सफेद शेर की अनदेखी! धूल से पटी स्वर्गीय श्रीनिवास तिवारी की प्रतिमा, 72 लाख का बड़ा खेल! रील्स में अमेरिका, ज़मीन पर वही पुराना रीवा! जानिए रील्स वाले विज्ञापनों का झोल
ऋतुराज द्विवेदी (राज्य ब्यूरो) मध्य प्रदेश के रीवा शहर में पुलिस लाइन चौराहे का कायाकल्प करने के नाम पर लगभग ₹72 लाख की भारी-भरकम राशि खर्च की गई। इस सौंदर्यीकरण योजना के तहत चौराहे पर नए और आकर्षक फव्वारे, लोहे की सुरक्षा जालियां, आधुनिक बोला डाइट (डिजाइनर लाइट्स), और चौराहे के केंद्र में एक भव्य कलात्मक घोड़े की प्रतिमा स्थापित की गई। योजना का उद्देश्य शहर के मुख्य प्रवेश मार्ग और चौराहे को आधुनिक व दर्शनीय रूप प्रदान करना था। जब इस परियोजना का लोकार्पण हुआ, तब स्थानीय प्रशासन और जनप्रतिनिधियों ने इसे रीवा के 'स्मार्ट और आधुनिक विकास' की मिसाल बनाकर प्रस्तुत किया। डिजिटल मीडिया पर आकर्षक कैमरों, रंग-बिरंगे फिल्टर्स और रीलों के माध्यम से इस चौराहे के सौंदर्य को खूब प्रचारित किया गया।

हालांकि, उद्घाटन का चमक-दमक भरा समारोह समाप्त होते ही परियोजना की असलियत सार्वजनिक होने में कुछ ही दिन लगे। लाखों रुपये की लागत से बना फव्वारा कुछ ही दिनों में पूरी तरह से बंद हो गया और उसमें पानी के स्थान पर गंदगी जमा होने लगी। जिस चौराहे को राहगीरों के आकर्षण का केंद्र बनना था, वह रखरखाव के अभाव में बदहाली का शिकार हो गया। यह स्थिति स्पष्ट रूप से यह दर्शाती है कि योजना को तैयार करते और उस पर जनता के कर का पैसा खर्च करते समय केवल सतही दिखावे पर ध्यान दिया गया, जबकि परियोजना के लंबे समय तक संचालन और रखरखाव की कोई ठोस व्यवस्था नहीं की गई।
बंद फव्वारा और आवारा मवेशी: ₹72 लाख का बजट आखिर कहाँ गया?
पुलिस लाइन चौराहे पर स्थापित भव्य फव्वारा सौंदर्यीकरण परियोजना का मुख्य आकर्षण था। लेकिन उद्घाटन के तुरंत बाद इसका बंद हो जाना नगर निगम और कार्यदायी एजेंसी की कार्यशैली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। ₹72 लाख के भारी बजट के बावजूद, यदि एक फव्वारा एक सप्ताह भी सुचारू रूप से नहीं चल सकता, तो यह स्पष्ट तौर पर गुणवत्ता और प्रबंधन में भारी कमियों का प्रमाण है। फव्वारे के हौज में ठहरा हुआ गंदा पानी मच्छर और संक्रमण फैलने की आशंका को बढ़ा रहा है, जिससे राहगीरों और आसपास के लोगों को असुविधा हो रही है।

इसके अतिरिक्त, इस लाखों रुपये से सजाए गए चौराहे पर आवारा मवेशियों (गौमाताओं) का स्थायी डेरा जमा रहना शहर की यातायात व्यवस्था और सौंदर्य दोनों को प्रभावित कर रहा है। सुरक्षा जालियां और सजावटी स्थल मवेशियों के बैठने का स्थान बन चुके हैं। इससे न केवल सड़क दुर्घटनाओं का जोखिम बढ़ता है, बल्कि यह भी उजागर होता है कि सार्वजनिक स्थलों की सुरक्षा, यातायात नियंत्रण और अव्यवस्था को दूर करने में स्थानीय प्रशासन पूरी तरह उदासीन है। ₹72 लाख खर्च करने के बाद भी यदि मुख्य चौराहे पर बुनियादी व्यवस्थाएं उपलब्ध नहीं हैं, तो यह सीधे तौर पर जनता के पैसे के अनुचित उपयोग को दर्शाता है।
स्वर्गीय श्रीनिवास तिवारी की प्रतिमा की उपेक्षा और प्रशासनिक लापरवाही
पुलिस लाइन चौराहे का ऐतिहासिक और सामाजिक महत्व विंध्य के कद्दावर नेता और मध्य प्रदेश विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष स्वर्गीय श्रीनिवास तिवारी (सफेद शेर) की प्रतिमा से भी जुड़ा हुआ है। सौंदर्यीकरण योजना के तहत इस परिसर को सुंदर और सम्मानित स्वरूप दिया जाना चाहिए था। परंतु, ज़मीनी पड़ताल में जो तस्वीर सामने आई, वह बेहद निराशाजनक है। स्वर्गीय तिवारी की प्रतिमा धूल, मिट्टी और गंदगी से ढकी हुई है। प्रतिमा पर अर्पित की गई माल्यार्पण की मालाएं महीनों पुरानी, सूखी और मटमैली हो चुकी हैं, जिन्हें हटाने तक का सौजन्य प्रशासन ने नहीं दिखाया।

यह स्थिति केवल एक प्रतिमा की अनदेखी नहीं है, बल्कि यह स्थानीय इतिहास, जनभावनाओं और महापुरुषों के प्रति प्रशासनिक सम्मान की कमी को उजागर करती है। जब किसी सार्वजनिक स्थल पर लाखों रुपये खर्च करके नए सजावटी तत्व लगाए जाते हैं, लेकिन वहां मौजूद महत्वपूर्ण स्मारकों की बुनियादी सफाई और देखभाल को भुला दिया जाता है, तो यह विकास की खोखली मानसिकता को दर्शाता है। किसी भी जिम्मेदार नागरिक निकाय का यह प्राथमिक कर्तव्य होता है कि वह अपने शहर के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहरों का नियमित रखरखाव सुनिश्चित करे।
बंद आँखों वाला कलात्मक घोड़ा: शहर की व्यवस्था का मौन प्रतीक
चौराहे के सौंदर्यीकरण के हिस्से के रूप में एक कलात्मक घोड़े की प्रतिमा स्थापित की गई थी। यह घोड़ा देखने में अत्यंत आकर्षक है, लेकिन इसकी एक विशेष बनावट—इसकी बंद आंखें—आज रीवा शहर की प्रशासनिक व्यवस्था के लिए एक प्रतीकात्मक संदेश बन गई हैं। स्थानीय नागरिकों और विश्लेषकों का कहना है कि यह बंद आँखों वाला घोड़ा मानो रीवा के पुलिस लाइन चौराहे की अव्यवस्था, प्रशासनिक लाचारी और उपेक्षा पर खुद आँखें मूँदे खड़ा है।

कलात्मक दृष्टिकोण से यह प्रतिमा भले ही सौंदर्य बढ़ाने के लिए लगाई गई हो, लेकिन चौराहे की वास्तविक स्थिति के साथ इसका विरोधाभास साफ दिखाई देता है। बंद फव्वारा, चारों ओर फैली धूल, आवारा पशुओं का जमावड़ा और प्रतिमाओं की अनदेखी के बीच यह सजावटी घोड़ा इस बात का प्रतीक बन गया है कि प्रशासन ने भी जनता की समस्याओं और विकास कार्यों की जमीनी हकीकत से अपनी आँखें मूँद ली हैं।
सोशल मीडिया रील्स और जमीनी हकीकत: डिजिटल प्रचार बनाम नागरिक सुविधा
आज के दौर में विकास कार्यों को आंकने का एक नया पैमाना बन गया है—डिजिटल मीडिया पर रील्स, वाइड-एंगल कैमरे, ड्रोन्स और कलर फिल्टर्स का उपयोग। पुलिस लाइन चौराहे के सौंदर्यीकरण के मामले में भी ऐसा ही देखने को मिला। उद्घाटन के समय इसके वीडियो और तस्वीरें सोशल मीडिया पर इस तरह प्रस्तुत किए गए, मानो रीवा का यह चौराहा किसी आधुनिक अंतरराष्ट्रीय शहर के चौराहे में बदल गया हो।
लेकिन जब आम नागरिक और जमीनी रिपोर्टर मौके पर पहुँचते हैं, तो कैमरे के फिल्टर्स के पीछे की सच्चाई सामने आ जाती है। रंग-बिरंगी लाइटों और विज्ञापनों के पीछे बंद पड़े उपकरण, धूल से सने स्मारक और फैली अव्यवस्था छिपी नहीं रह पाती। डिजिटल मीडिया पर 'रील्स का विकास' दिखाना आसान हो सकता है, लेकिन जनता जिस वास्तविकता का सामना प्रतिदिन करती है, उसे केवल कैमरों से नहीं बदला जा सकता। विकास का वास्तविक मापदंड टिकाऊपन और जनसुविधा है, न कि कुछ सेकंड्स की चमकदार वीडियो रील्स।
सार्वजनिक कोष की बर्बादी और नगर निगम के रखरखाव की विफलता
₹72 लाख जैसी बड़ी राशि किसी भी मध्यम आकार के शहर में बुनियादी सुधारों के लिए एक महत्वपूर्ण बजट होती है। इतने बजट में एक ऐसा चौराहा तैयार किया जा सकता था जो न केवल सुंदर दिखे, बल्कि जिसका रखरखाव अगले कई वर्षों तक सुचारू रूप से हो सके। परंतु, रीवा नगर निगम और संबंधित ठेकेदारों की मिलीभगत या लापरवाही के कारण, यह योजना बजट की खपत के बाद पूरी तरह लावारिस छोड़ दी गई।
सार्वजनिक कोष का इस प्रकार का उपयोग गंभीर वित्तीय अनुशासनहीनता की श्रेणी में आता है। जब तक किसी योजना के निर्माण के साथ उसके संचालन और नियमित रख-रखाव (Maintenance) की जवाबदेही तय नहीं की जाएगी, तब तक ऐसे सौंदर्यीकरण प्रोजेक्ट्स केवल ठेकेदारों और एजेंसियों को लाभ पहुँचाने का जरिया बने रहेंगे। जनता के कर का पैसा केवल उद्घाटन के दिन फीता काटने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उसका लाभ वर्षों तक नागरिकों को मिलना चाहिए।
टिकाऊ शहरी विकास के लिए प्रशासनिक जवाबदेही की आवश्यकता
पुलिस लाइन चौराहे का यह उदाहरण केवल रीवा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश के कई शहरों में हो रहे अदूरदर्शी शहरी विकास (Urban Planning Failure) का प्रतिनिधि उदाहरण है। टिकाऊ शहरी विकास के लिए केवल आकर्षक निर्माण करना ही पर्याप्त नहीं होता, बल्कि निम्नलिखित बिंदुओं पर ध्यान देना आवश्यक है:
जवाबदेही का निर्धारण: जिस ठेकेदार या एजेंसी ने निर्माण कार्य किया है, उस पर कम से कम 3 से 5 वर्ष तक रखरखाव की कानूनी जिम्मेदारी (Defect Liability Period) तय की जानी चाहिए।
नियमित मॉनिटरिंग: नगर निगम अधिकारियों को केवल कागज पर निरीक्षण करने के बजाय समय-समय पर जमीनी दौरा करना चाहिए।
नागरिक सहभागिता: स्थानीय निवासियों और व्यापारियों को ऐसे चौराहों की देखरेख और शिकायत दर्ज कराने के लिए एक सीधी व्यवस्था उपलब्ध कराई जानी चाहिए।
विरासत का सम्मान: महापुरुषों की प्रतिमाओं और ऐतिहासिक धरोहरों की दैनिक आधार पर सफाई की व्यवस्था अनिवार्य की जानी चाहिए।