16 लाख में दबा दी मरीज की मौत? रीवा नेशनल अस्पताल हादसे में पुलिस की कार्यशैली पर उठे गंभीर सवाल, जानिए पूरा सच

 
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रीवा के नेशनल अस्पताल लिफ्ट में फंसकर अमरपाटन के मरीज की मौत। परिजनों ने पुलिस पर लगाया FIR दबाने व 16 लाख में लाश का सौदा कराने का आरोप। जांच की मांग तेज।

ऋतुराज द्विवेदी,रीवा/भोपाल। (राज्य ब्यूरो) विंध्य अंचल के रीवा शहर स्थित नेशनल अस्पताल में घटी एक दिल दहला देने वाली घटना ने स्वास्थ्य व्यवस्था और स्थानीय पुलिस प्रशासन की कार्यशैली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। मैहर जिले के अमरपाटन थाना अंतर्गत लालपुर गांव के रहने वाले 59 वर्षीय सुरेश सेन कंधा टूटने के इलाज के लिए रीवा आए थे। लेकिन किसी को अंदाजा नहीं था कि जिस अस्पताल में वे स्वस्थ होने आए थे, वहीं का लिफ्ट सिस्टम उनके लिए काल बन जाएगा। लिफ्ट में फंसकर हुई दर्दनाक मौत और उसके बाद शुरू हुए घटनाक्रम ने न सिर्फ अस्पताल प्रबंधन की आपराधिक लापरवाही को उजागर किया है, बल्कि पुलिस प्रशासन की भूमिका को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है।

कैसे हुआ हादसा? पेड़ से गिरे मरीज के साथ लिफ्ट में घटी रोंगटे खड़े करने वाली घटना

प्राप्त जानकारी के मुताबिक, अमरपाटन क्षेत्र के लालपुर निवासी सुरेश सेन (59 वर्ष) शनिवार को पेड़ से गिर गए थे, जिससे उनके कंधे में गंभीर फ्रैक्चर हो गया था। बेहतर इलाज की उम्मीद में परिजन उन्हें रीवा के समान थाना क्षेत्र स्थित नेशनल अस्पताल लेकर पहुंचे।

शनिवार की रात जब मरीज को इलाज के लिए ऊपरी मंजिल पर ले जाया जा रहा था, तब वे जैसे ही लिफ्ट के अंदर कदम रखने लगे, तभी अचानक लिफ्ट का मैकेनिज्म फेल हो गया और लिफ्ट तेजी से नीचे गिर गई। इस अप्रत्याशित हादसे में सुरेश सेन का शरीर लिफ्ट के दरवाजों और शाफ्ट के बीच में फंस गया। उनका आधा शरीर लिफ्ट के अंदर और आधा बाहर ही लटकता रहा।

प्रत्यक्षदर्शियों और परिजनों के अनुसार, पीड़ित लगभग एक घंटे तक लिफ्ट में फंसा रहा और तड़पता रहा। दर्द से कराहते मरीज को निकालने या तत्काल राहत पहुंचाने की कोई व्यवस्था अस्पताल के पास मौजूद नहीं थी।

अस्पताल प्रबंधन की लापरवाही: बचाने के बजाय भाग खड़े हुए कर्मचारी

किसी भी आपातकालीन स्थिति में अस्पताल के कर्मचारियों और तकनीकी टीम का पहला कर्तव्य मरीज की जान बचाना होता है। लेकिन रीवा नेशनल अस्पताल में मानवता को तार-तार कर देने वाला नजारा देखने को मिला।

हादसा होते ही अस्पताल में अफरा-तफरी मच गई। जीवन रक्षा का दावा करने वाले अस्पताल का स्टाफ और प्रबंधन मरीज को सुरक्षित बाहर निकालने का प्रयास करने के बजाय मौके से भाग खड़ा हुआ। घंटों की मशक्कत और परिजनों के चिल्लाने के बाद जब किसी तरह शव को लिफ्ट से बाहर निकाला गया, तब तक सुरेश सेन की सांसें थम चुकी थीं।

मरीज को मृत देखकर परिजन आक्रोशित हो उठे। उन्होंने अस्पताल प्रबंधन पर सीधी आपराधिक लापरवाही (Criminal Negligence) का आरोप लगाते हुए कड़ी कार्रवाई और एफआईआर दर्ज करने की मांग शुरू कर दी।

पुलिस की भूमिका पर उठे गंभीर सवाल: एफआईआर की जगह 16 लाख में 'सौदा' कराने के आरोप

घटना की सूचना मिलने पर समान थाना पुलिस मौके पर पहुंची। हालांकि, मौके पर मौजूद लोगों और पीड़ित परिजनों का आरोप है कि पुलिस का रवैया निष्पक्ष जांच करने के बजाय मामले को दबाने वाला नजर आया।

  • एफआईआर दर्ज करने में टालमटोल: परिजन रातभर समान थाना प्रभारी से अस्पताल प्रबंधन के खिलाफ गैर-इरादतन हत्या का मामला दर्ज करने की गुहार लगाते रहे। आरोप है कि पुलिस खाकी की गरिमा भूलकर अस्पताल प्रबंधन के बचाव में खड़ी दिखाई दी।

  • दबाव और मध्यस्थता का खेल: रविवार दोपहर तक पुलिस पीड़ित परिवार पर एफआईआर न कराने और अस्पताल प्रबंधन के साथ समझौता करने का दबाव बनाती रही।

  • 16 लाख रुपये में समझौते का आरोप: स्थानीय प्रत्यक्षदर्शियों और परिजनों का कहना है कि पुलिस की मध्यस्थता में बंद कमरे में लंबी चर्चा हुई। अंततः अस्पताल प्रबंधन और मृतक के परिजनों के बीच 16 लाख रुपये का आर्थिक मुआवजा तय कराकर मामले को रफा-दफा करने का प्रयास किया गया। समझौता होने के बाद ही पुलिस ने शव को पंचनामा बनाकर पोस्टमार्टम के लिए भेजा और महज मर्ग कायम कर औपचारिकता पूरी की।

ओबीसी समाज का प्रदर्शन और थाने का घेराव: जब बैकफुट पर आई पुलिस

शनिवार की देर रात से लेकर रविवार सुबह तक जब पीड़ित परिवार न्याय के लिए भटक रहा था और पुलिस प्रशासन उन पर हावी होने की कोशिश कर रहा था, तब इस घटना की खबर शहर में आग की तरह फैल गई।

रविवार को ओबीसी समाज के कई प्रमुख नेता और स्थानीय प्रतिनिधि अस्पताल परिसर और थाने पहुंचे। भाजपा व्यापारी प्रकोष्ठ के मीडिया प्रभारी वंशी लाल साहू, ओबीसी समाज के नेता पप्पू कन्नौजिया सहित कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने एकत्र होकर अस्पताल प्रबंधन और पुलिस के खिलाफ मोर्चा खोल दिया।

सामाजिक संगठनों की सक्रियता और बढ़ते जनाक्रोश को देखते हुए समान थाना पुलिस और प्रशासन के पसीने छूट गए। नेताओं के सख्त तेवरों के कारण पुलिस को बैकफुट पर आना पड़ा। हालांकि, अंततः भारी दबाव और बंद कमरे की बातचीत के बीच आर्थिक समझौते पर ही सहमति बन सकी, जिससे कानून प्रवर्तन एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर गहरा दाग लगा है।

राजनीतिक सरगर्मी: अमरपाटन विधायक डॉ. राजेंद्र कुमार सिंह ने की उच्चस्तरीय जांच की मांग

इस गंभीर हादसे और उसके बाद हुए घटनाक्रम की गूंज राजनीतिक गलियारों में भी सुनाई दी। मृतक सुरेश सेन के गृह क्षेत्र अमरपाटन के कांग्रेसी विधायक डॉ. राजेंद्र कुमार सिंह ने इस घटना पर गहरा शोक व्यक्त किया और सोशल मीडिया (फेसबुक) पर पोस्ट शेयर कर अस्पताल प्रशासन व पुलिस व्यवस्था पर तीखे सवाल दागे।

डॉ. राजेंद्र कुमार सिंह ने अपनी मांग में स्पष्ट किया:

  1. उच्चस्तरीय एवं निष्पक्ष जांच: नेशनल अस्पताल में लिफ्ट के रखरखाव (Maintenance) और तकनीकी सुरक्षा मानकों की उच्चस्तरीय निष्पक्ष जांच कराई जाए।

  2. प्रबंधन पर सख्त कार्रवाई: दोषी अस्पताल संचालकों और लापरवाह कर्मचारियों पर तत्काल आपराधिक मामला दर्ज कर कानूनी कार्रवाई हो।

  3. उचित प्रशासनिक सहायता व मुआवजा: पीड़ित परिवार को सरकारी स्तर पर उचित मुआवजा और प्रशासनिक सहायता उपलब्ध कराई जाए।

विधायक के हस्तक्षेप के बाद से इस मामले ने और अधिक तूल पकड़ लिया है, और अब जिला प्रशासन पर निष्पक्ष जांच का चौतरफा दबाव है।

निजी अस्पतालों में सुरक्षा और लिफ्ट रखरखाव नियम (Safety Guidelines)

रीवा का यह हादसा देश भर के निजी अस्पतालों में लिफ्ट और इमरजेंसी उपकरणों की दयनीय स्थिति को उजागर करता है। National Building Code (NBC) और लिफ्ट सुरक्षा नियमों के अनुसार:

  • नियमित ऑडिट (Mandatory Safety Audit): प्रत्येक अस्पताल को हर 6 महीने में अधिकृत तकनीकी एजेंसी से अपनी लिफ्ट का सेफ्टी ऑडिट कराना अनिवार्य है।

  • इमरजेंसी एआरडी (Automatic Rescue Device): अस्पताल की लिफ्ट में ARD सिस्टम होना चाहिए ताकि पावर फेलियर या तकनीकी खराबी होने पर लिफ्ट खुद निकटतम फ्लोर पर जाकर खुल जाए।

  • आपातकालीन अलार्म व इंटरकॉम: लिफ्ट के अंदर 24x7 चालू हालत में इंटरकॉम और इमरजेंसी अलार्म बटन होना चाहिए।

  • प्रशिक्षित ऑपरेटर: 24 घंटे अस्पताल परिसर में लिफ्ट ऑपरेटर या इमरजेंसी रेस्क्यू टीम की मौजूदगी अनिवार्य है।

नेशनल अस्पताल में इन मानकों का कितना पालन किया जा रहा था, यह अब जांच का मुख्य विषय होना चाहिए।

पीड़ित परिवार के लिए कानूनी अधिकार और मुआवजा प्रक्रिया

भारतीय कानून के तहत यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु किसी संस्थान या अस्पताल की लापरवाही के कारण होती है, तो परिजनों के पास निम्नलिखित कानूनी अधिकार हैं:

  1. धारा 106 BNS (पुराना IPC 304A - लापरवाही से मौत): अस्पताल प्रबंधन के खिलाफ गैर-इरादतन लापरवाही का मामला दर्ज कराया जा सकता है।

  2. उपभोक्ता अदालत (Consumer Court): सेवा में कमी (Deficiency of Service) का दावा करके भारी मुआवजे की मांग की जा सकती है।

  3. मानवाधिकार आयोग (NHRC/SHRC): पुलिस द्वारा एफआईआर न लिखने या दबाव बनाने की स्थिति में राज्य मानवाधिकार आयोग में शिकायत दर्ज कराई जा सकती है।

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