शिक्षा विभाग में महाविस्फोट! रीवा में 35 लाख से ज्यादा सरकारी किताबें गायब, दो ट्रकों के बराबर हुआ बड़ा खेल

 
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ऋतुराज द्विवेदी,रीवा/भोपाल। मध्य प्रदेश के रीवा जिले से सरकारी तंत्र की नाक के नीचे चल रहे एक बहुत बड़े भ्रष्टाचार का पर्दाफाश हुआ है। यहां के पाठ्य पुस्तक निगम के क्षेत्रीय डिपो से नौनिहालों के भविष्य पर डाका डालते हुए लाखों की तादाद में शासकीय किताबें गायब कर दी गईं। शुरुआती अनुमानों के मुताबिक, गोदाम के स्टॉक से 450 से ज्यादा बंडल, यानी करीब 35 से 36 लाख किताबें रहस्यमयी ढंग से गायब हैं। किताबों का यह जखीरा इतना बड़ा था कि इसे ले जाने के लिए कम से कम दो बड़े ट्रकों की जरूरत पड़ी होगी।

इस बेहद संवेदनशील मामले की गूंज राजधानी भोपाल तक पहुंच चुकी है। राज्य मुख्यालय से एक उच्च स्तरीय विशेष जांच दल फौरन रीवा के लिए रवाना किया गया, जिसने मौके पर पहुंचकर दस्तावेजों को अपने कब्जे में ले लिया है। वहीं, स्थानीय प्रशासन की मुस्तैदी के बाद पुलिस ने इस मामले में नामजद शिकायत के आधार पर प्राथमिकी (FIR) दर्ज कर ली है और जांच की कमान अपने हाथों में ले ली है।

कागजी हेरफेर और बाजार में बिक्री: कैसे रचा गया किताबों की चोरी का चक्रव्यूह?
इस पूरे घोटाले की कार्यप्रणाली बेहद चौंकाने वाली है। जांच टीम को जो शुरुआती इनपुट मिले हैं, उनसे यह साफ जाहिर होता है कि यह सिर्फ एक साधारण चोरी नहीं, बल्कि महीनों से चल रहा एक सोची-समझी साजिश का हिस्सा है।

  • दस्तावेजों का फर्जीवाड़ा: जो किताबें कागजों पर स्कूलों को भेजी जा चुकी थीं या रिकॉर्ड में बेची जा चुकी थीं, वे असल में या तो कभी वहां पहुंची ही नहीं या उन्हें चोरी-छिपे बाजार में खपा दिया गया।
  • सत्र की शुरुआत में ही लेटलतीफी: नया शिक्षा सत्र शुरू होने के तकरीबन डेढ़ महीने बाद तक सरकारी स्कूलों के छात्र किताबों के लिए तरसते रहे। प्रशासनिक अमला वितरण में देरी का रोना रोता रहा, जबकि हकीकत यह थी कि गोदाम का माल पहले ही साफ हो चुका था।
  • खुले बाजार में सरकारी संपत्ति की नुमाइश: जो किताबें गरीब बच्चों को मुफ्त में बांटी जानी थीं, वे रीवा और आसपास के जिलों की निजी बुक डिपो और दुकानों पर खुलेआम बेची जा रही थीं। इसी बात ने पूरे मामले से पर्दा उठाने में मुख्य भूमिका निभाई।

हाई-टेक सुरक्षा को धता बताकर दो ट्रक माल पार, अंदरूनी साठगांठ की बू
पाठ्य पुस्तक निगम के जिस मुख्य डिपो से यह किताबें गायब हुई हैं, उसकी सुरक्षा व्यवस्था को लेकर बड़े-बड़े दावे किए जाते रहे हैं। यह गोदाम अत्याधुनिक बारकोड ट्रैकिंग सिस्टम और चारों तरफ लगे सीसीटीवी कैमरों की निगरानी में रहता है। ऐसे में बिना किसी ताले को तोड़े या बिना किसी बाहरी जबरदस्ती के लाखों किताबों का गायब हो जाना कई गंभीर सवाल खड़े करता है।

जांच अधिकारियों का प्राथमिक निष्कर्ष:

"इतने बड़े पैमाने पर माल का बाहर जाना और कंप्यूटर डेटा में एंट्री का न होना सीधे तौर पर महकमे के अंदर बैठे भेदियों की तरफ इशारा करता है। बिना चौकीदारों, प्रबंधकों या एंट्री ऑपरेटरों की मर्जी के, कोई भी बाहरी व्यक्ति दो ट्रक किताबें लेकर रफूचक्कर नहीं हो सकता।"

इस साठगांठ के चलते सबसे बड़ा खामियाजा शासकीय स्कूलों के अंग्रेजी माध्यम के बच्चों को भुगतना पड़ रहा है, क्योंकि सत्र का एक बड़ा हिस्सा बीत जाने के बाद भी उन तक उनके हिस्से की पाठ्य सामग्री नहीं पहुंच सकी है।

भोपाल से आई स्पेशल टीम, पुलिस ने दर्ज की एफआईआर और शुरू की जांच
मामले की गंभीरता को देखते हुए रीवा के चौराहा पुलिस थाने में विभाग की ओर से आधिकारिक शिकायत दर्ज कराई गई है, जिसके बाद पुलिस ने तत्काल प्रभाव से अज्ञात व संदिग्ध आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है। भोपाल से आए तकनीकी विशेषज्ञों और ऑडिटरों का दल एक-एक इनवॉइस, स्टॉक रजिस्टर और कंप्यूटर लॉग्स की बारीकी से स्क्रूटनी कर रहा है।

पुलिस और विभागीय जांच का पूरा ध्यान फिलहाल उन कर्मचारियों पर केंद्रित है, जिनके पास गोदाम की चाबियां थीं या जो कंप्यूटर में आवक-जावक (स्टॉक एंट्री) को अपडेट करने के लिए अधिकृत थे। रीवा के वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि पूर्व में भी इस डिपो में प्रबंधकों के स्तर पर अनियमितताओं की शिकायतें आई थीं, लेकिन तब सख्त कदम न उठाए जाने के कारण आज इस बड़े घोटाले को अंजाम दिया गया। अधिकारियों ने भरोसा दिलाया है कि जांच पूरी होते ही सभी दोषियों पर कड़ी दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी।

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