विंध्य की राजनीति में भूचाल : सेमरिया विधायक अभय मिश्रा का PWD विभाग पर सीधा हमला, SDO के लिए 40 लाख और मुख्य अभियंता के प्रभार का रेट 3 करोड़ 

 
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ऋतुराज द्विवेदी,रीवा/भोपाल। (राज्य ब्यूरो) मध्यप्रदेश के लोक निर्माण विभाग (PWD) की कार्यप्रणाली और प्रशासनिक व्यवस्था एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है। रीवा जिले की सेमरिया विधानसभा सीट से कांग्रेस विधायक अभय मिश्रा ने विभाग के भीतर अफ़सरों को मिलने वाले अतिरिक्त प्रभार और पसंदीदा पदस्थापना को लेकर बेहद संगीन दावों की बौछार की है।

विधायक अभय मिश्रा ने PWD की मौजूदा प्रभार व्यवस्था की तुलना व्यावसायिक फ्रेंचाइजी से करते हुए कहा कि अधिकारी कथित रूप से 'मार्जिन मनी' चुकाकर प्रभार हासिल करते हैं। उन्होंने तंज कसते हुए मिसाल दी कि जैसे कोई कारोबारी वाशिंग पाउडर या शीतल पेय (कोका-कोला) की एजेंसी लेकर उसमें से अपना मुनाफा वसूलता है, ठीक उसी तर्ज पर विभाग में अधिकारी पद पाने के बाद अपनी लगाई गई रकम की भरपाई निचले स्तर पर रिश्वतखोरी और कटमनी के जरिए करते हैं।

40 लाख से 3 करोड़ तक के कथित दावों का सच: PWD के पदक्रम पर सवाल
पत्रकारों से चर्चा के दौरान विधायक ने दावा किया कि लोक निर्माण विभाग में पदस्थापना की एक अघोषित और अवैध दर तय हो चुकी है। उनके अनुसार, विभाग में अलग-अलग स्तरों के प्रभार के लिए अलग-अलग बोलियां लगाई जाने की बातें सामने आ रही हैं।

SDO स्तर का प्रभार: सहायक यंत्री या उपयंत्री स्तर के अधिकारियों को SDO का प्रभार दिलाने के नाम पर करीब 40 लाख रुपये के लेन-देन का दावा किया गया।
मुख्य अभियंता (Chief Engineer) का पद: संभाग स्तर पर मुख्य अभियंता (CE) जैसा सर्वोच्च प्रशासनिक प्रभार हासिल करने के लिए करीब 3 करोड़ रुपये तक के सौदे की चर्चा का जिक्र विधायक ने किया।
योग्यता की अनदेखी: विधायक का आरोप है कि नियमों, वरिष्ठता और प्रशासनिक दक्षता को ताक पर रखकर जब 'सेटिंग' के आधार पर कुर्सियां बांटी जाती हैं, तो पूरे विभाग का ढांचा भ्रष्टाचार की चपेट में आ जाता है।

जूनियर अफ़सरों को सीनियर पदों का प्रभार: प्रशासनिक नियंत्रण पर उठते सवाल
लोक निर्माण विभाग के संगठनात्मक ढांचे का हवाला देते हुए अभय मिश्रा ने विभागीय अधिकारियों की पदक्रम सूची (Hierarchy) का गणित समझाया। विभाग में प्रमुख अभियंता, मुख्य अभियंता, अधीक्षण यंत्री, कार्यपालन यंत्री, सहायक यंत्री और उपयंत्री के स्वीकृत पद होते हैं।

विधायक ने सवाल उठाया कि जब जिले में नियमानुसार वरिष्ठ और अनुभवी अधिकारी मौजूद हैं, तो उनके रहते हुए निचले रैंक के जूनियर अफ़सरों को बड़े पदों का अतिरिक्त प्रभार किस नियम के तहत दिया जा रहा है? उन्होंने कहा कि ऐसी व्यवस्था से न सिर्फ प्रशासनिक अनुशासन और जवाबदेही खत्म होती है, बल्कि वरिष्ठ अधिकारियों के मनोबल पर भी विपरीत असर पड़ता है।

लोकायुक्त ट्रैप के बाद गरमाई राजनीति: केवल छोटे कर्मचारियों पर गाज क्यों?
विधायक अभय मिश्रा की यह तीखी प्रतिक्रिया रीवा में हुई लोकायुक्त की एक बड़ी कार्रवाई के तुरंत बाद सामने आई है। लोकायुक्त पुलिस की टीम ने PWD के मुख्य अभियंता और संभागीय प्रभारी को सतना की एक फर्म से 50 हजार रुपये की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों दबोचा था।

विधायक का बड़ा सवाल: "अगर कोई अधिकारी करोड़ों रुपये देकर कुर्सी पर बैठता है और बाद में रिश्वत लेते हुए पकड़ा जाता है, तो केवल उस रंगे हाथ पकड़े गए अफ़सर पर केस दर्ज कर लेने से भ्रष्टाचार खत्म नहीं होगा। जांच इस बात की होनी चाहिए कि उस अधिकारी को कुर्सी तक पहुँचाने वाली 'चैन' में कौन-कौन से बड़े लोग शामिल थे।"

विधानसभा से सड़कों तक संग्राम: आधिकारिक जवाब और जांच का इंतजार
यह पहली बार नहीं है जब सेमरिया विधायक ने लोक निर्माण विभाग को निशाने पर लिया हो। इससे पहले भी वे मप्र विधानसभा के पटल पर PWD की गुणवत्ता, निर्माण कार्यों में अनियमितताओं और अफ़सरों की कार्यप्रणाली पर तारांकित प्रश्न उठा चुके हैं। लोकायुक्त की इस कार्रवाई ने उनके दावों को और हवा दे दी है।

आधिकारिक पक्ष का इंतजार:
हालांकि, विधायक अभय मिश्रा द्वारा लगाए गए 40 लाख से 3 करोड़ रुपये के लेन-देन के आरोपों पर फिलहाल PWD के उच्च अधिकारियों या शासन स्तर से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। इन दावों की किसी स्वतंत्र एजेंसी द्वारा आधिकारिक पुष्टि होना बाकी है। लेकिन इस खुलासे के बाद पूरे विंध्य अंचल की राजनीति और प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मच गया है।

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