जनस्वास्थ्य से खिलवाड़: मोबीआयल के धुएं और जले तेल में छन रही मुगौडी, रीवा खाद्य सुरक्षा विभाग की संदिग्ध खामोशी : बिना FSSAI लाइसेंस प्रतिदिन 50 हजार का टर्नओवर

 
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रीवा के पुराने बस अड्डा परिसर में स्वास्थ्य मानकों की सरेआम धज्जियां। पंडित मुगौडी वाले द्वारा जले तेल में बन रहे अमानक खाद्य पदार्थ, खाद्य विभाग मौन।

ग्राउंड जीरो,राहुल द्विवेदी। मध्य प्रदेश के रीवा शहर के हृदय स्थल कहे जाने वाले पुराने बस स्टैंड क्षेत्र से एक बेहद गंभीर और चौंकाने वाला मामला प्रकाश में आया है। शहर में खाद्य सुरक्षा और नागरिक स्वास्थ्य को ताक पर रखकर सरेआम जनता की जेब पर डाका डाला जा रहा है। स्थानीय सूत्रों और राहगीरों से मिली जानकारी के अनुसार, पुराने बस अड्डा परिसर में स्थित राज्य परिवहन (एमपीएसआरटीसी) गेट के ठीक बगल में संचालित होने वाले 'पंडित मुगौडी वाले' के ठेले पर न केवल स्वच्छता के नियमों का खुला उल्लंघन किया जा रहा है, बल्कि उपभोक्ताओं से मनमानी कीमतें वसूल कर आर्थिक शोषण की पराकाष्ठा पार कर दी गई है।

हैरानी की बात यह है कि रीवा जिला प्रशासन और खाद्य सुरक्षा विभाग शहर के बड़े प्रतिष्ठानों पर तो दिखावे की कार्रवाई करता है, लेकिन प्रतिदिन हजारों यात्रियों की आवाजाही वाले इस मुख्य मार्ग पर खुले आसमान के नीचे चल रहे इस संदिग्ध और अमानक कारोबार पर उसकी नजरें इनायत नहीं हो रही हैं। धूल, मिट्टी और प्रदूषण के बीच परोसा जा रहा यह भोजन सीधे तौर पर आम आदमी को गंभीर बीमारियों की ओर धकेल रहा है।

₹400 किलो मुगौडी और 'बीपी की गोली' जैसे आलूबंडे: लूट का पूरा गणित क्या है?
इस ठेले पर बेचे जा रहे खाद्य पदार्थों की कीमतें, उनका स्वरूप और उनका आकार देखकर कोई भी जागरूक नागरिक हैरान रह सकता है। रीवा शहर ही नहीं, बल्कि पूरे विंध्य क्षेत्र या मध्य प्रदेश के किसी भी कोने में स्ट्रीट फूड के तौर पर मिलने वाली मुगौडी की कीमत इतनी अधिक कहीं नहीं है। यहाँ की वास्तविक विसंगतियों को बिंदुवार तरीके से आसानी से समझा जा सकता है:

मूंग दाल की मुगौडी का मनमाना दाम: इस ठेले पर वर्तमान में मुगौडी की कीमत ₹400 प्रति किलोग्राम की अत्यधिक और अवास्तविक दर पर तय की गई है। जबकि आम बाज़ार और अन्य मानक दुकानों पर इसकी वास्तविक कीमत ₹160 से ₹200 प्रति किलो के बीच होती है। इसके अलावा, मुनाफाखोरी के लिए इसमें शुद्ध मूंग दाल की आड़ में बेहद सस्ती और मिलावटी सामग्रियों का मिश्रण तैयार करने की भी गंभीर शिकायतें हैं।

'बीपी की गोली' के आकार का आलूबंडा: सामान्यतः बाज़ार में मिलने वाले आलूबंडे का आकार मध्यम या बड़ा होता है, जिसे देखकर उसकी कीमत सही लगती है। परंतु, यहाँ ₹10 प्रति नग की दर से मिलने वाले आलूबंडे का आकार इतना छोटा कर दिया गया है कि वह किसी मरीज की ब्लड प्रेशर (रक्तचाप) की टैबलेट (गोली) के समान दिखाई देता है। यह उपभोक्ताओं की जेब और पेट दोनों के साथ सीधा मज़ाक है।

तेल की घटिया और अमानक गुणवत्ता: खाद्य मानकों के अनुसार कड़ाही में एक बार इस्तेमाल किए गए तेल को दोबारा उपयोग में नहीं लाना चाहिए। परंतु, यहाँ एकल उपयोग के नियमों को ताक पर रखकर, बार-बार उसी जले हुए काले तेल में मुगौडी और आलूबंडे तले जाते हैं, जो वाहनों के धुएं के बीच और भी विषैला हो जाता है।

आम उपभोक्ताओं का साफ़ तौर पर आरोप है कि यहाँ मिलने वाला सामान न तो सेहत के लिहाज से ठीक है और न ही दाम के लिहाज से न्यायसंगत है। यह सीधे तौर पर उपभोक्ताओं के अधिकारों का हनन और व्यावसायिक अनैतिकता का सबसे बड़ा उदाहरण है।

मोबीआयल का धुआं, धूल और जहरीला जला हुआ तेल: बीमारी परोसता ठेला
भौगोलिक स्थिति को देखें तो यह ठेला पुराने बस स्टैंड के बेहद व्यस्त और प्रदूषित हिस्से में सड़क किनारे स्थित है। यहाँ चौबीसों घंटे चलने वाली बसों, ऑटो और दोपहिया वाहनों से निकलने वाला जहरीला धुआं और उड़ती हुई धूल सीधे कड़ाही में उबल रहे तेल और बाहर रखी खाद्य सामग्रियों पर जमा होती है।

स्वास्थ्य के लिए तीन बड़े खतरे:

  • सस्पेंडेड पार्टिकुलेट मैटर (SPM): सड़क की धूल और मोबीआयल का काला धुआं भोजन में मिलकर उसे धीमा जहर बना रहा है।
  • कैंसरकारी तत्व (Acrolein): जब खाने के तेल को बार-बार अत्यधिक तापमान पर उबाला जाता है, तो वह काले रंग के 'टॉक्सिक वेस्ट' में बदल जाता है। इसका सेवन करने से लीवर, पेट और हृदय संबंधी घातक बीमारियां होने का खतरा शत-प्रतिशत बढ़ जाता है।
  • खुला आसमान और मक्खियाँ: परिवहन गेट के पास किसी भी प्रकार की सुरक्षात्मक जाली या कांच के आवरण (ग्लास बॉक्स) के बिना भोजन को खुले में रखा जाता है, जिससे संक्रमण फैलने की आशंका तीव्र रहती है।

दैनिक 50 हजार रुपये का काला कारोबार और खाद्य सुरक्षा विभाग की संदिग्ध खामोशी
शिकायतकर्ताओं और स्थानीय दुकानदारों का अनुमान है कि स्थान की व्यस्तता और मजबूरी में आने वाले यात्रियों के कारण इस सिंगल ठेले की दैनिक आमदनी (टर्नओवर) लगभग ₹50,000 के आसपास बैठती है। इतनी भारी-भरकम कमाई करने के बावजूद इस प्रतिष्ठान के पास न तो नियमानुसार फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (FSSAI) का अनिवार्य पंजीकरण/लाइसेंस है और ना ही ये किसी भी प्रकार के वाणिज्यिक नियमों का पालन करते हैं।

स्थानीय नागरिकों का तीखा सवाल:
"क्या रीवा का खाद्य सुरक्षा अमला सिर्फ कागजी खानापूर्ति के लिए है? जो ठेला प्रतिदिन पचास हजार रुपये कूट रहा है और जनता को अमानक खाना खिलाकर बीमार कर रहा है, उस पर आज तक कोई सैंपलिंग या जब्ती की कार्रवाई क्यों नहीं की गई? क्या इस अनदेखी के पीछे किसी प्रकार का गुप्त प्रशासनिक संरक्षण या 'मासिक सुविधा शुल्क' का खेल चल रहा है?"

रीवा में अमानक और महंगे स्ट्रीट फूड की शिकायत कलेक्ट्रेट और सीएम हेल्पलाइन पर कैसे करें?
यदि आप भी रीवा शहर में पंडित मुगौडी वाले या इसके जैसे किसी अन्य मिलावटखोर व मनमाने दाम वसूलने वाले वेंडर से पीड़ित हैं, तो आप चुप बैठने के बजाय निम्नलिखित विधिक और शासकीय माध्यमों से अपनी शिकायत दर्ज करा सकते हैं:

  • सीएम हेल्पलाइन (181): अपने मोबाइल से सीधे 181 डायल करें। अपनी शिकायत में स्थान (पुराना बस अड्डा, राज्य परिवहन गेट के पास, रीवा) और वेंडर का नाम स्पष्ट करते हुए मिलावटखोरी, अस्वच्छता और ओवरप्राइजिंग की शिकायत दर्ज कराएं।
  • खाद्य सुरक्षा विभाग (FSSAI MP Portal): मध्य प्रदेश खाद्य सुरक्षा आयुक्त के ऑनलाइन पोर्टल पर जाकर 'Report Unsafe Food' के विकल्प पर शिकायत दर्ज करें।
  • रीवा कलेक्टर जनसुनवाई: प्रत्येक मंगलवार को कलेक्ट्रेट कार्यालय में आयोजित होने वाली जनसुनवाई में लिखित आवेदन देकर इस सार्वजनिक स्वास्थ्य के मुद्दे पर त्वरित कार्रवाई की मांग की जा सकती है।

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