कलेक्ट्रेट के सामने 'कमीशनराज': पासवर्ड जेब में लेकर भागा लिपिक, 700 परिवारों की सैलरी पर ठोका ताला : कलेक्टर साहब कब उठेगा चाबुक?
ऋतुराज द्विवेदी (राज्य ब्यूरो) मध्य प्रदेश के रीवा जिले में सरकारी कार्यप्रणाली की एक ऐसी संवेदनहीन तस्वीर सामने आई है, जिसने पूरे जिले के प्रशासनिक हलके में हलचल मचा दी है। विकासखंड शिक्षा अधिकारी (आहरण एवं संवितरण अधिकारी) रीवा कार्यालय के नियंत्रण में आने वाले करीब 700 कर्मचारियों और शिक्षकों का अगस्त माह का वेतन महीने की 5 तारीख बीत जाने के बाद भी उनके बैंक खातों में नहीं पहुँच पाया है।
इस गंभीर स्थिति के कारण सैकड़ों सरकारी कर्मचारियों और उनके परिवारों के सामने अचानक बड़ा आर्थिक संकट खड़ा हो गया है। एक तरफ राज्य सरकार हर महीने समय पर वेतन देने और डिजिटल गवर्नेंस के बड़े-बड़े दावे करती है, वहीं दूसरी तरफ रीवा कलेक्ट्रेट परिसर के ठीक सामने स्थित जिला कोषालय में एक अदद लिपिक की अनुपस्थिति के कारण सैकड़ों कर्मचारियों के चूल्हे ठंडे पड़ने की नौबत आ गई है।
तकनीकी ताला या व्यवस्थागत बदहाली: सिर्फ एक पासवर्ड के भरोसे क्यों ठप हुआ सरकारी सिस्टम?
वेतन न मिलने की जो अंदरूनी वजह सामने आ रही है, वह सरकारी मशीनरी के काम करने के तरीके पर तीखे सवाल खड़े करती है। जानकारी के मुताबिक, विकासखंड शिक्षा अधिकारी कार्यालय के 4396 हेड से संबंधित वेतन भुगतान की संपूर्ण ऑनलाइन प्रक्रिया उस कोषालय लिपिक के अवकाश पर चले जाने से ठप हो गई है, जिसके पास भुगतान स्वीकृति से संबंधित आवश्यक पासवर्ड मौजूद है।
आश्चर्य की बात यह है कि कोषालय में उस लिपिक की गैरहाजिरी के दौरान काम संभालने के लिए कोई वैकल्पिक पासवर्ड व्यवस्था या वैकल्पिक कर्मचारी नियुक्त नहीं किया गया था। यह स्थिति साफ दर्शाती है कि सरकारी सिस्टम में किस कदर लापरवाही हावी है। किसी एक व्यक्ति के छुट्टी पर चले जाने से 700 परिवारों की रोजमर्रा की जरूरतें रुक जाएं, यह न केवल वित्तीय प्रबंधन की विफलता है बल्कि सीधे तौर पर कर्मचारियों के अधिकारों की उपेक्षा भी है।
बीईओ दफ्तर की ढिलाई और कोषालय की अड़ंगेबाजी: वेतन में विलंब की दोहरी पटकथा
इस पूरे मामले में पड़ताल करने पर यह भी उजागर हुआ है कि अव्यवस्था की यह कहानी सिर्फ कोषालय तक सीमित नहीं है। इसमें विकासखंड शिक्षा अधिकारी कार्यालय की लापरवाही भी समान रूप से जिम्मेदार है। नियमों के मुताबिक बीईओ कार्यालय को समय रहते वेतन प्रकरण तैयार करके कोषालय भेजना चाहिए था, लेकिन इस बार बीईओ दफ्तर से भी बिल भेजने में अनावश्यक देरी की गई।
जब अंतिम समय में हड़बड़ी में प्रकरण कोषालय पहुँचा, तब तक संबंधित लिपिक छुट्टी पर जा चुका था। यदि बीईओ कार्यालय ने निर्धारित समय-सीमा के भीतर कागजात प्रस्तुत कर दिए होते और कोषालय प्रशासन ने पहले से कोई वैकल्पिक व्यवस्था रखी होती, तो आज 700 कर्मचारियों को अपने ही हक के वेतन के लिए दर-दर न भटकना पड़ता।
बैंक की पेनल्टी और सिबिल स्कोर का खतरा: कर्मचारियों पर आर्थिक व मानसिक दोहरी मार
वेतन अटकने की वजह से सबसे ज्यादा परेशान वे मध्यमवर्गीय कर्मचारी हैं, जिन्होंने अपने बच्चों की पढ़ाई, मकान या निजी जरूरतों के लिए बैंक से लोन ले रखे हैं। आमतौर पर हर महीने की 1 से 5 तारीख के बीच बैंकों की ईएमआई (EMI) कटने की ऑटो-डेबिट तारीख तय होती है।
खातों में पर्याप्त बैलेंस न होने के कारण बैंकों के ईसीएस और चेक बाउंस हो रहे हैं। इससे कर्मचारियों पर न केवल सैकड़ों रुपये का बाउंस पेनल्टी चार्ज लग रहा है, बल्कि उनका वित्तीय सिबिल (CIBIL) स्कोर भी खराब हो रहा है। सिबिल स्कोर बिगड़ने से कर्मचारियों को भविष्य में किसी भी बैंक से आपातकालीन ऋण मिलना बेहद मुश्किल हो जाएगा। प्रशासनिक खामी की वजह से भुगतनी पड़ रही इस आर्थिक और मानसिक प्रताड़ना को लेकर जिले भर के कर्मचारियों में भारी गुस्सा व्याप्त है।
कलेक्ट्रेट के सामने भर्रेशाही का आरोप: सुविधा शुल्क का खेल और एरियर फाइलों में अड़ंगेबाज़ी
कलेक्ट्रेट कार्यालय के ठीक सामने स्थित जिला कोषालय की कार्यशैली को लेकर कर्मचारियों का गुस्सा अब सरेआम फूट रहा है। कर्मचारियों का स्पष्ट कहना है कि कोषालय में भर्रेशाही का माहौल कोई नई बात नहीं है। यहाँ जानबूझकर बिलों को अटकाना और गैर-जरूरी आपत्तियाँ लगाकर फाइलें लौटाना एक रोज़मर्रा का तरीका बन चुका है।
विशेष तौर पर कर्मचारियों के एरियर भुगतानों से जुड़े बिलों में बार-बार अड़ंगे लगाए जाते हैं। पीड़ित कर्मचारियों का गंभीर आरोप है कि जिस फाइल में सुविधा शुल्क (कमीशन) की बात तय हो जाती है, वह पहली ही बार में बिना किसी आपत्ति के पास कर दी जाती है, जबकि नियमानुसार तैयार की गई फाइलों को महीनों लटकाया जाता है। इस तरह के रवैये से सरकारी महकमे में पारदर्शिता के दावों की हवा निकल रही है।
सिस्टम सुधार और तात्कालिक राहत की गुहार: क्या रीवा कलेक्टर करेंगे ठोस प्रशासनिक सर्जरी?
कर्मचारियों के विभिन्न संगठनों ने रीवा कलेक्टर से पूरे मामले का तत्काल संज्ञान लेने और सीधे हस्तक्षेप करने की मांग की है। कर्मचारियों का कहना है कि किसी एक कर्मचारी पर पूरी व्यवस्था को निर्भर रखना पूरी तरह से गलत है और भविष्य के लिए ऐसी व्यवस्था बनाई जानी चाहिए ताकि किसी के भी अवकाश पर रहने से काम न रुके।
कर्मचारियों ने मांग की है कि जिला कोषालय अधिकारी को तत्काल निर्देश जारी कर किसी अन्य अधिकारी या कर्मचारी के माध्यम से वैकल्पिक पासवर्ड की व्यवस्था कराई जाए। इसके साथ ही 24 घंटे के भीतर लंबित वेतन जारी कर कर्मचारियों को आर्थिक पेनल्टी और मानसिक तनाव से राहत दी जाए, वहीं बिलों को लटकाने वाले जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही भी तय की जाए।