है, उतना ही बदनाम। 625 परिवारों वाले इस गांव का हर घर चरस की फैक्ट्री है। दुनिया भर से लोग यहां सबसे शुद्ध चरस ‘मलाना सुपर’ या ‘मलाना क्रीम’ की तलाश में आते हैं।

चरस जिस पौधे से मिलती है, वह साल में 3 महीने ही मिलता है। इन तीन महीनों में मलाणा गांव हर दिन 1.2 करोड़ रुपए की चरस बनाता है। एक आदमी पूरे दिन मेहनत कर 10 हजार रुपए तक कमा लेता है।

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मलाणा कुल्लू से भले सिर्फ 44 किमी दूर हो, यहां पहुंचने में करीब 4 घंटे लग जाते हैं। 2 घंटे कैब से और 2 घंटे की ही पैदल चढ़ाई। पहाड़ काटकर बनाई पथरीली सड़क जहां खत्म होती है, वहीं से खड़ी चढ़ाई शुरू होती है।

विधानसभा चुनाव से दूर ‘काले सोने’ की तलाश
हिमाचल प्रदेश में 12 नवंबर को विधानसभा चुनाव के लिए वोटिंग होनी है। जिस वक्त पूरे राज्य में इलेक्शन की हलचल है। रैलियां, भाषण, पोस्टर, नारेबाजी है, ठीक उसी वक्त कुल्लू से 44 किमी दूर मलाणा में चुनावी शोर न के बराबर है।

चरस का सीजन खत्म होने को है और यहां के लोगों की आंखें सीजन के आखिरी कस्टमर का इंतजार कर रही हैं। आखिरी कस्टमर इसलिए क्योंकि, गांजे की कटाई का सीजन खत्म होने को है और ‘चरस रगड़’ अगले 9 महीने के लिए शांत हो जाएगी।

मलाणा के नाम के साथ कई रहस्य जुड़े हैं, जिनकी तलाश में मैं यहां पहुंचा हूं। यहां भी किसी और भारतीय गांव की तरह जाति व्यवस्था लागू है। सिर्फ दो समुदाय हैं- ठाकुर और हरिजन। पहले गांव के लोग बाहर शादी भी नहीं करते थे, लेकिन अब ये परंपरा टूट चुकी है।

सिकंदर आया या सैनिक? न कोई सबूत न कोई इतिहास
गांव वालों का मानना है कि उनकी जड़ें सिकंदर से जुड़ी हैं। 326 ईसा पूर्व में झेलम के किनारे सिकंदर और पोरस की सेना में युद्ध हुआ था। उस दौरान सिकंदर के सैनिकों की टुकड़ी ने इसी गांव में शरण ली थी। गांव के लोग इन्हीं सैनिकों को अपना पूर्वज बताते हैं।

ऐसी ही एक दूसरी कहानी में बताया जाता है कि सिकंदर खुद इस गांव में आया था। हालांकि इन कहानियों से जुड़े सवालों पर गांव वाले मुंह फेर लेते हैं। लगता है कि जैसे कुछ ऐसा है, जो वे बाकी दुनिया से छिपाना चाहते हैं। इतिहास में सिकंदर या उसके सैनिकों के इस तरह कहीं बस जाने के कोई सबूत नहीं हैं, गांव वाले भी इस रहस्यमयी कहानी का कोई सबूत पेश नहीं करते।

जमदग्नि ऋषि के मंदिर को छूने पर 5000 रुपए जुर्माना
इन कहानियों की छानबीन के दौरान मैं सुबह-सुबह गांव के एक मंदिर पर पहुंचता हूं। यहां लकड़ी और पत्थर से बने मंदिर पर एक तख्ती लगी है। लिखा है- ‘जमदग्नि ऋषि के इस पवित्र स्थान को छूने से पहले इस सूचना पट को पढ़कर यह जान लेना सही है कि इसे छूने पर 5000 रुपए का जुर्माना लिया जा सकता है।’

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गांव के लोग बता नहीं पाते कि आखिर जुर्माने के पीछे लॉजिक क्या है? इस मंदिर का तो सिकंदर की कहानी से भी कोई लेना-देना नहीं। बस एक नियम है, जिसे गांव वालों ने बना दिया है और अब जुर्माना वसूला जा रहा है।

ठाकुरों का गांव है मलाणा, अगर छू दो तो भड़क जाते हैं…
गांव के बीच में एक चौक है, जहां से तय होता है कि मलाणा में क्या होगा और क्या नहीं। मैं वहां पहुंचता हूं, तो चौक पर कई सारे लोग भूरी टोपी और जैकेट डाले सुबह की धूप सेंक रहे थे। मैं बातचीत शुरू करने के लिए उनके करीब जाता हूं तो भड़क गए। डांटकर कहने लगे- ‘दूर हटो, किस कास्ट के हो?’।

मैंने कहा- ‘ब्राह्मण घर में पैदा हुआ, लेकिन कास्ट तो नहीं मानता।’ जवाब मिला- ‘ब्राह्मण हो तो कोई बात नहीं’।

छानबीन करने पर पता चलता है कि मलाणा में ज्यादातर ठाकुर जाति के लोग रहते हैं। सिर्फ 30-40 लोग ही हरिजन हैं, जो गांव के बाहर रहते हैं। यहां सिकंदर के नाम पर जो न छूने की परंपरा बाहरी दुनिया को पता है, वह गांव पहुंचने पर जाति आधारित ही नजर आती है।

ठाकुर अपनी से कथित नीची जाति के लोगों को छूने से बचते हैं, जिसमें सिकंदर के वंशज वाली कहानी का घालमेल कर दिया गया है। पहले गांव के लोग गांव के बाहर शादियां भी नहीं करते थे, लेकिन वक्त के साथ चीजें बदल गई हैं। एक महिला बताती है कि दो लड़कियों की शादी बिहार में भी हुई है और अब ऐसा करने वालों को समाज से बाहर करने की परंपरा भी पहले की तरह सख्त नहीं है।

संसद-कोर्ट से लेकर मंदिर तक पुजारी का फैसला अंतिम
गांव के इस मुख्य चौक पर सिर्फ एक शख्स सिर पर मोटी सफेद पगड़ी पहने नजर आता है। देखने से ही एहसास हो जाता है कि ये गांव का कोई खास आदमी है। पूछने पर पता चला कि इनका नाम सुरजन है और ये गांव के मुख्य पुजारी हैं। मलाणा की हर व्यवस्था में ‘पुजारी’ का विशेष स्थान है, गांव के कोर्ट से लेकर नियम-कानून बनाने में पुजारी का वीटो काम करता है।

पुजारी सुरजन थोड़ी आनाकानी के बाद बात करने को तैयार होते हैं। वे बताते हैं, ‘ये गांव तो एकदम अलग है। इस गांव के लोग सिर्फ और सिर्फ जमदग्नि ऋषि में आस्था रखते हैं। मैं इस गांव का पुजारी हूं और ये पद खानदानी होता है।’ उनकी बातों में सिकंदर का जिक्र नहीं आता जो मुझे चौंकाती हैं। मैं जिक्र करता हूं, लेकिन वे इस बात को टाल देते हैं।

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देश के कानून लागू नहीं, गांव का अपना सिस्टम
मलाणा के लोग जमदग्नि ऋषि को जमलू देवता बोलते हैं। गांव वाले बताते हैं कि बाहर का कोई कानून गांव में नहीं चलता। मैं पूछता हूं, क्या दूसरे गांवों की तरह इस गांव में पंचायत वगैरह नहीं है?

जवाब मिला- ‘पंचायत तो है, लेकिन नाम की, गांव के लोग ही सब तय करते हैं और मिलकर सब कुछ चलाते हैं।’

चबूतरे पर बैठा एक बुजुर्ग कहता है- ‘गांव में दो सदन है। ऊपरी सदन को ज्येष्ठांग कहा जाता है, चौराहे पर बड़े वाले चबूतरे पर ये सदन बैठता है। इसमें 11 प्रतिनिधि होते हैं। इसे भारतीय संसदीय व्यवस्था के हिसाब से राज्यसभा समझ सकते हैं। बड़ा पुजारी, देवता के बाद सबसे बड़े अधिकारी के रूप में काम करता है।

निचले सदन को कनिष्ठांग या कोरसभा कहते हैं। हर घर का मुखिया इस निचले सदन का हिस्सा होता है। ये लोकसभा की तरह है। इस सदन की बैठक को हारका कहते हैं। ये एक तरह का लोकतंत्र ही तो हुआ।’

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क्या मलाणा में क्राइम होता है, ये सवाल जब मैं कुल्लू के SP गुरुदेव शर्मा से पूछता हूं, तो वे गोल-मोल जवाब देते हैं। गांव में चरस बनाए जाने और बिकने के मामले में पुलिस ने क्या कार्रवाई की, इसके जवाब में वे कहते हैं- अभी सारी पुलिस फोर्स इलेक्शन में बिजी है, क्राइम का डेटा चुनाव खत्म होने के बाद ही मिल सकेगा।

लोकल थाने में भी कोई कुछ बोलने को तैयार नहीं होता। बस ऑफ द रिकॉर्ड बता देते हैं कि मलाणा से कोई रिपोर्ट ही नहीं करता। साल भर में 4-5 केस ही आते हैं, वे भी छोटे-मोटे क्राइम के।

ऐसी भाषा, जिसे गांव के लोगों के अलावा कोई नहीं बोलता
मलाणा की भाषा भी अपने आप में एक रहस्य है। यहां के लोग कनेशी भाषा में बात करते हैं। पूरी दुनिया में सिर्फ इसी गांव में ये भाषा बोली जाती है। गांव के लोग इस भाषा को पवित्र मानते हैं और किसी दूसरे को नहीं सिखाते।

ये भाषा यहां कैसे पहुंची, इसका भी कोई सबूत इतिहास में कहीं नहीं है, न ही गांव के लोग इस बारे में कुछ बता पाते हैं। BBC की एक रिपोर्ट के मुताबिक कनेशी भाषा पर स्वीडन की Uppsala यूनिवर्सिटी में एक स्टडी चल रही है। ये स्टडी एक भारतीय प्रोफेसर अनुज सक्सेना ही लीड कर रहे हैं। हालांकि इस भाषा के ओरिजिन के ठोस सबूत नहीं मिल पाए हैं।

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मलाणा: द हैश विलेज ऑफ इंडिया
गांव से जुड़े रहस्यों, भाषा-परंपराओं से थोड़ा आगे बढ़कर देखें तो मलाणा का सच चरस के इर्द-गिर्द घूमता नजर आता है। ये जगह ‘मलाना क्रीम’ के लिए सबसे ज्यादा मशहूर है। पूरी दुनिया से लोग सिर्फ इसके एक कश के लिए यहां खिंचे चले आते हैं। ये ही यहां का कारोबार है और इसी से यहां की अर्थव्यवस्था चल रही है।

गांजे के पौधे को हाथों से घंटों रगड़ने के बाद इसके रेजिन से तैयार होती है मलाना क्रीम यानी बेहतरीन क्वालिटी की चरस। भारत में गांजा और चरस NDPS एक्ट 1985 के तहत गैरकानूनी है, लेकिन परंपराओं के परदे के पीछे बसे इस गांव का दस्तूर अलग है। ये दस्तूर यहां के लोगों ने बनाया है। कोई इसे तोड़ता है तो सजा भी गांव की सुप्रीम कोर्ट में तय होती है।

मलाणा में लोगों के ऊंचे-ऊंचे और पक्के मकान हैं, हाथों में नए मॉडल का आईफोन लेकर लोग टहलते हुए मिल जाएंगे। गांव की राशन की दुकानें किसी भी बड़े शहर के जनरल स्टोर्स से कम नहीं हैं। सवाल उठता है ये सब आ कहां से रहा है, वो भी ऐसे गांव में जहां 2 घंटे ट्रैक करके पहुंचा जा सकता है। जवाब है- चरस जिसे ‘ब्लैक गोल्ड’ भी कहा जाता है।

गांव में घुसने के साथ ही हर गली, नुक्कड़ पर खड़े लोकल लोग टूरिस्ट की आंखों में चरस पीने की तलब तलाश रहे होते हैं। टूरिस्ट हिचक रहा हो, तो लोग सीधा ही पूछ लेते हैं ‘माल लोगे?’

मेरी गांव के लोगों से पहली बातचीत यही थी, सवाल था माल लोगे और मेरे न कहने पर उनकी आंखों में सवाल था, फिर यहां क्या करने आए हो?

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हर घर में तैयार हो रही मलाना क्रीम
मलाणा की गलियों में घूमने पर अजीब सी नशीली महक आती है। इसकी वजह है हर घर में रगड़-रगड़ कर तैयार किया जा रहा हशीश। गांव के अंदरूनी इलाकों में चबूतरों पर बीच में आग सुलगाकर उसके चारों तरफ पुरुष, महिलाएं, बच्चे सब एक हरे रंग के पौधे को दोनों हथेलियों के बीच रगड़ते दिखते हैं। कुछ के हाथ हरे हैं, तो कुछ के काले। पास जाकर बात की तो पता चला कि हाथ में जो काला-काला मैल चिपकता है, यही है मलाना क्रीम।

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मैं 15 साल के सुमित से मिलता हूं, जो पिछले 2 घंटे से यही काम कर रहा है। इस मेहनत के बाद 3-4 ग्राम माल तैयार हुआ है। चरस को हाथ से छुड़ाते हुए सुमित बताता है- ‘स्कूल जाता था, लेकिन स्कूल जाकर पढ़ाई-लिखाई से क्या ही मिल जाता। यहां दिनभर अगर ठीक से मेहनत करो तो 10 हजार रुपए तक कमा लेता हूं।’

मलाणा में वीडियो शूट करना भी आसान काम नहीं है, जैसे ही जेब से मोबाइल या कोई भी इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस निकालो तो गांव वाले तुरंत टोक देते हैं। बच्चों से लेकर महिलाओं तक को इस बात की पूरी समझ है कि किसी को भी कुछ रिकॉर्ड नहीं करने देना है।

एक महिला नाम न उजागर करने की शर्त पर बताती है, ‘सबको लगता है कि गांव वाले कुछ ग्राम क्रीम बेचकर हजारों रुपए कमा रहे हैं, लेकिन इसमें कितनी ज्यादा मेहनत है, ये कोई नहीं जानता। ये फसल पूरे साल में सिर्फ 3 महीने ही होती है। जंगल से फसल काटकर लाओ, माल निकालने के लिए घंटों हाथों पर पौधे रगड़ने होते हैं। हथेलियां और कंधे जाम हो जाते हैं, कमर में दर्द उठता है।

गांजे के पौधे की गंध इतनी तेज होती है कि सिर में दर्द रहता है, लेकिन फिर भी मजबूरी में करना पड़ता है। यहां न कोई दूसरी फसल होती है और न ही कोई और रोजगार है। हमारे यहां गांजा ही उपज है और क्रीम की वजह से ही हम सालभर के लिए कुछ पैसे इकट्ठे कर पाते हैं, जिससे गुजारा चलता है।’

टूरिस्ट के लिए चरस नशा है, लेकिन मलाणा के लोग इसे पवित्र बूटी मानते हैं।

पढ़ाई-लिखाई नहीं, चरस ही बन गया फ्यूचर
गांव के आखिरी छोर पर प्राइमरी स्कूल है। पहली से लेकर पांचवी तक के स्कूल में करीब 150 छात्रों का नाम दर्ज है। मैं जिस दिन स्कूल पहुंचा तो सिर्फ 3 बच्चे स्कूल में थे। गांव की दीवार पर बड़े अक्षरों में लिखा है- ‘मत करवाओ हमसे कसरत और कमाई।’ ये लाइन ही गांव में शिक्षा की हालत की सबसे बड़ी गवाह है।
यहां मेरी मुलाकात बियान से होती है। बियान पहली क्लास में पढ़ती है और वह उन तीन बच्चों में से एक है, जो आज स्कूल आए हैं। बियान बताती है, ‘मेरे सारे दोस्त इसलिए नहीं आते क्योंकि वे घर पर मालिश करके माल तैयार करते हैं।’ मैं चौंक जाता हूं जब ये छोटे-छोटे बच्चे भी मेरे आईफोन को पहचान लेते हैं। टीचर भी मलाना क्रीम की चमक के आगे बेबस नजर आते हैं।

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