MP के 5 लाख आउटसोर्स कर्मचारियों की बड़ी जीत: हाईकोर्ट ने सरकार की याचिका को किया खारिज; अब मिलेगा नियमित कर्मचारियों जैसा वेतन

 
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"मजदूरों की तरह शोषण अब और नहीं"— हाईकोर्ट जबलपुर का सख्त रुख; 10 साल सेवा देने वाले कर्मियों को 2016 की पॉलिसी के तहत मिलेगा पूरा लाभ।

ऋतुराज द्विवेदी,रीवा/भोपाल। मध्यप्रदेश की न्यायपालिका ने आज प्रदेश के करीब 5 लाख परिवारों के घर में खुशियों का दीया जला दिया है। सालों से 'अल्प वेतन' और 'नौकरी जाने के डर' के साये में काम कर रहे आउटसोर्स, संविदा और अंशकालीन कर्मचारियों के पक्ष में हाईकोर्ट ने एक युगांतरकारी फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि कर्मचारियों का शोषण असंवैधानिक है और उन्हें उनके काम का पूरा हक मिलना ही चाहिए।

सरकार की 'अंतरिम रोक' की मांग ठुकराई
मध्यप्रदेश सरकार ने एकलपीठ के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें अस्थाई कर्मचारियों को न्यूनतम वेतनमान और नियमित करने के निर्देश दिए गए थे। हाईकोर्ट की युगलपीठ ने सरकार की इस अपील को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि "इतने बड़े जनहित और कर्मचारियों के भविष्य से जुड़े मामले में कोई अंतरिम रोक नहीं लगाई जा सकती।" यह सरकार के लिए एक बड़ा झटका और कर्मचारियों के लिए नैतिक जीत है।

10 साल की सेवा बनी 'सुनहरा मौका'
कोर्ट ने अपने फैसले में एक स्पष्ट लक्ष्मण रेखा खींची है। आदेश के अनुसार:

जो कर्मचारी 10 साल या उससे अधिक समय से अपनी सेवाएं दे रहे हैं, उन्हें अब लाभ से वंचित रखना तर्कहीन है।
इन कर्मचारियों को 2016 की पॉलिसी के आधार पर नियमितीकरण (Regularization) की प्रक्रिया में शामिल किया जाए।

इन्हें केवल 'फिक्स वेतन' नहीं, बल्कि नियमित पदों के न्यूनतम वेतनमान का लाभ दिया जाए।

रीवा के इन विभागों में मनेगी 'दिवाली'
इस फैसले का सबसे बड़ा असर विंध्य के केंद्र रीवा में देखने को मिलेगा।

  • संजय गांधी अस्पताल: यहाँ तैनात करीब 1000 आउटसोर्स कर्मचारी, जो दिन-रात स्वास्थ्य सेवाओं में लगे हैं, अब सम्मानजनक वेतन के हकदार होंगे।
  • विद्युत विभाग: अपनी जान जोखिम में डालकर काम करने वाले हजारों लाइनमैन और ऑपरेटरों को इस फैसले से बड़ी सुरक्षा मिलेगी।
  • शिक्षा और अन्य विभाग: गांव-गांव में फैले सरकारी दफ्तरों और स्कूलों में कार्यरत चतुर्थ श्रेणी और अन्य आउटसोर्स कर्मियों के अच्छे दिन आने वाले हैं।

"दैनिक रीवा न्यूज़ मीडिया" का विश्लेषण: क्या सरकार अब सुप्रीम कोर्ट जाएगी?
हाईकोर्ट के इस सख्त रुख के बाद अब गेंद सरकार के पाले में है। यदि सरकार इस फैसले को लागू करती है, तो सरकारी खजाने पर आर्थिक भार बढ़ेगा, लेकिन 5 लाख परिवारों का जीवन स्तर सुधर जाएगा। कर्मचारियों ने चेतावनी दी है कि अब वे अपने हक के लिए किसी भी हद तक लड़ने को तैयार हैं।

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