REWA BIG BANK SCAM : बहुचर्चित डभौरा सहकारी बैंक घोटाला, सिलसिलेवार तरीके से जानिए 250 करोड़ के इस घोटाले की कहानी

 
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REWA BIG BANK SCAM : मध्यप्रदेश के रीवा का बहुचर्चित डभौरा सहकारी बैंक घोटाला 10 साल से सुर्खियों में बना हुआ है। इस घोटाले की शुरुआत 16.54 करोड़ रुपए के घपले की जांच से हुई थी, जो बढ़कर 250 करोड़ रुपए तक पहुंच गया। इस घोटाले की पूरी स्क्रिप्ट डभौरा के एक छोटे से गांव दोंदर के रहने वाले रामकृष्ण मिश्रा ने लिखी। अनुकंपा नियुक्ति पर आया लिपिक रामकृष्ण मिश्रा ही इस घोटाले का मास्टरमाइंड था। वो अपने परिवार के लोगों के खाते में जिला सहकारी बैंक की डभौरा शाखा का पैसा भेजता रहा? जब गड़बड़ी सामने आई तो कुछ आरोपी जेल भेजे गए, तो कुछ अभी भी फरार हैं।

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पिछले महीने इस घोटाले से जुड़े एक आरोपी अभय कुमार मिश्रा, पुत्र राम आश्रम मिश्रा को 7 साल बाद CID(क्राइम इंवेस्टिगेशन डिपार्टमेंट) ने रीवा के एक मंदिर से पकड़ा। अभय कुमार इस मंदिर में पुजारी के वेश में रह रहा था। वो घोटाले के मुख्य आरोपी रामकृष्ण मिश्रा का चाचा है। उसके CID की गिरफ्त में आने के बाद एक बार फिर इस घोटाले की चर्चा होने लगी है। 10 साल पहले हुए इस घोटाले की जांच के साथ घोटाले की राशि और आरोपियों की संख्या बढ़ती गई।

जानिए 250 करोड़ के इस घोटाले की कहानी
रीवा सहकारी बैंक प्रधान कार्यालय से जिले में 18 ब्रांच संचालित हैं। जिले के तराई अंचल की शाखा है डभौरा। 2010 में बैंक के कर्मचारी अरविंद कुमार मिश्रा की माैत के बाद उनके बेटे रामकृष्ण मिश्रा को लिपिक के पद पर अनुकंपा नियुक्ति मिली। इस बैंक में रामकृष्ण मिश्रा और राघवेंद्र सिंह तोमर लिपिक की हैसियत में काम कर रहे थे। रामबली वर्मा यहां अकाउंटेंट था। अरुण सिंह ब्रांच मैनेजर था। नियुक्ति के कुछ ही दिन बाद रामकृष्ण मिश्रा ब्रांच मैनेजर बन गया। तब प्रधान कार्यालय में सीओ के पद पर बीके पचौरी और विजय सिंह परिहार पदस्थ थे।

बैंक में मई 2013 को मैनुअल बैंकिंग से CBS कोर बैंकिंग सिस्टम लागू की गई। इसके पहले मैनुअल तरीके से बैंक चलता था। इस दौरान मैनुअल रिकॉर्ड कम्प्यूटर में अपलोड किए जाने लगे। साथ ही, कम्प्यूटर से लेन-देन भी शुरू कर दिया गया। मैनुअल से कोर बैंकिंग में बदलाव की प्रोसेस के दौरान रामकृष्ण ने बैंक के दूसरे कर्मचारियों को इस साजिश में शामिल किया। फिर रिश्तेदारों के नाम पर कुछ नए खाते खोले गए। सहकारी बैंक के दो खाते ऐसे थे, जिनके जरिए बैंक अपना लेन-देन करता था। बैंक के इन दोनों खातों में जमा राशि को ये लोग रिश्तेदारों के खाते में जमा करने लगे। फिर इनके रिश्तेदार खाते से पैसे निकाल लेते थे।

इस तरह से इस घोटाले की शुरुआत हुई। बैंक के दो खातों से 5 मई 2013 से लेकर फरवरी 2015 के बीच लगभग दो साल तक गिरोह में शामिल ग्राहकों व रिश्तेदारों के खाते में पैसे भेजे जाते रहे। रामकृ​ष्ण मिश्रा ने पहले हजार दो हजार रुपए अपने रिश्तेदारों के खाते में ट्रांसफर कर इस घोटाले की शुरुआत की। फिर इसे 250 करोड़ रुपए तक पहुंचा दिया। वर्तमान में 210 करोड़ रु के हवाले की FIR दर्ज कर EOW (आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ) जांच कर रही है। वहीं CID 9 FIR दर्ज कराते हुए 16.54 करोड़, 7 करोड़, 20.88 लाख, 24 हजार, 3 करोड़, 2 करोड़, 1.17 करोड़, 81 लाख और 5.10 करोड़ के घपले की जांच कर रही है।

बैंक के दो खातों से गलत तरीके से हुई निकासी
रीवा सहकारी बैंक के दो खाते थे। इन दो खातों में डभौरा बैंक के पैसे जमा रहते थे। साथ ही प्रधान कार्यालय से लेन-देन और अन्य बैंकों का पैसा भी इसमें रहता था। ये दोनों खाते बैंक के थे। 2013 में कई ग्राहकों के नए खाते खोले गए। यहीं से गिरोह सक्रिय हो गया। सभी ने मिलकर कुछ पुराने खाता धारकों को भी इस साजिश में शामिल कर लिया। बैंक के दोनों खाते से पैसे का ट्रांजेक्शन उन लोगों के खातों में शुरू कर दिया गया, जो गिरोह में शामिल थे। रकम ट्रांसफर करने के बाद आरोपी आपस में बंदरबाट कर लेते थे।

पहली बार यूं हुआ घोटाले का खुलासा
कोर बैंकिंग सिस्टम के तहत डाटा ​फीडिंग करने वाली मुंबई की कंपनी ने सहकारी बैंक रीवा के प्रधान कार्यालय को लेटर लिखकर बड़े-बड़े ट्रांजेक्शन की जानकारी दी। इस लेटर में कहा गया कि इन दिनों डभौरा ब्रांच के कई ट्रांजेक्शन मिसमैच हो रहे हैं। ऐसे में तुरंत जांच की जाए, तब सहकारी बैंक ने जांच कराई। इसमें 16.54 करोड़ का घोटाला मिला। जांच जारी थी, इसके बावजूद रामकृष्ण मिश्रा को पद से नहीं हटाया गया। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि प्रधान कार्यालय के लोग भी इस साजिश में शामिल थे। दूसरी तरफ शाखा प्रबंधक रामकृष्ण मिश्रा बैंक के रिकाॅर्ड नष्ट करता रहा। डभौरा थाने में मार्च 2015 में FIR दर्ज की गई।

जांच करने वाले पुलिस अधिकारी खुद शामिल हो गए
डभौरा थाना प्रभारी राजेंद्र सिंह ने इस घोटाले की प्रारंभिक जांच शुरू की। इसके बाद एसआई एसपी चतुर्वेदी ने जांच की। यह जांच नवंबर 2015 तक चलती रही। जांच में फंसता देख रामकृष्ण मिश्रा समेत घोटाले के अन्य आरोपी कर्मचारी फरार हो गए। दिसंबर 2015 में तत्कालीन डभौरा SDOP DSP सुजीत बरकड़े और पनवार थाना प्रभारी SI अरुण सिंह को रामकृष्ण मिश्रा के बारे में सूचना मिली।

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पुलिस ने घेराबंदी कर आरोपी रामकृष्ण मिश्रा को परिवार समेत रुपए और सोना-चांदी के साथ पकड़ लिया। पुलिस ने सरकारी रिकाॅर्ड में उससे 14 लाख नकदी और गोल्ड की जब्ती दिखाई। इसी बीच एसपी आकाश जिंदल को जब्त राशि कम दिखाने और रुपए के बंदरबांट होने की जानकारी मिली। एसपी ने डभौरा SDOP और पनवार थाना प्रभारी को तलब किया। एसपी का एक्शन देख दोनों डर गए। फिर 67 लाख रुपए कैश, सोना-चांदी और एफडी के दस्तावेज पेश कर दिए। इन दोनों को भी आरोपी बनाते हुए निलंबित कर दिया गया।

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तीन ब्रांचों में पैसा भेजा, तीनों पर FIR
16.54 करोड़ के घोटाले की जांच में पता चला कि रामकृष्ण मिश्रा ने सहकारी बैंक सेमरिया से 3 करोड़, सहकारी बैंक बीड़ा से 2 करोड़ और सहकारी बैंक गोविंदगढ़ से 1 करोड़ 17 लाख रुपए ट्रांसफर कर डभौरा बैंक में लिए हैं। ऐसे में संबंधित तीनों ब्रांच के थाने में रामकृष्ण मिश्रा के​ खिलाफ FIR दर्ज कराई गई। हालांकि, इस घोटाले में रामकृष्ण असफल हो गया। इस तरह से पहले घोटाले की जांच करते समय 5 नए केस सामने आ गए।

पुलिस की संलिप्तता के बाद CID को सौंपी गई जांच
स्थानीय अधिकारियों की संलिप्तता के बाद एसपी ने मामले की जांच CID से कराने के लिए पत्र लिखा। एसपी के पत्र के बाद CID मुख्यालय भोपाल को जांच सौंप दी गई। जिसके लिए शुरुआती विवेचना DSP नेपाल सिंह दामड़े ने की। CID थाना भोपाल ने अपराध क्रमांक 1/16 दर्ज कर डभौरा SDOP सुजीत बरकड़े और पनवार थाना प्रभारी अरूण सिंह को भी आरोपी बनाया। जिनका ट्रायल भोपाल कोर्ट में चल रहा है। इनके खिलाफ अमानत में खयानत और गबन का केस चल रहा है। वर्ष 2017 में DSP नेपाल सिंह दामड़े रिटायर्ड हो गए। इसके बाद DSP असलम खान को जांच दी गई।

खाते में भेजे 60 करोड़ के चेक
CID की जांच में पता चला कि ICICI बैंक में ओम इंटरप्राइजेज नाम से एक खाता है। इसमें डभौरा बैंक के खाते से राशि भेजी गई। 15 लाख, 16 लाख और 9 लाख रुपए के तीन चेक यानी कुल 40 लाख के चेक भेजे गए। हालांकि, ये तीनों चेक क्लियर नहीं हो सके। अंतत: बैंक के खाते में पैसे वापस चले गए। जब ये राशि वापस डभौरा शाखा में पहुंच गई, तो फिर रामकृष्ण मिश्रा ने अपने छोटे भाई श्रीकृष्ण मिश्रा के खाते में इसे ट्रांसफर कर दिया। 40 लाख के चेक वापस कर दिए गए लेकिन यह खाता CID की जांच में लिया गया तो पाया गया कि इस खाते में 60 करोड़ के लेनदेन पहले ही हो चुके हैं।

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ओम इंटरप्राइजेज का मालिक निकला अगरबत्ती मजदूर
ICICI बैंक के जिस ओम इंटरप्राइजेज के खाते में 60 करोड़ के चेक भेजे गए थे, वो भी CID की जांच का विषय बना। जांच के दौरान खाताधारक की डिटेल निकाली गई तो प्रमोद तिवारी का नाम सामने आया। यही ओम इंटरप्राइजेज का मालिक बताया गया था। गांव के सरपंच के लेटरपैड से खाता खुला था। नाम और पता दोनों गलत निकले। फोटो के आधार पर CID प्रमोद के पास पहुंची। पता चला कि वह तो मजूदर है। अगरबत्ती बनाकर जीवन यापन करता है। नाम और फोटो सही है, लेकिन पता और सिग्नेचर गलत हैं।

12 खातों में मिला 210 करोड़ का लेनदेन
60 करोड़ के लेनदेन की जांच के दौरान ही CID को कई अन्य खातों में भी ट्रांजेक्शन की जानकारी मिली। संबंधित खातों की जांच की तो 12 खातों में 210 करोड़ का हवाला ट्रांजेक्शन​ मिला, जो ICICI बैंक, HDFC और एक्सिस बैंक के बड़े खातों से किया गया था। ये सभी खाते गरीब आदमियों के नाम पर खुले थे, साथ ही सभी खाते संदिग्ध पाए गए। ये पैसा नगद जमा होकर किसी न किसी फर्म को चला जाता था। पार्टी माल सप्लाई करती थी। फिर कालाधन का व्यवसायिक उपयोग भी हुआ। कुल मिलाकर इनकम टैक्स की चोरी की गई। इसकी सूचना CID मुख्यालय को दी गई। CID की अनुशंसा के बाद EOW (आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ) इकाई रीवा में प्रकरण दर्ज कर लिया गया।

11 फर्जी खातों में 210 करोड़ रुपए का ट्रांजेक्शन
जांच में HDFC बैंक और ICICI बैंक में फर्जी आईडी पर खोले गए 11 अकाउंट मिले। इन खातों में 1100 बार में 210 करोड़ से अधिक रुपए का ट्रांजेक्शन किया गया। हवाला और बेनामी संपत्ति मिलने के कारण CID ने विभागीय अफसरों को रिपोर्ट भेजी। इन खातों से कई कंपनियों, फैक्ट्रियों और व्यवसायिक संस्थानों में भुगतान किया गया।

पे-ऑर्डर जारी कर 7 करोड़ का घोटाला
CID जांच में पता चला कि रामकृष्ण मिश्रा ने इन सबके अलावा भी पे-ऑर्डर जारी कर 7 करोड़ का घोटाला किया है। इसका केस भी डभौरा थाने में दर्ज कराया गया है। जिसकी जांच आज भी चल रही है। 2019 में पता चला कि बाहर के बैंकों में बड़ी रकम भेजी गई है। इसमें नेशनल बैंक भी शामिल है। UTR नंबर का मिलान न होने पर रामकृष्ण मिश्रा की नियुक्ति दिनांक 2010 से जांच की गई।

जिससे पता चला कि रामकृष्ण मिश्रा खुद अपनी सैलरी बढ़ा लिया करता था। 24 हजार का गलत लेन-देन मिलने पर CID ने नवीन अपराध जवा थाने में दर्ज कराया। एक बात और सामने आई कि 2011 से 2013 के बीच फर्जी क्रेडिट नोट बनाकर 20 लाख 88 हजार रुपए का आहरण किया था। आरोपी ने ये पैसे अपनी पत्नी, मां और दोस्त के अकाउंट में भेजे थे। इसकी FIR डभौरा थाने में CID ने दर्ज कराई है।

इस घोटाले में अब तक 22 आरोपी
इस प्रकरण में CID ने अब तक कुल 24 लोगों को आरोपी बनाया था। इनमें दो लोगों के नाम गलत तरीके से जोड़े गए थे। जिन्हें जांच के बाद हटा दिया गया। ऐसे में वर्तमान समय में 22 आरोपी हैं। 18 आरोपी पहले पकड़े गए थे। 19वें आरोपी अभय कुमार मिश्रा की गिरफ्तारी हाल ही में हुई है। इस मामले में तीन आरोपी अभी भी फरार हैं।

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