इको पार्क में अवैध वसूली: 29 वादे, 16 गायब, जनता के साथ सरासर धोखाधड़ी : जनता से वसूली का खेल अब एक्सपोज

 
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ऋतुराज द्विवेदी, रीवा/भोपाल। इको पार्क परियोजना, जिसे जनसुविधा और मनोरंजन के उद्देश्य से शुरू किया जाना था, आज भ्रष्टाचार और प्रशासनिक अनियमितताओं के एक बड़े केंद्र के रूप में उभर कर सामने आई है। इस परियोजना के पीछे की सच्चाई न केवल वित्तीय दृष्टि से चिंताजनक है, बल्कि यह सरकारी नियमों और कानूनों के उल्लंघन का भी एक जीता-जागता उदाहरण है।

फी कलेक्शन और अधूरे वादे: जनता के साथ धोखाधड़ी
परियोजना के टेंडर नियमों के अनुसार, विजेता कंपनी को फी कलेक्शन का कोई कानूनी अधिकार नहीं दिया गया था। इसके बावजूद, सितंबर 30 तक लगभग ₹8 करोड़ की अवैध वसूली की गई। सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि कंपनी ने 29 सुविधाएं देने का वादा किया था, लेकिन उनमें से 16 सुविधाएं आज भी पूरी तरह से नदारद हैं। जनता से जो सुविधाएं ली जा रही हैं, वे मूलभूत बुनियादी आवश्यकताओं से भी कोसों दूर हैं।

जमीन का खेल: 329 करोड़ की संपत्ति और रेंट में धांधली
इको पार्क का मामला केवल सुविधाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जमीन के बड़े घोटाले से भी जुड़ा है। नगर निगम और फॉरेस्ट विभाग की कुल 16.28 एकड़ जमीन, जिसकी मार्केट वैल्यू करीब ₹329 करोड़ है, का उपयोग किया गया है। सरकारी नियमों के अनुसार, लीज पर दी गई जमीन का एक बड़ा हिस्सा वार्षिक किराए के रूप में सरकारी खजाने में आना चाहिए था।
सरकारी गाइडलाइंस के मुताबिक, 30 वर्षों में मिलने वाला किराया लगभग ₹176 करोड़ के आसपास होना चाहिए था, जबकि कंपनी केवल ₹3.14 करोड़ का भुगतान कर रही है। यह सीधा-सीधा सरकारी खजाने को ₹172 करोड़ से अधिक की चपत है।

सरकारी अनुमतियों का उल्लंघन और पर्यावरणीय नुकसान
किसी भी बड़े निर्माण कार्य के लिए संबंधित विभागों जैसे नगर निगम, टीएनसीपी, और पोल्यूशन कंट्रोल बोर्ड की अनुमति अनिवार्य होती है। इस मामले में, न केवल ये अनुमतियां दरकिनार की गईं, बल्कि फॉरेस्ट कंजर्वेशन एक्ट 1980 के तहत केंद्र सरकार की अनुमति भी नहीं ली गई। इसके अलावा, प्राचीन कुंडा घाट हनुमान मंदिर का संरक्षण भी बिना पुरातत्व विभाग की सलाह के किया गया, और अब दर्शन के लिए भी जनता से शुल्क वसूला जा रहा है।

सरकारी निवेश बनाम रिटर्न: 1.6% का घाटे वाला मॉडल
सरकार ने इको पार्क परियोजना में लगभग ₹196 करोड़ का भारी निवेश किया है। विडंबना यह है कि इस निवेश पर मिलने वाला रिटर्न 30 वर्षों में मात्र ₹3.14 करोड़ है, जो कि निवेश का 1.6% से भी कम है। यह पीपीपी (PPP) मॉडल पर आधारित है, लेकिन इसमें निजी क्षेत्र का निवेश केवल 9.3% है, जबकि सरकारी भागीदारी 91% है। यह स्पष्ट करता है कि यह परियोजना किसी निजी कंपनी को लाभ पहुँचाने के लिए अधिक रची गई थी।

पारदर्शिता और जवाबदेही की आवश्यकता
इको पार्क का पूरा मामला शासन और प्रशासन के नैतिक पतन को दर्शाता है। जनता के अधिकारों का हनन, पर्यावरणीय नियमों की धज्जियां, और सरकारी धन का दुरुपयोग किसी भी सभ्य समाज के लिए स्वीकार्य नहीं है। अब समय आ गया है कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हो और दोषियों पर सख्त कार्रवाई की जाए।

इको पार्क: प्रशासनिक विफलता और वित्तीय अनियमितताओं का विस्तृत विवरण
इको पार्क परियोजना, जिसे शहर के लिए एक महत्वपूर्ण विकास कार्य माना जा रहा था, आज सवालों के घेरे में है। इसमें टेंडर की शर्तों से लेकर जमीन के हस्तांतरण और पर्यावरण नियमों के उल्लंघन तक, कई गंभीर विसंगतियां पाई गई हैं।

टेंडर की शर्तों का उल्लंघन और अवैध वसूली
परियोजना के टेंडर दस्तावेजों में यह स्पष्ट रूप से उल्लेखित था कि टेंडर जीतने वाली कंपनी को पार्क में किसी भी प्रकार की 'फी' या 'एंट्री टिकट' वसूलने का अधिकार नहीं होगा। इसके बावजूद, कंपनी ने अपनी व्यावसायिक गतिविधियों के माध्यम से जनता पर अनावश्यक आर्थिक बोझ डाला। सितंबर तक ₹8 करोड़ से अधिक की राशि का संग्रह किया गया, जिसे नियमों के विरुद्ध माना जा रहा है। 29 प्रस्तावित सुविधाओं के दावे हवा-हवाई साबित हुए, जिनमें से 16 सुविधाएं आज भी धरातल पर मौजूद नहीं हैं।

जमीन का 'खेल': 329 करोड़ की संपत्ति का नाममात्र रेंट
यह सबसे चौंकाने वाला पहलू है। इको पार्क के लिए नगर निगम और वन विभाग की कुल 16.28 एकड़ भूमि का उपयोग किया गया है।

बाजार मूल्य: इसकी कुल मार्केट वैल्यू ₹329 करोड़ आंकी गई है।

  • राजस्व का नुकसान: सरकारी गाइडलाइंस के अनुसार, ऐसी कीमती जमीन पर 30 वर्षों के लिए काफी अधिक रेंट मिलना चाहिए था, जो अनुमानित रूप से ₹176 करोड़ होता। इसके विपरीत, कंपनी मात्र ₹3.14 करोड़ का भुगतान कर रही है। यह सरकारी खजाने को प्रतिवर्ष करोड़ों का चूना लगाने जैसा है।

कानूनी और प्रशासनिक अनुमतियों का घोर अभाव
एक सरकारी परियोजना होने के बावजूद, इसमें किसी भी उच्च-स्तरीय कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया:

  • पीएस (प्रमुख सचिव) की अनुमति का अभाव: नगर निगम की जमीन के अधिग्रहण के लिए अनिवार्य प्रशासनिक अनुमति नहीं ली गई।
  • वन विभाग का उल्लंघन: फॉरेस्ट कंजर्वेशन एक्ट 1980 के तहत, वन भूमि के व्यावसायिक उपयोग के लिए केंद्र सरकार की अनुमति अनिवार्य होती है, जो इस मामले में नहीं ली गई।
  • तकनीकी ऑडिट की कमी: फायर ऑडिट, फ्लड ऑडिट, और पर्यावरण संबंधी आकलन का पूरी तरह से अभाव है, जिससे भविष्य में बड़े हादसों का खतरा बना हुआ है।

पर्यावरण और सांस्कृतिक विरासत पर प्रभाव
पार्क परिसर में स्थित 'कुंडा घाट हनुमान मंदिर' के साथ जो व्यवहार किया गया, वह स्थानीय संस्कृति और आस्था के खिलाफ है। बिना पुरातत्व विभाग की राय लिए मंदिर के संरक्षण के नाम पर उसे व्यावसायिक परिसर में बदल दिया गया और अब वहां दर्शन के लिए भी शुल्क वसूला जा रहा है। इसके साथ ही, नदी के किनारे 50 मीटर की सीमा में निर्माण करना सीधे तौर पर पर्यावरणीय कानूनों का उल्लंघन है। नगर निगम द्वारा पहले से स्थापित 'विक्रम पार्क' को तोड़कर उसे निजी लाभ के लिए उपयोग में लाना भी एक प्रशासनिक अपराध है।

सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) का खोखला मॉडल
इस परियोजना में सरकारी भागीदारी 91% है, जबकि निजी क्षेत्र का निवेश मात्र 9.3% है। सरकारी निवेश ₹196 करोड़ का है, जिस पर मात्र 1.6% से भी कम का वार्षिक रिटर्न मिल रहा है। यह एक ऐसा पीपीपी मॉडल है जहाँ सरकार जोखिम ले रही है और निजी कंपनी मुनाफा कमा रही है।

स्थानीय किसानों का विस्थापन और अधिकारों का हनन
भूमि अधिग्रहण के दौरान स्थानीय किसानों को उनकी जमीन का उचित मूल्य नहीं दिया गया। ₹1 करोड़ की जमीन के बदले ₹85 लाख का भुगतान करना और फिर उस जमीन को बिल्डरों को सौंप देना, किसानों के प्रति सरकार के अनुचित व्यवहार को दर्शाता है। यह सरकार का काम था कि वह सीधे किसानों के साथ पार्टनरशिप करती, न कि किसी मध्यस्थ कंपनी को लाभ पहुंचाती।

प्रशासनिक असहमति और विरोध
इस परियोजना का विरोध सिर्फ जनता ने ही नहीं, बल्कि नगर निगम के कई पार्षदों (जैसे सज्जन वर्मा, धनेंद्र, और अजय मिश्रा) और प्रशासनिक अधिकारियों ने भी किया था। उनका स्पष्ट कहना था कि नगर निगम स्वयं इन जमीनों को विकसित करने में सक्षम है, लेकिन मेयर और कमिश्नर ने परिषद की मंशा को दरकिनार करते हुए इसे मंजूरी दे दी।

क्या इको पार्क मामले में सरकार द्वारा किए गए वादों की तुलना में काम हुआ है?

प्रस्तावित सुविधा वर्तमान स्थिति
सस्पेंशन ब्रिज ₹1.5 करोड़ का स्लैब ब्रिज बना (मूलतः ₹4.5 करोड़ का होना था)
म्यूजिक फाउंटेन अनुपलब्ध
साइक्लिंग ट्रैक अनुपलब्ध
लाइब्रेरी अनुपलब्ध
योगा एवं मेडिटेशन सेंटर अनुपलब्ध
ट्री हाउस अनुपलब्ध

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