मऊगंज ब्रेकिंग: देवतालाब शिव मंदिर में बिना टेंडर 48 घंटे में फूंक दिए लाखों रुपये, आस्था के नाम पर ₹5.63 लाख की खुली लूट, टेंट वाले से बजवा दी शहनाई, अधिकारियों की नोटशीट ने खोली पोल
मध्य प्रदेश के नवगठित मऊगंज जिले से एक बेहद हैरान और विचलित करने वाला मामला सामने आया है। करोड़ों श्रद्धालुओं के केंद्र और सुप्रसिद्ध पौराणिक धार्मिक स्थल देवतालाब शिव मंदिर में भगवान के चढ़ावे और सरकारी खजाने पर डाका डालने का एक सनसनीखेज मामला उजागर हुआ है। महाशिवरात्रि मेले के आयोजन को ढाल बनाकर महज 48 घंटे के भीतर ₹5,63,500 की सरकारी राशि को ठिकाने लगा दिया गया। यह पूरा खेल इतनी जल्दबाजी और शातिर तरीके से खेला गया कि इसके लिए न तो कोई सरकारी नियम अपनाया गया और न ही वरिष्ठ अधिकारियों की आपत्तियों की परवाह की गई। आस्था के नाम पर किए गए इस भ्रष्टाचार ने एक बार फिर धार्मिक ट्रस्टों और प्रबंध समितियों के कामकाज पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
RTI का बड़ा धमाका: 11 पन्नों के सरकारी दस्तावेजों ने खोली पोल
अक्सर बंद कमरों में होने वाली इस तरह की बंदरबांट पर से इस बार सूचना के अधिकार (RTI) ने पर्दा उठा दिया है। लोक सूचना अधिकारी एवं तहसीलदार कार्यालय मऊगंज से सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त हुए 11 पन्नों के आधिकारिक और प्रमाणित कागजातों ने मंदिर प्रबंध समिति के शुचिता के दावों को पूरी तरह से बेनकाब कर दिया है। इन सरकारी फाइलों और नोटशीट को देखने से साफ पता चलता है कि किस तरह नियम-कायदों को ताक पर रखकर चहेते वेंडरों और ठेकेदारों को आर्थिक लाभ पहुंचाने के लिए सरकारी धन की रेवड़ियां बांटी गईं।
बिना टेंडर और प्रस्ताव के पास हुए लाखों के बिल: क्रोनोलॉजी समझिए
इस पूरे घोटाले की टाइमलाइन और इसकी क्रोनोलॉजी किसी चमत्कार से कम नहीं है। दस्तावेजों के विश्लेषण से सामने आया है कि:
13 फरवरी 2026: पूर्व विधानसभा अध्यक्ष और वर्तमान क्षेत्रीय विधायक गिरीश गौतम की अध्यक्षता में मंदिर प्रबंध समिति की एक आधिकारिक बैठक बुलाई जाती है। इस बैठक में एसडीएम, तहसीलदार, नायब तहसीलदार और जनपद सीईओ जैसे आला अधिकारी मौजूद रहते हैं।
प्रस्ताव की सीमा: इस बैठक की मिनट्स (कार्यवाही विवरण) के अनुसार, केवल चार बुनियादी विषयों पर सहमति बनी थी—जैसे वीआईपी दर्शन की व्यवस्था, वाहन पूजा की रसीद, शहनाई वादन और हर सोमवार को मंदिर का ध्वज बदलना। इसमें लाखों रुपये की सजावट, टेंट या महाप्रसाद का कोई दूर-दूर तक जिक्र या एजेंडा पास नहीं था।
15 फरवरी 2026 (चमत्कार): बैठक के ठीक दो दिन बाद, यानी महाशिवरात्रि मेले के आगाज के साथ ही, सुबह तड़के श्रद्धालुओं की कतार लगने से पहले ही ₹5.63 लाख के अलग-अलग बिल तैयार हो जाते हैं और भुगतान के लिए नोटशीट (नस्ती) भी दौड़ने लगती है।
कागजी सजावट और अजब-गजब भुगतान: टेंट वाले ने बजाई शहनाई!
दस्तावेजों में दर्ज अलग-अलग बिलों (देयकों) का विवरण बेहद हास्यास्पद और चौंकाने वाला है:
लाखों के कागजी फूल: बिल नंबर 40 के जरिए 'राजेश कुमार सिंह इवेंट आर्गेनाइजर फूडिंग एंड कैटरर' को ₹2,00,000 का भुगतान किया गया। इसमें दावा किया गया कि ₹30 के भाव से 5,000 फूलों की मालाएं (कुल कीमत ₹1,50,000) खरीदी गईं और ₹50,000 अतिरिक्त सजावट पर खर्च हुए। जबकि स्थानीय लोगों और प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, मुख्य द्वार पर चंद मालाओं के अलावा पूरे परिसर में कोई खास सजावट या लाइटिंग थी ही नहीं।
रहस्यमयी महाप्रसाद: बिल नंबर 41 के माध्यम से ₹2,50,000 की भारी-भरकम राशि केवल देसी घी के पेड़े और पूड़ी-सब्जी के महाप्रसाद के नाम पर निकाल ली गई। दावा किया गया कि ₹50 प्रति पैकेट के हिसाब से प्रसाद बांटा गया। सबसे बड़ा सवाल यह है कि बिना किसी ओपन टेंडर (Open Tender) के इतनी बड़ी मात्रा में भोजन या प्रसाद बनाने का ठेका रातों-रात किसे और क्यों दे दिया गया?
मल्टीटैलेंटेड टेंट हाउस: 'गंगा टेंट हाउस' के बिल नंबर 96 ने तो भ्रष्टाचार की सारी सीमाएं तोड़ दीं। इस बिल में ₹20,000 टेंट और कुर्सियों के लिए और ₹40,000 'शहनाई वादन' के नाम पर स्वीकृत किए गए। यानी सरकारी दस्तावेजों के मुताबिक, टेंट की कुर्सियां सप्लाई करने वाली एजेंसी ही मंदिर में शहनाई भी बजा रही थी!
भ्रष्टाचार में 'टाइम ट्रैवल': साल 2026 के मेले में खपाए 2025 के पुराने बिल
इस घोटाले के वेंडरों और अधिकारियों के हौसले इतने बुलंद थे कि उन्होंने साल 2026 के महाशिवरात्रि मेले के बजट में साल भर पुराने पेंडिंग बिलों को भी चुपके से घुसा दिया:
महंगा पेंट और ब्रश: 'महाराजा प्लाईवुड हार्डवेयर' का एक बिल (नंबर 30) लगाया गया, जो 1 मार्च 2025 का था। इसमें 20 लीटर इमल्शन पेंट और दो ब्रश के लिए ₹23,700 का भुगतान लिया गया। जिस सामग्री की अधिकतम खुदरा कीमत बाजार में ₹7,000 से अधिक नहीं है, उसके लिए सरकारी खजाने से तीन गुना से अधिक राशि वसूल की गई।
फेब्रिकेशन का पुराना खेल: इसी तरह 'चंदेल स्टील फेब्रिकेशन' का 10 जुलाई 2025 का एक पुराना बिल (नंबर 134) जिसकी राशि ₹22,000 थी, उसे भी इसी चालू वर्ष के मेले के खर्चों में जोड़कर क्लियर करवा लिया गया।
सचिव की आपत्ति दरकिनार: प्रशासनिक नियमों को ताक पर रखकर दी गई हरी झंडी
इस पूरे मामले का सबसे स्याह और गंभीर पहलू प्रशासनिक संरक्षण का है। मऊगंज के तहसीलदार, जो पदेन मंदिर प्रबंध समिति के सचिव भी हैं, उन्होंने ईमानदारी दिखाते हुए फाइल पर बकायदा लाल स्याही से नोटशीट पर आपत्ति दर्ज की थी। उन्होंने लिखा था कि:
"उक्त सभी व्यय का भुगतान शिव मंदिर प्रबंध समिति के विधिवत अनुमोदन और प्रस्ताव पास होने के पश्चात ही किया जाना न्यायोचित होगा।"
लेकिन भ्रष्टाचार की रफ्तार के आगे इस कानूनी अड़चन को भी उड़ा दिया गया। प्रबंध समिति की बिना किसी अगली बैठक या बिना किसी अनुमोदन के, मऊगंज के अनुविभागीय अधिकारी (SDM/राजस्व) ने अपनी शक्तियों का दुरुपयोग करते हुए 18 मार्च 2026 को इस पूरे फर्जीवाड़े और संदेहास्पद भुगतानों को हरी झंडी दे दी। सबसे रहस्यमयी बात यह है कि सरकारी नोटशीट में इस बात का कोई उल्लेख नहीं है कि यह लाखों रुपये की राशि किस बैंक खाते में और किस माध्यम से ट्रांसफर की गई।
श्रद्धांतुओं की आस्था के साथ खिलवाड़ और बुनियादी सुविधाओं का अभाव
देवतालाब शिव मंदिर विंध्य क्षेत्र की जनता के लिए केवल एक इमारत नहीं, बल्कि अटूट श्रद्धा का केंद्र है। यहाँ हर महीने लाखों श्रद्धालु मन्नतें मांगते हैं और अपनी गाढ़ी कमाई का एक हिस्सा भगवान के चरणों में अर्पित करते हैं। लेकिन विडंबना देखिए कि जिस परिसर में 48 घंटे के भीतर ₹5.63 लाख कागजों पर फूंक दिए जाते हैं, वहां आज भी दूर-दूर से आने वाली महिला श्रद्धालुओं के लिए एक साफ-सुथरा सार्वजनिक शौचालय तक उपलब्ध नहीं है।
पीने के साफ पानी से लेकर शेड तक की बुनियादी व्यवस्थाएं दम तोड़ रही हैं। नियमों को ताक पर रखकर चहेते सफेदपोशों और वेंडरों को उपकृत करने का यह संगठित खेल मऊगंज प्रशासन पर एक बड़ा कलंक है। अब जनता सीधे तौर पर सरकार से जवाब मांग रही है कि आस्था पर डकैती डालने वाले इन ऊंचे ओहदों पर बैठे जिम्मेदारों और उनके संरक्षकों को जेल की सलाखों के पीछे कब भेजा जाएगा?