आखिरकार झुकना ही पड़ा! रीवा कोर्ट परिसर की बदहाली पर वकीलों का महाआंदोलन रंग लाया, 12 नई लिफ्ट और बनेगा हाईटेक पार्किंग जोन, वकीलों के आंदोलन ने रच दिया इतिहास

 
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ऋतुराज द्विवेदी, रीवा/भोपाल। मध्य प्रदेश के विंध्य क्षेत्र की न्यायधानी कहे जाने वाले रीवा जिला एवं सत्र न्यायालय परिसर से इस वक्त की सबसे बड़ी और राहत भरी खबर सामने आ रही है। पिछले काफी समय से बुनियादी सुविधाओं, जैसे- स्वच्छता की कमी, बदहाल पार्किंग, बंद पड़ी लिफ्ट और लगातार होने वाली बिजली कटौती से जूझ रहे रीवा के अधिवक्ताओं को आखिरकार एक ऐतिहासिक सफलता मिली है। वकीलों द्वारा चरणबद्ध तरीके से किए गए तीखे विरोध-प्रदर्शनों, अनवरत धरनों और प्रशासनिक तंत्र के खिलाफ 'आर-पार की लड़ाई' के सीधे ऐलान के बाद शासन-प्रशासन को घुटने टेकने पड़े हैं।

न्यायालय परिसर की पूरी सूरत बदलने और इसे आधुनिक व सुविधायुक्त बनाने के लिए सरकार द्वारा करोड़ों रुपये के भारी-भरकम बजट को वित्तीय स्वीकृति दे दी गई है। इस फंड के जारी होने से न केवल रीवा के हजारों अधिवक्ताओं को अपने रोजमर्रा के कामकाजी जीवन में सुविधा मिलेगी, बल्कि दूर-दराज के गांवों से आने वाले हजारों वादकारियों (मरीजों और मुवक्किलों की तरह परेशान आम जनता) को भी कोर्ट परिसर के भीतर एक बेहतर और सम्मानजनक माहौल मिल सकेगा।

वकीलों का अनवरत संघर्ष: क्यों उठानी पड़ी थी आर-पार की आवाज और क्या थे जमीनी हालात?
नवीन जिला न्यायालय परिसर का निर्माण जब किया गया था, तब यह उम्मीद जताई गई थी कि यह विंध्य क्षेत्र का सबसे आधुनिक न्यायिक परिसर होगा। परंतु, समय बीतने के साथ ही इस नए परिसर की व्यवस्थाएं पूरी तरह वेंटिलेटर पर चली गईं। नए भवन में न तो वकीलों के बैठने के लिए व्यवस्थित जगह थी, न ही गाड़ियों को खड़ा करने के लिए कोई सुरक्षित पार्किंग जोन। इसके अलावा, बहुमंजिला इमारतों में लगाई गई लिफ्ट अक्सर तकनीकी खराबी के कारण बंद रहती थीं, जिससे बुजुर्ग और दिव्यांग मुवक्किलों को कोर्ट रूम तक पहुंचने में भारी मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ता था।

इन तमाम जनहित और अधिवक्ता हित से जुड़ी समस्याओं को लेकर रीवा जिला अधिवक्ता संघ के नेतृत्व में वकीलों ने शांतिपूर्ण ज्ञापनों से लेकर उग्र आंदोलनों का रास्ता अख्तियार किया। कई बार अदालती कामकाज का बहिष्कार किया गया, जिससे प्रशासनिक हलकों में खलबली मच गई। वकीलों का साफ कहना था कि जब तक कोर्ट परिसर में पीने का साफ पानी, शौचालय की स्वच्छता, सुचारु बिजली और सुगम आवागमन सुनिश्चित नहीं होता, तब तक वे चुप नहीं बैठेंगे। अधिवक्ताओं के इसी सामूहिक और फौलादी दबाव का नतीजा है कि आज करोड़ों रुपये के विकास कार्यों की फाइल को हरी झंडी मिल चुकी है।

सफाई व्यवस्था के लिए विशेष मासिक फंड: रीवा नगर निगम को हर महीने मिलेंगे 4 लाख रुपये
न्यायालय परिसर में गंदगी का साम्राज्य एक ऐसा मुद्दा था, जिससे कोर्ट आने वाले हर शख्स को सिरदर्द होता था। पान-गुटखे की पीक से सने कोने और कचरे के ढेर नए भवन की सुंदरता पर बदनुमा दाग बन चुके थे। इस समस्या के स्थाई समाधान के लिए एक बेहद व्यावहारिक प्रशासनिक रास्ता निकाला गया है।

अब जिला एवं सत्र न्यायालय परिसर और उसके आसपास के पूरे क्षेत्र को चकाचक रखने के लिए रीवा नगर निगम को सीधे तौर पर जवाबदेह बनाया गया है। नगर निगम को इस स्वच्छता अभियान को सुचारु रूप से चलाने के लिए हर महीने ₹4 लाख की विशेष राशि आवंटित की जाएगी। इस मासिक बजट का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोर्ट परिसर में रोजाना सुबह-शाम अत्याधुनिक मशीनों और पर्याप्त सफाई कर्मियों के माध्यम से झाड़ू, पोंछा और सैनिटाइजेशन का काम हो। कचरा निपटान के लिए डस्टबिन की व्यवस्था की जाएगी ताकि स्वच्छता का स्तर किसी भी बड़े कॉर्पोरेट परिसर जैसा नजर आए।

पार्किंग संकट का परमानेंट समाधान: नगर निगम को ₹87 लाख का मास्टर प्लान लागू करने के निर्देश
रीवा कोर्ट परिसर में पैर रखने वाले किसी भी व्यक्ति से अगर आप पूछें कि यहाँ की सबसे बड़ी समस्या क्या है, तो उसका एक ही जवाब होता था—'पार्किंग'। वकीलों की गाड़ियां, अदालती कर्मचारियों के वाहन और रोजाना आने वाले सैकड़ों फरियादियों की मोटरसाइकिलें व कारें अव्यवस्थित तरीके से खड़ी रहती थीं। इसके कारण न केवल जाम की स्थिति बनती थी, बल्कि कई बार आपातकालीन वाहनों (जैसे एम्बुलेंस या पुलिस वैन) को निकलने का रास्ता तक नहीं मिलता था।

अधिवक्ताओं की इस जायज मांग को स्वीकार करते हुए प्रशासन ने पार्किंग व्यवस्था के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए ₹87 लाख की भारी राशि सीधे रीवा नगर निगम को हस्तांतरित कर दी है। इस राशि से कोर्ट परिसर के भीतर एक सुनियोजित, सुरक्षित और आधुनिक पार्किंग लॉट का निर्माण किया जाएगा। इसमें वकीलों के लिए अलग, न्यायधीशों व स्टाफ के लिए अलग और आम जनता के लिए अलग पार्किंग जोन निर्धारित किए जाएंगे। गाड़ियों की सुरक्षा के लिए उचित लाइटिंग और बैरिकेडिंग की व्यवस्था भी इस मास्टर प्लान का हिस्सा है।

12 नई आधुनिक लिफ्टों की सौगात: बुजुर्गों और दिव्यांगों के सफर को सुगम बनाने के लिए ₹1.23 करोड़ मंजूर
न्यायालय की बहुमंजिला इमारतों में लिफ्ट का काम न करना मानवाधिकारों के उल्लंघन जैसा था। व्हीलचेयर पर आने वाले दिव्यांगों और लाठी टेककर चलने वाले बुजुर्गों को तीसरी और चौथी मंजिल पर स्थित अदालतों तक सीढ़ियों के सहारे ले जाना किसी बुरे सपने जैसा था। वकीलों ने इस मुद्दे को पूरी संवेदनशीलता के साथ अपने आंदोलन का मुख्य एजेंडा बनाया था।

प्रशासन ने इस दर्द को समझते हुए कोर्ट परिसर में 12 नई अत्याधुनिक लिफ्ट लगाने के प्रस्ताव को मंजूरी दी है, जिसके लिए ₹1 करोड़ 23 लाख का बजट अलॉट किया गया है। इस योजना को पूरे परिसर में समान रूप से लागू किया जाएगा:

  • मुख्य भवन (Main Building): यहाँ सबसे ज्यादा भीड़भाड़ होती है, इसलिए मुख्य भवन में 6 नई लिफ्ट लगाई जाएंगी।
  • सेवा भवन (Seva Bhavan): अदालती कामकाज और रिकॉर्ड रूम वाले इस हिस्से में 3 लिफ्ट स्थापित होंगी।
  • अधिवक्ता भवन (Advocate Bhavan): वकीलों के उठने-बैठने और चैंबर्स वाले इस ब्लॉक में भी 3 नई लिफ्ट दी जाएंगी।
  • इन लिफ्टों के चालू होने के बाद कोर्ट के भीतर वर्टिकल ट्रांसपोर्टेशन (ऊपर-नीचे आना-जाना) बेहद आसान और बाधारहित हो जाएगा।

बिजली ग्रिड और नए ट्रांसफार्मर: ₹93 लाख की अतिरिक्त मंजूरी से कोर्ट परिसर में अब नहीं होगी बत्ती गुल
गर्मियों के दिनों में रीवा कोर्ट परिसर के भीतर बिजली की अघोषित कटौती और लो-वोल्टेज की समस्या के कारण वकीलों और न्यायाधीशों का काम करना दूभर हो जाता था। कंप्यूटर बंद होने से अदालती आदेशों की टाइपिंग रुक जाती थी और केसों की तारीखें आगे बढ़ानी पड़ती थीं। इस तकनीकी अपंगता को दूर करने के लिए बिजली विभाग के समन्वय से एक बड़ा प्रोजेक्ट तैयार किया गया है।

न्यायालय परिसर की बिजली आपूर्ति को पूरी तरह निर्बाध और मजबूत बनाने के लिए ₹93 लाख का एक अतिरिक्त विशेष फंड मंजूर किया गया है। इस पैसे का उपयोग कोर्ट परिसर के भीतर एक डेडीकेटेड बिजली उपकेंद्र (Substation) लाइन खींचने और उच्च क्षमता वाले नए ट्रांसफार्मर स्थापित करने के लिए किया जाएगा। इसके साथ ही, आंतरिक वायरिंग को दुरुस्त किया जाएगा ताकि ओवरलोडिंग की वजह से होने वाले शॉर्ट-सर्किट या ट्रिपिंग की समस्या हमेशा के लिए खत्म हो सके। अब कोर्ट की कार्यप्रणाली बिना किसी पावर कट के डिजिटल तरीके से सुचारु रूप से चल सकेगी।

अधिवक्ताओं के आंदोलन का असर: एकता और प्रशासनिक जवाबदेही की सबसे बड़ी मिसाल
रीवा के वकीलों का यह आंदोलन केवल कुछ सुविधाओं को हासिल करने की लड़ाई नहीं थी, बल्कि यह प्रशासनिक तंत्र की लापरवाही के खिलाफ जनता की सहूलियत की लड़ाई थी। बार एसोसिएशन और आम अधिवक्ताओं ने जिस तरह से एकजुट होकर, कड़कड़ाती धूप और विपरीत परिस्थितियों में भी अपना धरना जारी रखा, उसने रीवा संभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि वकीलों की जायज मांगों को अब और टाला नहीं जा सकता।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि स्वीकृत किए गए इन सभी विकास कार्यों के पूरा होने के बाद, रीवा जिला न्यायालय मध्य प्रदेश के सबसे बेहतरीन और सर्वसुविधायुक्त न्यायालयों की सूची में शुमार हो जाएगा। यह जीत इस बात का जीवंत प्रमाण है कि लोकतंत्र में जब प्रबुद्ध वर्ग (अधिवक्ता) समाज और व्यवस्था की कमियों के खिलाफ शांतिपूर्ण लेकिन दृढ़ संकल्प के साथ खड़ा होता है, तो उसका परिणाम हमेशा लोक-कल्याणकारी ही होता है।

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