अगर आप भी रीवा में 24 घंटे दुकान खोलना चाहते हैं तो ये खबर आपके लिए? वैष्णव फ्रूट' को मिल सकती है 24 घंटे की खुली छूट, तो शहर के अन्य टैक्सपेयर व्यापारियों के लिए अलग कानून क्यों?

 
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जब जय स्तंभ चौक के 'वैष्णव फ्रूट' को मिल सकती है 24 घंटे की खुली छूट, तो शहर के अन्य टैक्सपेयर व्यापारियों के लिए अलग कानून क्यों?

"रीवा के व्यापारिक संगठनों और स्थानीय दुकानदारों में इस बात को लेकर भारी आक्रोश है कि अगर प्रशासन ने जय स्तंभ चौक पर बिना किसी वैधानिक अनुमति के एक रसूखदार को दिन-रात दुकान चलाने की 'अघोषित अनुमति' दे रखी है, तो यही नियम पूरे शहर के व्यापारियों पर लागू क्यों नहीं किया जाता? जब अन्य व्यापारी भी ईमानदारी से टैक्स भरते हैं, तो रात 10 बजते ही उन पर पुलिस का डंडा क्यों चलने लगता है? क्या रीवा का श्रम विभाग और जिला प्रशासन केवल एक विशेष धन्नासेठ के हितों की रक्षा के लिए काम कर रहा है, या फिर आम व्यापारियों को भी अब अपने हक के लिए 'वैष्णव फ्रूट' की तरह ही रसूख का रास्ता अपनाना पड़ेगा?"

ऋतुराज द्विवेदी, रीवा/भोपाल। मध्य प्रदेश के रीवा शहर के सबसे व्यस्ततम और मुख्य चौराहों में शुमार जय स्तंभ चौक पर इन दिनों एक विशेष फल दुकान को लेकर गली-गली में तीखी चर्चाएं हो रही हैं। 'वैष्णव फ्रूट' नामक इस दुकान के संचालक ने प्रशासनिक नियमों को पूरी तरह से ठेंगा दिखा रखा है। शहर के आम नागरिकों, रेहड़ी-पटरी वालों और छोटे दुकानदारों के लिए तो शासन-प्रशासन ने दुकानें खोलने और बंद करने की एक सख्त समय सीमा तय कर रखी है, लेकिन इस रसूखदार फल वाले के सामने आते ही सारे नियम-कायदे और कानून धरे के धरे रह जाते हैं। आम जनता के बीच अब यह सवाल तेजी से गूंज रहा है कि आखिर इस एक दुकान को इतनी खुली छूट क्यों मिली हुई है?

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मिनी इंदौर की तर्ज पर रीवा में रातभर सजता है बाजार: क्या है पूरा खेल?
हैरानी की बात यह है कि कानून की सरेआम धज्जियां उड़ाते हुए अब विंध्य के केंद्र रीवा को जबरन 'इंदौर शहर' की तर्ज पर ढालने की कोशिश की जा रही है। इंदौर की नाईट कल्चर संस्कृति की तरह ही जय स्तंभ चौक पर रातभर बाजार सजाया जा रहा है। जहां एक तरफ पूरे रीवा शहर में रात 10 से 11 बजे के बीच सन्नाटा पसर जाता है, पुलिस की गाड़ियां हूटर बजाकर आम दुकानें बंद करवा देती हैं, वहीं दूसरी तरफ 'वैष्णव फल' का यह स्टोर पूरे 24 घंटे बेखौफ होकर गुलजार रहता है। इस दोहरी व्यवस्था को देखकर स्थानीय व्यापारियों में भारी असंतोष व्याप्त है कि एक ही शहर में दो अलग-अलग कानून कैसे चल सकते हैं।

थाना प्रभारियों की कथित मेहरबानी और मोटी कमाई का सनसनीखेज आरोप?
विश्वस्त सूत्रों और स्थानीय लोगों के दावों पर यकीन करें तो इस 24 घंटे चलने वाले खेल के पीछे खाकी का बड़ा संरक्षण है। संबंधित क्षेत्र के थाना प्रभारियों की कथित सरपरस्ती और मेहरबानी के एवज में यहाँ से हर महीने मोटी रकम की अवैध कमाई (कथित वसूली) की जा रही है। यही वजह है कि रात के अंधेरे में जब पुलिस की गश्त टीम वहां से गुजरती है, तो उन्हें यह खुली दुकान और नियमों का उल्लंघन दिखाई नहीं देता। रसूख और रुपयों के इस गठजोड़ ने कानून के रखवालों को ही पहरेदार बना दिया है।

फल बेचने की आड़ में चखना और डिस्पोजल का अवैध धंधा: असामाजिक तत्वों का डेरा
प्रत्यक्षदर्शियों और स्थानीय दुकानदारों का कहना है कि यह दुकान केवल फल बेचने तक सीमित नहीं है। फल बेचने की आड़ में यहाँ देर रात और तड़के तक धड़ल्ले से डिस्पोजल ग्लास, पानी की बोतलें और चखना (नमक-मसाले के पैकेट व स्नैक्स) बेचने का अवैध कारोबार फल-फूल रहा है। इसी के चलते आधी रात के बाद इस दुकान के आसपास असामाजिक तत्वों, शराबियों और हुड़दंगियों का भारी जमावड़ा देखने को मिलता है। जय स्तंभ चौक जैसे प्रमुख स्थल पर देर रात होने वाली यह गतिविधियां किसी भी दिन किसी बड़ी आपराधिक घटना को अंजाम दे सकती हैं। ऐसा लगता है कि रीवा पुलिस को शायद किसी बड़ी अनहोनी या वारदात का इंतजार है, जिसके बाद ही उनकी नींद खुलेगी।

श्रम विभाग, नगर निगम और पुलिस के आला अधिकारियों की रहस्यमयी चुप्पी?
इस पूरे मामले में सबसे संदेहास्पद भूमिका प्रशासनिक विभागों की रही है। रीवा का श्रम विभाग (Labour Department), जो दुकानों के संचालन के घंटे तय करता है, पूरी तरह से मौन साधे हुए है। वहीं नगर निगम का अतिक्रमण दस्ता, जो गरीबों के ठेले हटाने में जरा भी देर नहीं करता, उसे इस पक्की दुकान का 24 घंटे का अतिक्रमण दिखाई नहीं देता। पुलिस के आला अधिकारी भी इस गंभीर मनमानी पर कोई संज्ञान लेते नहीं दिख रहे हैं। कई बार स्थानीय मीडिया और सोशल मीडिया के माध्यम से यह मुद्दा उठाया जा चुका है, लेकिन आज तक न तो कोई ठोस जांच हुई और न ही कोई दंडात्मक कार्रवाई। इस त्रिकोणीय चुप्पी ने साबित कर दिया है कि पूरा सिस्टम इस धन्नासेठ के आगे सरेंडर कर चुका है।

डिप्टी सीएम और 'शुक्ला जी' के नाम पर रसूख की नुमाइश: छोटे व्यापारियों में आक्रोश?
छोटे व्यापारियों की मानें तो जब भी इस दुकान के समय को लेकर कोई बात उठती है, तो संचालक खुलेआम राजनीतिक धौंस जमाता है। वह खुलेआम कहता फिरता है कि "मैं डिप्टी सीएम का आदमी हूँ, रीवा में जो चाहूँगा वही होगा।" राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी आम है कि कभी कांग्रेस शासनकाल के दौरान शहर के अधिकतर व्यापारी खुद को 'श्रीयुत' का सिपहसालार बताते थे, और आज के दौर में हर कोई खुद को 'शुक्ला जी' का करीबी बताकर अपना उल्लू सीधा कर रहा है। इस रसूख के पीछे कितनी सच्चाई है, यह तो जांच के बाद ही साफ होगा, लेकिन सत्ता के नाम का दुरुपयोग कर नियमों को कुचलना रीवा की छवि को खराब कर रहा है।

क्या गरीबों पर हंटर चलाने वाले हुक्मरान धन्नासेठों के सामने सरेंडर कर चुके हैं?
वैष्णव फ्रूट का यह मामला प्रशासन की कार्यप्रणाली पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है। अब सबसे बड़ा और यक्ष प्रश्न यह है कि क्या नियम-कायदे, धाराएं और चालान की कार्रवाई केवल समाज के निचले तबके, लाचार रेहड़ी वालों और गरीब ठेला संचालकों के लिए ही बनी है? यदि कानून देश और प्रदेश के हर नागरिक के लिए समान है, तो उसका क्रियान्वयन समान रूप से क्यों नहीं किया जा रहा? क्या गरीबों की रोजी-रोटी पर अतिक्रमण का हंटर चलाने वाला रीवा प्रशासन इस धन्नासेठ पर भी अपना हंटर चलाएगा, या फिर मामला रफा-दफा होने का इंतजार करेगा? शहर की जनता अब इस पर आर-पार की कार्रवाई चाहती है।

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