आखिर वैष्णो फ्रूट के पास ऐसा कौन सा दिव्य फल या सरकारी संजीवनी है जो इसे चौबीसों घंटे दुकान चलाने की आजादी देती है?
रीवा। कहते हैं कि भारत के संविधान में कानून की नजर में सब बराबर हैं। अमीर हो या गरीब, रसूखदार हो या आम आदमी, नियम सबके लिए एक समान होने चाहिए। हमने और आपने किताबों में इसे बड़े चाव से पढ़ा है। लेकिन मध्य प्रदेश के रीवा शहर में कदम रखते ही इस संवैधानिक परिभाषा के पन्ने बिखर जाते हैं। यहाँ रात के 11:00 बजते ही रीवा पुलिस का चश्मा पूरी तरह से 'सिलेक्टिव' हो जाता है।
शहर की कानून-व्यवस्था का आलम यह है कि रात 11:00 बजते ही पुलिस की पीसीआर वैन सड़कों पर सायरन बजाने लगती है। रोजी-रोटी के लिए संघर्ष कर रहे एक गरीब चायवाले की केतली तक बंद करा दी जाती है, छोटे-छोटे दुकानदारों पर डंडे के दम पर शटर गिराने का दबाव बनाया जाता है। सुरक्षा और शांति के नाम पर पुलिस का यह खौफ जायज भी मान लिया जाए, लेकिन तभी रीवा के बीचों-बीच नियमों की इस सख्त चादर को तार-तार करती हुई एक रसूखदार दुकान 'वैष्णो फ्रूट कंपनी' चौबीसों घंटे सीना ताने खड़ी दिखाई देती है। रीवा पुलिस की आँखों में आँखें डालकर चल रहा नियमों का यह चीरहरण चीख-चीखकर गवाही दे रहा है कि रीवा में कानून सबके लिए बराबर नहीं है।
श्रम विभाग का स्पष्ट आदेश बनाम जमीनी हकीकत: रात 12:00 बजे की लक्ष्मण रेखा किसके लिए?
इस पूरे मामले में प्रशासनिक लापरवाही तब और ज्यादा उजागर हो गई, जब मध्य प्रदेश के श्रम विभाग (Labor Department) का एक अत्यंत स्पष्ट और कड़ा लिखित आदेश सामने आया। इस सरकारी आदेश में साफ-साफ अक्षरों में निर्देशित किया गया है कि रीवा सहित पूरे प्रदेश में दुकानों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के संचालन की अधिकतम समय-सीमा सुबह 6:00 बजे से लेकर रात्रि 12:00 बजे तक ही रहेगी। रात के 12:00 बजते ही हर हाल में व्यावसायिक गतिविधियों पर पूर्ण विराम लगाना अनिवार्य है।
श्रम विभाग के इस स्पष्ट कानूनी आदेश के बावजूद जय स्तंभ चौराहे पर संचालित वैष्णो फ्रूट कंपनी के लिए रात के 12:00 बजे की सुइयां और ये सरकारी नियम कोई मायने नहीं रखते। जब सरकार ने रात 12:00 बजे के बाद किसी भी स्थिति में दुकान खोलने पर पूर्ण प्रतिबंध लगा रखा है, तो फिर यह रसूखदार फल दुकान पूरी रात किस अदृश्य सरकारी संजीवनी और परमिशन के दम पर व्यापार कर रही है? श्रम विभाग के उड़नदस्ते और स्थानीय जिम्मेदार पुलिस थानों के मौन ने इस पूरे आदेश को महज़ एक रद्दी का टुकड़ा बनाकर रख दिया है।
जय स्तंभ पर कानून का चीरहरण: खाकी का डंडा इस दुकान के सामने आकर 'रस्सी' क्यों बन जाता है?
रीवा की प्रबुद्ध जनता और छोटे व्यापारी अब इस दोहरे चरित्र को देखकर भड़क उठे हैं। सवाल यह उठ रहा है कि जिस रीवा पुलिस के डंडे की धमक और सायरन की गूंज से आधी रात को परिंदा भी पर नहीं मार सकता, वो कड़क खाकी इस एक फल की दुकान के सामने आते ही लाचार और बेबस क्यों हो जाती है? जो डंडा गरीबों के ठेलों पर सरेराह चलता है, वो जय स्तंभ चौराहे की इस दुकान के आगे आकर 'रस्सी' क्यों बन जाता है?
सिविल लाइन थाना, समन थाना और यातायात पुलिस की चौकसी रोजाना इस वीआईपी चौराहे से होकर गुजरती है। प्रतिदिन रात को पुलिस के आला अधिकारी अपनी चमचमाती गश्ती गाड़ियों में यहाँ से निकलते हैं, लेकिन इस दुकान पर जलती अवैध लाइटें और आधी रात को सजती महफिलें उन्हें कभी दिखाई नहीं देतीं। यह अंधेरगर्दी साफ इशारा करती है कि या तो रीवा पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी रसूखदारों के आगे नतमस्तक हो चुके हैं, या फिर इस चौबीसों घंटे चलने वाले अवैध साम्राज्य के पीछे कोई बहुत बड़ा 'महीने का खेल' सेट है।
क्या रात के सन्नाटे में फल बेचना 'आपातकालीन सेवा' है? जनता के वो कड़वे सवाल जो साहबों को चुभेंगे
रीवा के छोटे व्यापारियों और प्रताड़ित हो रहे आम नागरिकों ने अब सोशल मीडिया से लेकर प्रशासनिक गलियारों तक सीधे और तीखे सवालों की बौछार कर दी है:
क्या फल बेचना इमरजेंसी सेवा है?: क्या रात के 2:00 बजे या 3:00 बजे फल बेचना कोई मेडिकल इमरजेंसी या आपातकालीन सेवा के अंतर्गत आता है, जो इसके लिए कानून की सीमाएं हटा दी गईं?
सिर्फ गरीबों पर ही रौब क्यों?: नियमों के नाम पर केवल उन कमजोर दुकानदारों का गला क्यों घोंटा जाता है जो रोज़ कमाते और रोज़ खाते हैं? रसूखदारों के सामने आते ही साहबों का कानून अंधा क्यों हो जाता है?
किसको मिल रही है ऊर्जा?: आम जनता तंज कसते हुए पूछ रही है कि क्या इस दुकान के वीआईपी फल खाकर रीवा पुलिस प्रशासन और नगर निगम के उड़नदस्ते को कुछ ज्यादा ही 'ऊर्जा और मलाई' मिल रही है, जिसके कर्ज तले वे दबे हुए हैं?
श्रम कानून की धज्जियां: श्रमिकों के शोषण और प्रशासनिक नपुंसकता पर बड़ा सवाल
श्रम विभाग के जानकारों का स्पष्ट रूप से मानना है कि दुकानों के संचालन का समय (रात 12:00 बजे तक) निर्धारित करने के पीछे कई बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण कारण होते हैं। इसमें कानून-व्यवस्था बनाए रखना, रात के समय होने वाले अपराधों पर नियंत्रण करना और सबसे महत्वपूर्ण— दुकानों में काम करने वाले गरीब श्रमिकों व कर्मचारियों के अधिकारों की रक्षा करना शामिल है ताकि उनका 24-24 घंटे बेरहमी से शोषण न किया जा सके।
लेकिन वैष्णो फ्रूट कंपनी में श्रम कानूनों की इस मूल भावना की रोज़ाना धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। जब श्रम विभाग ने किसी को भी कोई विशेष छूट या वीआईपी पास जारी नहीं किया है, तो फिर रीवा का स्थानीय प्रशासन इस खुले उल्लंघन पर मूकदर्शक क्यों बना हुआ है? नियमों का यह सरेआम माखौल न केवल श्रम कानूनों का मखौल उड़ाता है, बल्कि रीवा की संपूर्ण प्रशासनिक साख और निष्पक्षता पर एक बहुत बड़ा और कभी न मिटने वाला प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है।
उच्च अधिकारियों की 'फलदायक' मेहरबानी या बिकाऊ व्यवस्था?
जय स्तंभ चौराहे पर 24 घंटे संचालित हो रही वैष्णो फ्रूट कंपनी का यह पूरा तमाशा रीवा के लचर और सिलेक्टिव प्रशासनिक तंत्र का सबसे बड़ा और पुख्ता सबूत है। जब कानून आम नागरिक के लिए अलग डंडा लेकर चले और रसूखदारों के लिए पलकें बिछा दे, तो जनता का व्यवस्था से भरोसा उठना लाज़मी है।
रीवा के नवआगत और संवेदनशील उच्च अधिकारियों (कलेक्टर एवं पुलिस अधीक्षक) को अब इस 'फलदायक' मेहरबानी का तुरंत कड़ा संज्ञान लेना चाहिए। श्रम विभाग के स्पष्ट आदेशों का पालन रीवा के हर एक कोने में समान रूप से होना चाहिए। यदि इस 24 घंटे के अवैध धंधे और अतिक्रमण पर तत्काल बुलडोजर नहीं चला और कानूनी शटर नहीं गिरा, तो यह साफ मान लिया जाएगा कि रीवा में कानून का राज नहीं, बल्कि सिर्फ और सिर्फ रसूख और साठगांठ का राज चलता है। अब देखना यह है कि जिम्मेदार अधिकारी इस खुली चुनौती पर क्या एक्शन लेते हैं!