"100 में से सिर्फ ढाई नंबर दूंगा!" रीवा में सांसद जनार्दन मिश्रा का बड़ा हमला, महापौर से मांगा 5 साल का रिपोर्ट कार्ड : 'जनता को दो पाई-पाई का हिसाब'
ऋतुराज द्विवेदी,रीवा/भोपाल। (राज्य ब्यूरो) मध्य प्रदेश के विंध्य क्षेत्र के सबसे बड़े केंद्र रीवा में इन दिनों राजनीतिक पारा अपने चरम पर है। यहां की स्थानीय राजनीति में एक नया भूचाल देखने को मिला है, जब भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के वरिष्ठ सांसद ने शहर के शीर्ष प्रशासनिक और राजनीतिक पद पर बैठे व्यक्ति के खिलाफ कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया। यह पूरा घटनाक्रम शहर के विकास, बजट के इस्तेमाल और प्रशासनिक प्राथमिकताओं को लेकर शुरू हुआ है, जिसने आम जनता के बीच भी बड़ी चर्चा छेड़ दी है।
जनार्दन मिश्रा का तीखा हमला: 100 में से दिए सिर्फ ढाई नंबर
रीवा के सांसद जनार्दन मिश्रा ने वर्तमान कांग्रेस महापौर अजय मिश्रा बाबा के पूरे पांच साल के कार्यकाल पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। एक सार्वजनिक बयान में सांसद ने तीखा प्रहार करते हुए कहा कि महापौर अपने कार्यकाल के दौरान जनता की उम्मीदों पर पूरी तरह खरे उतरने में असफल रहे हैं। सांसद ने तंज कसते हुए यह तक कह दिया कि उन्होंने अपने पूरे कार्यकाल में केवल उद्घाटन के नारियल फोड़ने के अलावा और कोई ठोस कार्य नहीं किया है।
साउंड और विजन की कमी का हवाला देते हुए सांसद ने कहा कि यदि उनके पूरे कामकाज का निष्पक्ष मूल्यांकन किया जाए, तो वे उन्हें 100 अंकों में से मात्र ढाई अंक ही देंगे। इस तरह की तीखी टिप्पणी से स्थानीय राजनीति में गर्माहट आ गई है और दोनों पक्षों के समर्थकों के बीच बयानबाजी का दौर शुरू हो गया है।
विकास कार्यों और बजट को लेकर आरोप-प्रत्यारोप
सांसद ने इस बात पर जोर दिया कि प्रदेश के अन्य नगर निगमों की तरह ही रीवा नगर निगम को भी विकास कार्यों के लिए पर्याप्त बजट प्राप्त हुआ है। इसके बावजूद शहर में बुनियादी सुविधाओं, जल निकासी और बाढ़ सुरक्षा जैसे गंभीर मुद्दों पर कोई ठोस काम जमीन पर नजर नहीं आया।
सांसद ने यह भी आरोप लगाया कि महापौर अपनी प्रशासनिक नाकामी छुपाने के लिए सारा ठीकरा उप मुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ल और भारतीय जनता पार्टी की राज्य सरकार के सिर फोड़ने का प्रयास करते हैं। उनका कहना था कि यदि महापौर ने वास्तव में शहर के हित में काम किया होता, तो उन्हें मीडिया या बयानों के जरिए दोषारोपण करने के बजाय अपना रिपोर्ट कार्ड जनता के सामने रखना चाहिए था।
इसके अलावा, भूमिपूजन और लोकार्पण कार्यक्रमों पर हो रहे खर्च को लेकर महापौर द्वारा उठाए गए सवालों पर भी सांसद ने पलटवार किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस प्रकार के कार्यक्रम विकास की गति को तेज करने और योजनाओं को समयबद्ध तरीके से पूरा करने के लिए आयोजित किए जाते हैं, न कि किसी पर सवाल उठाने का अवसर होते हैं।
जनता की उम्मीदों पर खरा उतरने को लेकर सियासत गर्म
इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम के केंद्र में आम नागरिकों की समस्याएं और अपेक्षाएं हैं। सांसद ने आरोप लगाया कि महापौर ने रीवा के विकास के लिए न तो मुख्यमंत्री से और न ही उप मुख्यमंत्री से उचित संवाद स्थापित किया। इसके साथ ही केंद्र सरकार से मिलने वाले विकास अनुदानों का लाभ उठाने के लिए भी प्रशासनिक स्तर पर कोई विशेष प्रयास नहीं दिखाई दिए।
दिलचस्प बात यह है कि एक तरफ जहां काम न होने के गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ महापौर के भविष्य की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं पर भी सवाल उठाए गए हैं। आलोचकों का मानना है कि वर्तमान में संतोषजनक प्रदर्शन न करने के बावजूद बड़े पदों के सपने देखना जनता के साथ न्याय नहीं है।
रीवा नगर निगम के भविष्य पर प्रभाव और राजनीतिक समीकरण
रीवा के इस राजनीतिक संघर्ष का असर आने वाले समय में स्थानीय निकाय के कामकाज और जनता के मूड पर पड़ना तय है। एक तरफ जहां जनप्रतिनिधियों के बीच आपसी खींचतान चल रही है, वहीं दूसरी तरफ शहर की आम जनता बुनियादी सुविधाओं, सड़क, पानी और सफाई जैसी व्यवस्थाओं में सुधार की उम्मीद लगाए बैठी है। यह देखना दिलचस्प होगा कि इस तीखे राजनीतिक कटाक्ष के बाद नगर निगम प्रशासन और महापौर की ओर से क्या आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आती है और जनता इस पूरे विवाद को किस रूप में लेती है।