"राजेंद्र शुक्ला का खास हूँ, पुलिस मेरा क्या उखाड़ेगी!"... फल की आड़ में पूरी रात नशे का बाज़ार! सिविल लाइन पुलिस की शह पर वैष्णो फ्रूट कंपनी बनी असामाजिक तत्वों का अड्डा, सो रहा रीवा प्रशासन
ऋतुराज द्विवेदी,रीवा/भोपाल। मध्य प्रदेश के रीवा शहर का दिल कहे जाने वाले जय स्तंभ चौराहे पर इन दिनों कानून और नियमों का सरेआम मखौल उड़ाया जा रहा है। शहर के बाकी व्यापारियों के लिए जहाँ रात 10:00 से 11:00 बजे के बीच अपनी शटर गिराने की सख्त कानूनी समय-सीमा निर्धारित है, वहीं चौराहे पर संचालित 'वैष्णो फ्रूट कंपनी' के लिए कानून की परिभाषा पूरी तरह बदली हुई नजर आती है। रीवा का पुलिस और प्रशासनिक अमला इस एक रसूखदार फल संचालक पर इस कदर मेहरबान है कि इसकी दुकान के लिए घड़ी की सुइयां कभी मायने नहीं रखतीं।
दिन हो या रात, यहाँ नियम-कायदों को ताक पर रखकर 24 घंटे कारोबार बेधड़क जारी रहता है। आम दिनों में अगर कोई छोटा दुकानदार रात को 5 मिनट भी ज्यादा दुकान खोल ले, तो पुलिस की पीसीआर वैन के सायरन और डंडे उसे दुकान बंद करने पर मजबूर कर देते हैं। लेकिन जय स्तंभ चौराहे पर सजी इस दुकान के सामने से प्रतिदिन रात को पुलिस के आला अधिकारी अपनी गश्ती गाड़ियों में निकलते हैं और इस खुलेआम हो रहे उल्लंघन को देखकर भी अपनी आंखें मूंद लेते हैं। यह दोहरा रवैया रीवा प्रशासन की नीयत पर गंभीर सवालिया निशान खड़ा करता है।
सिविल लाइन थाना और यातायात पुलिस से चंद कदमों की दूरी पर 24 घंटे दुकान कैसे खुली है?
इस पूरे मामले का सबसे हैरान करने वाला और गंभीर पहलू इसकी भौगोलिक स्थिति है। वैष्णो फ्रूट कंपनी की यह दुकान किसी सुदूर कोने या अंधेरी गली में नहीं है। यह दुकान सिविल लाइन थाना और यातायात पुलिस चौकी से मात्र 200 मीटर की दूरी पर स्थित है। यहाँ से महज चंद कदमों की दूरी पर खाकी का पहरा रहता है, फिर भी कानून की नाक के नीचे नियमों का यह चीरहरण रोज़ाना हो रहा है।
जनता के बीच उठ रहे कड़वे सवाल:
- क्या हर महीने का 'फिक्स' पहुंच रहा है?: स्थानीय गलियारों और जनचर्चाओं में यह सवाल तैर रहा है कि क्या सिविल लाइन थाने और यातायात विभाग को इस दुकान के निर्बाध संचालन के बदले हर महीने कोई 'मोटा नजराना' या 'फिक्स एमाउंट' पहुंचाया जा रहा है?
- 2 किमी बनाम 200 मीटर का खेल: पुलिस के जो जवान और गश्ती गाड़ियां रात में 2 किलोमीटर दूर जाकर दुकानों को चालानी कार्रवाई की धमकी देकर बंद कराती हैं, उन्हें अपने थाने से महज 200 मीटर की दूरी पर जलती बत्तियां और सजती महफ़िल क्यों दिखाई नहीं देती?
- कानून अंधा है या व्यवस्था बिकाऊ है?: क्या रीवा पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों के लिए जय स्तंभ चौराहे पर आकर कानून अंधा हो जाता है, या फिर '5 किलो खास आम' के बदले पूरी रात का वीआईपी पास इस फ्रूट दुकान को जारी कर दिया गया है?
एसपी ऑफिस के नाक के नीचे रसूख का नशा: "राजेंद्र शुक्ला का खास हूँ, थाना मेरा क्या करेगा?"
वैष्णो फ्रूट संचालक की इस बेखौफ दबंगई के पीछे सिर्फ प्रशासनिक ढील नहीं, बल्कि सत्ता और रसूख का वो नशा है जो रीवा के वीआईपी इलाके में सरेआम महकता है। यह दुकान रीवा पुलिस अधीक्षक (SP) कार्यालय के भी बेहद करीब है। लेकिन दुकान संचालक को न तो पुलिस का डर है और न ही कानून का। स्थानीय लोगों और प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, दुकान संचालक सरेआम रौब झाड़ते हुए कहता है:
दुकान संचालक का खुला दावा: "मैं राजेंद्र शुक्ला (उपमुख्यमंत्री) का बेहद खास आदमी हूँ। ये सिविल लाइन थाना वाले या यातायात वाले मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते। दुकान तो 24 घंटे ही चलेगी, जिसे जो करना है कर ले।"
एक तरफ प्रदेश की सरकार और कद्दावर नेता राजेंद्र शुक्ला रीवा के विकास और कानून व्यवस्था को सुदृढ़ करने के दावे करते हैं, तो दूसरी तरफ उन्हीं के नाम की आड़ लेकर ऐसे छोटे-मोटे रसूखदार ज़मीनी स्तर पर कानून को जेब में लेकर घूमते हैं। जब अपराधी या नियम तोड़ने वाला खुद को सत्ता का संरक्षण प्राप्त बताने लगे, तो स्थानीय पुलिस भी हाथ पर हाथ धरे बैठ जाती है। यही कारण है कि एसपी ऑफिस के बगल में ही इस संचालक का अवैध सम्राज्य फल-फूल रहा है।
पार्किंग स्थल पर अवैध कब्जा और कबाड़ी मोहल्ला से दुकान न हटने का रहस्य क्या है?
जय स्तंभ चौराहे की यह जगह मूल रूप से आम जनता की गाड़ियों को खड़ा करने के लिए 'पार्किंग स्थल' के रूप में आरक्षित की गई थी, ताकि चौराहे पर ट्रैफिक जाम की स्थिति न बने। लेकिन वैष्णो फ्रूट कंपनी ने इस पूरी पार्किंग स्पेस को अपनी निजी जागीर बना लिया है। दुकान की सीमाएं हर दिन पार्किंग स्थल पर आगे बढ़ती जा रही हैं। अवैध शेड, कबाड़ और फलों की टोकरियों को इस तरह फैलाया गया है कि आम जनता को अपनी गाड़ियां सड़क पर खड़ी करनी पड़ती हैं, जिससे पूरे कबाड़ी मोहल्ला और जय स्तंभ क्षेत्र में अक्सर जाम की स्थिति बनी रहती है।
जनता लंबे समय से यह मांग कर रही है कि इस अवैध दुकान को कबाड़ी मोहल्ला के इस मुख्य चौराहे से हटाकर किसी वेंडिंग ज़ोन में शिफ्ट किया जाए। लेकिन सालों बीत जाने के बाद भी इस दुकान को यहाँ से टस से मस नहीं किया जा सका। आखिर इस दुकान को न हटाने के पीछे कौन सी अदृश्य शक्ति काम कर रही है? क्या रीवा का मास्टर प्लान और यातायात व्यवस्था इस एक फल की दुकान के सामने घुटने टेक चुके हैं?
नगर निगम कमिश्नर और उड़नदस्ता बेखबर या हर महीने का 'फिक्स आम' का खेल सेट है?
प्रशासनिक लापरवाही की इस कड़ी में रीवा नगर निगम की भूमिका भी उतनी ही संदिग्ध है जितनी पुलिस की। रीवा नगर निगम के कमिश्नर शहर को स्वच्छ, सुंदर और अतिक्रमण मुक्त बनाने के लंबे-चौड़े दावे करते हैं। निगम का 'अतिक्रमण विरोधी उड़नदस्ता' वाहन रोजाना दिन में तीन बार सरकारी तेल फूंकते हुए शहर की सड़कों पर सायरन बजाकर घूमता है। यह उड़नदस्ता वाहन जय स्तंभ चौराहे से ही होकर गुजरता है।
हैरानी की बात है कि फुटपाथ पर सब्जी बेचने वाले गरीब रेहड़ी-पटरी वालों का तराजू और सामान जब्त कर लेने वाले इस उड़नदस्ते को पार्किंग स्थल पर फैला हुआ इतना बड़ा अतिक्रमण कभी नजर क्यों नहीं आता? क्या नगर निगम के कमिश्नर और उनके मातहत अधिकारियों की आंखों पर रसूखदारों के चश्मे चढ़े हुए हैं? या फिर जनचर्चा के मुताबिक, साहब के बंगले पर हर हफ्ते ताजे और महंगे फलों की जो टोकरियां मुफ्त में पहुंचती हैं, उन्होंने निगम की कार्रवाई की धार को कुंद कर दिया है? जब तक नगर निगम इस पर बुलडोजर नहीं चलाता, तब तक मिलीभगत के इन आरोपों को खारिज नहीं किया जा सकता।
फल की आड़ में देर रात गुटखा-डिस्पोजल का धंधा और असामाजिक तत्वों का जमावड़ा
वैष्णो फ्रूट कंपनी की दुकान का सच सिर्फ 'फल बेचने' तक सीमित नहीं है। रात के 11:00 बजते ही इस दुकान का रूप पूरी तरह बदल जाता है। फल की आड़ लेकर यहाँ पूरी रात पानी की बोतलें, कोल्ड ड्रिंक्स, डिस्पोजल सामग्रियां, सिगरेट, राजश्री और गुटखा जैसे नशीले उत्पादों की खुलेआम बिक्री की जाती है। चूंकि पूरे रीवा शहर में देर रात यह सब सामान कहीं और नहीं मिलता, इसलिए इस दुकान पर रात भर असामाजिक तत्वों, शराबियों और आवारा लड़कों का जमावड़ा लगा रहता है।
रात के सन्नाटे में इस दुकान के आसपास गाड़ियों की कतारें लगी रहती हैं, तेज आवाज में गाने बजते हैं और विवाद की स्थितियां निर्मित होती हैं। स्थानीय निवासियों और वहाँ से गुजरने वाली महिलाओं के लिए देर रात जय स्तंभ चौराहा असुरक्षित बन चुका है। फल बेचने के लाइसेंस की आड़ में पूरी रात नशे के सामान और डिस्पोजल की यह अवैध मंडी रीवा की सामाजिक शांति के लिए एक बड़ा खतरा बन चुकी है, जिसे पुलिस जानबूझकर नजरअंदाज कर रही है।
जय स्तंभ चौराहे पर संचालित वैष्णो फ्रूट कंपनी का यह पूरा मामला रीवा के लचर प्रशासनिक और पुलिसिया तंत्र का एक जीता-जागता प्रमाण है। जब कानून आम नागरिक के लिए अलग और रसूखदारों के लिए अलग हो जाए, तो जनता का व्यवस्था से भरोसा उठने लगता है। सिविल लाइन थाना, यातायात पुलिस और नगर निगम की यह त्रिकोणीय खामोशी किसी बड़े लेन-देन या सत्ता के दबाव की तरफ साफ इशारा करती है। यदि रीवा पुलिस अधीक्षक और नगर निगम कमिश्नर वास्तव में निष्पक्ष हैं, तो उन्हें तुरंत संज्ञान लेकर इस अतिक्रमण को हटाना चाहिए और 24 घंटे के इस अवैध धंधे पर पूर्ण विराम लगाना चाहिए।