रीवा SSMC में इंटर्न डॉक्टरों का फूटा गुस्सा: 'वन स्टाइपेंड' नीति लागू करने और ₹30 हजार भत्ते की मांग पर अड़े छात्र

 
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ऋतुराज द्विवेदी (राज्य ब्यूरो) विंध्य अंचल की स्वास्थ्य व्यवस्था के मुख्य केंद्र श्याम शाह मेडिकल कॉलेज (SSMC), रीवा में युवा चिकित्सकों का धैर्य अब पूरी तरह जवाब दे चुका है। संस्थान में कार्यरत जूनियर व इंटर्न डॉक्टरों ने अपनी आर्थिक उपेक्षा के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। कॉलेज प्रांगण में एकत्र होकर छात्रों ने शासन की नीतियों के विरुद्ध नारेबाजी की और अपने हक के लिए पुरजोर आवाज उठाई।

अस्पताल की दैनिक व्यवस्था संभालने वाले इन भावी डॉक्टरों का आरोप है कि दिन-रात मरीजों की देखभाल करने के बावजूद उन्हें जो आर्थिक प्रोत्साहन दिया जा रहा है, वह बेहद निराशाजनक है। इसी असंतोष के चलते अब यह विरोध एक संगठित आंदोलन का रूप लेता दिख रहा है।

समान भत्ते हेतु 'वन स्टाइपेंड' (One Stipend) नीति क्यों आवश्यक है?
आंदोलनरत चिकित्सकों की प्राथमिक मांग 'वन स्टाइपेंड' (One Stipend Policy) को कानूनी रूप से लागू कराना है। डॉक्टरों का स्पष्ट तर्क है कि जब संपूर्ण राज्य में एक ही चिकित्सा पाठ्यक्रम और एक जैसी कार्यप्रणाली है, तो संस्थानों के आधार पर स्टाइपेंड में असमानता क्यों होनी चाहिए?

  • वर्तमान पारिश्रमिक की स्थिति: रीवा में इंटर्न डॉक्टरों को फिलहाल मात्र 14,000 रुपये प्रति माह का भुगतान किया जा रहा है।
  • संशोधित मांग: इस राशि को बढ़ाकर सीधे 30,000 रुपये प्रति माह करने की मांग रखी गई है।
  • समानता का अधिकार: प्रदेश के सभी शासकीय मेडिकल संस्थानों में एक समान दर लागू होने से छात्रों में व्याप्त क्षेत्रीय विषमता और हीनभावना पूरी तरह समाप्त होगी।

उच्चतम शुल्क और न्यूनतम पारिश्रमिक: क्या है रीवा का विरोधाभास?
विरोध पर उतरे छात्रों ने संस्थान के ढांचे पर सवाल उठाते हुए कहा कि पूरे मध्य प्रदेश में सबसे महंगी मेडिकल शिक्षा रीवा में है, परंतु जब बात मेहनत के एवज में स्टाइपेंड देने की आती है तो यहाँ के इंटर्न डॉक्टरों को सबसे कम भुगतान मिलता है।

  • शैक्षणिक शुल्क में विषमता: रीवा मेडिकल कॉलेज में ली जाने वाली फीस पूरे प्रदेश के अन्य सरकारी कॉलेजों की तुलना में सर्वोच्च स्तर पर है।
  • भत्ते में भारी कटौती: प्रदेश के कुछ अन्य जिलों के मेडिकल कॉलेजों में इंटर्न डॉक्टरों को रीवा की तुलना में बेहतर भत्ता दिया जा रहा है।
  • मांग की तार्किकता: छात्रों की स्पष्ट मांग है कि राज्य भर में एक समान 'वन स्टाइपेंड' व्यवस्था लागू की जाए ताकि किसी भी कॉलेज के विद्यार्थी के साथ वित्तीय अन्याय न हो।

दैनिक भरण-पोषण में आ रही कठिनाई
आज की महंगाई को देखते हुए 14 हजार रुपये की राशि में हॉस्टल या कमरे का किराया, मैस का भोजन, यात्रा खर्च और पढ़ाई से जुड़ी दैनिक जरूरतें पूरी करना बेहद चुनौतीपूर्ण हो गया है। डॉक्टरों का कहना है कि यह राशि उनके मूलभूत खर्चों को भी कवर नहीं कर पाती है।

खोखले दावों और आश्वासनों से उपजी डॉक्टरों की नाराजगी
प्रदर्शनकारी चिकित्सकों का स्पष्ट कहना है कि वे इस विषय को लेकर कई महीनों से प्रशासनिक अधिकारियों और शासन के चक्कर काट रहे हैं।
"हमने हमेशा अपनी समस्याएं लिखित रूप में और शांतिपूर्ण तरीके से रखीं, लेकिन हर बार हमें सिर्फ फाइलों के आगे बढ़ने का दिलासा दिया गया। अब खोखले वादों से काम नहीं चलेगा, हमें धरातल पर ठोस आदेश चाहिए।"

— प्रदर्शन में शामिल छात्र प्रतिनिधि
लगातार हो रही उपेक्षा और केवल आश्वासन मिलने के कारण ही छात्रों को अपनी बात मनवाने के लिए विरोध प्रदर्शन का रास्ता चुनना पड़ा है।

स्वास्थ्य सेवाओं और मरीजों पर विरोध का संभावित प्रभाव
संजय गांधी मेमोरियल अस्पताल और सुपर स्पेशलिटी अस्पताल में इंटर्न डॉक्टर स्वास्थ्य तंत्र की मजबूत कड़ी माने जाते हैं। ओपीडी, वार्ड राउंड्स, इमरजेंसी सेवाओं और रात्रि ड्यूटी में इनकी उपस्थिति अनिवार्य रहती है।

  • मरीजों की असुविधा: यदि यह प्रदर्शन अनिश्चितकालीन हड़ताल में बदलता है, तो दूर-दराज से आने वाले मरीजों को इलाज के लिए भटकना पड़ सकता है।
  • सीनियर डॉक्टरों पर दबाव: इंटर्न डॉक्टरों के हटते ही रेजीडेंट्स और वरिष्ठ डॉक्टरों पर काम का अतिरिक्त बोझ बढ़ जाएगा।

कॉलेज प्रबंधन की प्रतिक्रिया और भावी आंदोलन की रूपरेखा
छात्रों के बढ़ते आक्रोश को देखते हुए मेडिकल कॉलेज प्रबंधन के वरिष्ठ अधिकारियों ने छात्रों से संवाद स्थापित किया। प्रबंधन ने आश्वासन दिया है कि उनकी मांगों और ज्ञापन को भोपाल स्थित चिकित्सा शिक्षा संचालनालय तक भेजा जा रहा है।

छात्रों का कड़ा रुख
हालांकि, प्रदर्शनकारियों ने साफ कर दिया है कि वे केवल मौखिक आश्वासन सुनकर वापस लौटने वाले नहीं हैं।
जब तक ₹30,000 स्टाइपेंड और वन स्टाइपेंड नियम का आधिकारिक शासनादेश (GR) जारी नहीं होता, तब तक परिसर में धरना जारी रहेगा।
यदि जल्द ही कोई सकारात्मक कदम नहीं उठाया गया, तो पूरे प्रदेश के सरकारी मेडिकल कॉलेजों के इंटर्न को एक मंच पर लाकर आंदोलन को व्यापक बनाया जाएगा।

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