Expose : डीन-अधीक्षक मस्त, मरीज पस्त; करोड़ो का बजट डकार गईं निजी कंपनियां! इजराइल सिक्योरिटी का रोब और हाइट्स की घोर लापरवाही, कब जागेंगे जिम्मेदार?
ऋतुराज द्विवेदी,रीवा/भोपाल। रीवा संभाग का सबसे बड़ा चिकित्सा केंद्र यानी संजय गांधी स्मृति चिकित्सालय और सुपर स्पेशलिटी अस्पताल इन दिनों मरीजों के इलाज के लिए कम और प्रशासनिक तानाशाही, वित्तीय अनियमितताओं व बदहाली के लिए ज्यादा जाना जा रहा है। कागजों पर और बड़ी-बड़ी प्रेजेंटेशन फाइलों में इस अस्पताल की तस्वीर ऐसी चमचमाती दिखाई जाती है मानो यहाँ कोई वीआईपी कॉर्पोरेट अस्पताल चल रहा हो।
लेकिन हकीकत की जमीन पर इस 'सफेद हाथी' की रीढ़ की हड्डी पूरी तरह टूट चुकी है। अस्पताल के भीतर कदम रखते ही समझ आ जाता है कि यहाँ मरीजों को भगवान भरोसे छोड़कर, जिम्मेदार प्रशासनिक अमला और निजी ठेका कंपनियां अपनी जेबें गरम करने के उत्सव में मग्न हैं।

मरीज एक अदद स्ट्रेचर और पहिएदार कुर्सी के लिए तड़प रहा है, वहीं अस्पताल के शीर्ष पदों पर बैठे जिम्मेदार अधिकारी अपनी प्राथमिकताओं में व्यस्त हैं। जब तक आम जनता इस व्यवस्था के असली चेहरों को बेनकाब नहीं करेगी, तब तक सुविधाओं के नाम पर केवल करोड़ों की ग्रांट ठिकाने लगाई जाती रहेगी।
अधीक्षक और डीन साहब की 'सुपर' लापरवाही: वातानुकूलित चैंबर बनाम बदहाल मरीज
अस्पताल के प्रबंधन की कमान जिन कंधों पर है—यानी मेडिकल कॉलेज के डीन (Dean) और अस्पताल के अधीक्षक (Superintendent)—उनकी कार्यशैली देखकर लगता है कि उनका जमीनी हकीकत से कोई वास्ता ही नहीं रह गया है।
- चिल्ड चैंबर और बंद फाइलें: साहब लोगों के अपने केबिन आलीशान एयर कंडीशनर (AC) की ठंडी हवा से महकते रहते हैं, लेकिन ठीक उनके दफ्तर के बाहर की गलियारों में उमस और गर्मी से बेहाल मरीज फर्श पर लेटने को मजबूर हैं।
- निरीक्षण का अभाव: हफ्तों बीत जाते हैं लेकिन जिम्मेदार अधिकारियों के पैर वार्डों की जमीनी हकीकत देखने के लिए नहीं उठते। यदि कभी औचक निरीक्षण की रस्म अदायगी होती भी है, तो वह केवल फोटो खिंचवाने और कागजी खानापूर्ति तक सीमित रह जाती है।
- जवाबदेही से पल्ला झाड़ना: अस्पताल के भीतर स्ट्रेचर गायब हों या दवाइयां न मिलें, डीन और अधीक्षक कार्यालय का एक ही घिसा-पिटा जवाब होता है—"मामले की जांच कराई जा रही है।" यह जांच कब शुरू होती है और कब खत्म, इसका पता आज तक रीवा की जनता को नहीं चल पाया।
प्राइवेट कंपनियों की मनमानी: 'हाइट्स' और 'इजराइल' सिक्योरिटी का वसूली तंत्र
संजय गांधी अस्पताल के बेपटरी होने के पीछे सबसे बड़ा हाथ यहाँ सक्रिय निजी एजेंसियों का है। अस्पताल के रख-रखाव का जिम्मा संभालने वाली 'हाइट्स' (Heights) कंपनी और सुरक्षा व्यवस्था की कमान संभालने वाली 'इजराइल' (Israel) सिक्योरिटी एजेंसी ने पूरे परिसर को अपनी जागीर बना लिया है।

"हाइट्स कंपनी का काम मरम्मत और सुविधाएं दुरुस्त रखना है, लेकिन इनकी लापरवाही के कारण पूरा इंफ्रास्ट्रक्चर आईसीयू में वेंटिलेटर पर नजर आता है। वहीं सुरक्षा के नाम पर तैनात इजराइल एजेंसी के सुरक्षाकर्मी गरीब और बेबस तीमारदारों पर रोब झाड़ने और अवैध वसूली के चक्रव्यूह में माहिर दिखते हैं।"
इन कंपनियों को करोड़ों रुपये का भुगतान सरकारी खजाने से सिर्फ इसलिए किया जाता है ताकि व्यवस्था चाक-चौबंद रहे। लेकिन धरातल पर इनका रवैया ऐसा है कि यदि मरीज या उसका अटेंडेंट अपनी वाजिब मांग भी रख दे, तो ये निजी सुरक्षाकर्मी उनसे बदतमीजी करने और उन्हें प्रताड़ित करने पर उतारू हो जाते हैं। इन कंपनियों की मॉनिटरिंग करने में अस्पताल प्रबंधन पूरी तरह नाकाम और नतमस्तक साबित हुआ है।
शौचालय या कबाड़खाना? बुनियादी सुविधाओं का खुला सरेंडर
अस्पताल की दुर्दशा का सबसे जीता-जागता उदाहरण यहाँ के शौचालय और वार्डों की व्हीलचेयर हैं। व्हीलचेयर की हालत देखकर ऐसा लगता है कि वह खुद डॉक्टरों से अपने टूटे हुए अंगों को जोड़ने की भीख मांग रही हो। पहिए जाम हैं और जंग खाया हुआ लोहा किसी भी वक्त किसी बड़े हादसे को आमंत्रण दे सकता है।
शौचालयों की स्थिति तो इतनी भयावह है कि वहां जाना किसी यातना कक्ष से गुजरने जैसा है। उखड़े हुए कमोड, बहता हुआ गंदा पानी और बजबजाती सीलन अस्पताल प्रबंधन के दावों के मुंह पर करारा तमाचा है। साफ-सफाई का बजट कहाँ पानी की तरह बहाया जा रहा है, यह बात हाइट्स कंपनी के जिम्मेदार लोग ही बेहतर बता सकते हैं। स्वच्छता के बुनियादी नियमों का यहाँ सरेआम सरेंडर हो चुका है।
पैपखरा का वो दर्दनाक सच: जब बर्न वार्ड में ही दम तोड़ गई इंसानियत
अस्पताल प्रशासन, डीन, अधीक्षक और जिम्मेदार वेंडर्स की सामूहिक लापरवाही का सबसे खौफनाक और दिल दहला देने वाला चेहरा पैपखरा गांव के उस हादसे के दौरान सामने आया था। जब घरेलू गैस सिलेंडर के रिसाव से लगी आग में तीन मासूम बच्चे और उनकी वृद्ध दादी बुरी तरह झुलस कर जिंदगी और मौत की जंग लड़ रहे थे।
उन्हें नाजुक हालत में संजय गांधी अस्पताल के बर्न वार्ड में भर्ती कराया गया था। उस भीषण, तपती गर्मी में उस तथाकथित अत्याधुनिक वार्ड के एसी और पंखे पूरी तरह बंद पड़े थे। रख-रखाव का दावा करने वाली कंपनी तमाशबीन बनी रही और अस्पताल प्रबंधन हाथ पर हाथ धरे बैठा रहा। लाचार होकर बच्चों के परिजनों को अपने घरों से टेबल पंखे और कूलर उठाकर वार्ड में लगाने पड़े थे।
व्यवस्था की इस घोर संवेदनहीनता और लापरवाही के चलते उन मासूमों और बुजुर्ग महिला की सांसें टूट गईं। उस दिन सिर्फ चार जिंदगियां शांत नहीं हुई थीं, बल्कि अस्पताल प्रबंधन की लापरवाही की आग में समूची इंसानियत और प्रशासनिक नैतिकता जलकर स्वाहा हो गई थी।