कंडोम की विकास यात्रा : जानिए भारत में कैसे लॉन्च हुआ कंडोम, भेड़ बकरी की आंत से रबड़ के टुकड़े तक...

 

कंडोम की विकास यात्रा : जानिए भारत में कैसे लॉन्च हुआ कंडोम, भेड़ बकरी की आंत से रबड़ के टुकड़े तक...

कभी टैबू, कभी झिझक तो कभी जिज्ञासा... कंडोम को लेकर इंसान के मन में उतने ही सवाल रहे हैं जितनी तहों में लिपटकर रबर का ये टुकड़ा हमारे-आपके बीच आता है. सभ्यता के विकास के क्रम में इंसान जब जिंदगी जीने का सलीका सीखने लगा तब मर्दों-औरतों को सुरक्षित यौन संबंध (Safe sex) की जरूरत महसूस हुई. वह यौन संचारित बीमारियों से बचना चाहता था. वह यौन-संगति चाहता था, लेकिन संतति उसे नहीं चाहिए थी.

इस 'काम' के लिए समाज के सयाने लोगों ने आस-पास देखना-सीखना और परखना शुरू किया. इतिहास कहता है कि 1640 ईस्वी में भेड़-बकरी की आंत का इस्तेमाल इंग्लैंड के सैनिक कंडोम के रूप में करते थे. 1645 में अंग्रेज कर्नल (Colonel Quondam) ने इसे आकार दिया और पूर्ण रूप से विकसित किया.

तब इसका कोई नाम नहीं था लिहाजा इसे कर्नल Quondam के नाम पर ही लोग दबे-छुपे पुकारने लगे. अपनी-अपनी बोलियों और भाषाओं में बोलते रहे. यूरोप में सैकड़ों सालों तक घिस-पिटकर, कट-छटकर लज्जा का आवरण ओढ़े ये संबोधन धीरे-धीरे आज का कंडोम (Condom) बन गया. 

बकरी की आंत, सिल्क के धागे, लिनेन के कपड़े, कछुए की खाल के रूप में कंडोम लोगों के निजी पलों तक पहुंच बनाता रहा. वक्त के साथ साथ इसकी उपादेयता बदलती रही. इसके इस्तेमाल में व्यक्ति के स्वभाव के अनुसार सुरक्षा के साथ-साथ लग्जरी और यौन स्वच्छंदता का भाव भी जुड़ता गया. लेकिन 1860 में जो हुआ उसने बर्थ कंट्रोल की दिशा में क्रांतिकारी बदलाव ला दिया.

एक अमेरिकी रसायन विज्ञानी थे चार्ल्स गुडइयर. वे लंबे समय से रबर की प्रकृति पर दिमाग खपा रहे थे. रबर जो कि ठंडा होने पर बहुत सख्त होता है और गरम होने पर बहुत नरम. गुडइयर इस रबर को इलास्टिक बनाने की कोशिश कर रहे थे. 1860 में उन्हें वो फार्मूला मिला गया. इसी के साथ कंडोम के प्रोडक्शन में क्रांतिकारी बदलाव हुआ. 

अब इस चीज में मजबूती थी. यूज करने संबंधी दिक्कतें इससे जाती रहीं. इसमें इलास्टिसिटी थी. लेकिन सिंगल यूज कंडोम का कॉन्सेप्ट अबतक नहीं आया था. यूरोप अमेरिका में कंपनियों ने लोगों से कहा कि रबर से बने कंडोम को धोकर फिर से इस्तेमाल किया जा सकता है. प्रयोग चलते रहे. इस बीच यौन संचारित रोग की वजह से इसका इस्तेमाल बढ़ता रहा.

वर्ष 1920 आया, इसी साल लेटेक्स की खोज हुई. लेटेक्स से बना कंडोम नये अवतार में सामने आया. जो ज्यादा सॉफ्ट, ज्यादा लचीला (Tensile) था.  इस खोज ने कंडोम को सर्वसुलभ बना दिया. अब इसका प्रोडक्शन बड़े पैमाने पर होने लगा, साथ ही इसकी कीमतें भी पहले के मुकाबले काफी कम हुई और अब ये मध्य वर्ग की पहुंच तक आ चुका था. इस तरह सिंगल यूज कंडोम का चलन शुरू हुआ. इसके साथ ही इसकी सामाजिक और निजी स्वीकार्यता भी बढ़ी. द्वितीय विश्व युद्ध तक इसका मॉस प्रोडक्शन शुरू हुआ और सरकारें दुनिया भर में फैले अपने सैनिकों को कंडोम बांटने लगीं. समय के साथ निजी कंपनियां इस प्रोडक्ट में रोमांच और रोमांस का इनपुट बढ़ाती जा रही थीं. 

कहानी कंडोम के सरकारी संस्करण निरोध की

अब बात भारत की. यानी कहानी इसी कंडोम के सरकारी संस्करण निरोध की. कंडोम भारत में सरकारी हिंदी का लिबास ओढ़कर नहीं आया था. सरकार चाहती थी कि इसका नाम प्रेम और काम के देवता कामदेव के छद्मनाम पर कामराज रखा जाए. लेकिन भले ही शेक्सपीयर ने कहा हो कि नाम में क्या रखा है? भारत में तो नाम पर तो लंबी चौड़ी राजनीति हो जाती है. यहां भी एक राजनीति घुस गई और कंडोम कामराज बनते-बनते रह गया.

ये कहानी हम आपको बताएं इससे पहले ये जानना जरूरी है कि जिस कंडोम को यूरोप-अमेरिका में 1860 में ही स्वीकार्यता मिल गई थी उसे भारत आने में 100 साल की देरी कैसे हो गई? 

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