स्वास्थ्य के क्षेत्र में आत्मनिर्भर हुआ रीवा: डिप्टी सीएम राजेंद्र शुक्ल ने दी विंध्य के दिव्यांगों को डिजिटल अंगों की बड़ी सौगात
ऋतुराज द्विवेदी,रीवा/भोपाल। विंध्य क्षेत्र के चिकित्सा इतिहास में एक नया स्वर्णिम अध्याय जुड़ गया है। मध्य प्रदेश के रीवा जिले में अब दिव्यांगजनों की शारीरिक चुनौतियों को दूर करने के लिए अत्याधुनिक कदम उठाए गए हैं। शहर की रेड क्रॉस सोसाइटी में अब हाईटेक और कंप्यूटर आधारित कृत्रिम अंगों का निर्माण शुरू कर दिया गया है।


रीवा रेड क्रॉस आत्मनिर्भर कैसे बना और इसके दूरगामी परिणाम क्या हैं?
अब तक रीवा और उसके आस-पास के जिलों जैसे सतना, सीधी, सिंगरौली और शहडोल संभाग के दिव्यांगों को कृत्रिम हाथ या पैर लगवाने के लिए एक लंबी और थकाऊ प्रक्रिया से गुजरना पड़ता था। स्थानीय स्तर पर कोई आधुनिक सुविधा न होने के कारण लोगों को राजस्थान के जयपुर या अन्य दूरदराज के केंद्रों पर पूरी तरह आश्रित रहना पड़ता था।
समय और पैसे की बर्बादी पर रोक:
पुरानी व्यवस्था के तहत मरीजों को पहले पंजीकरण कराना होता था, फिर उनके अंगों का नाप लिया जाता था, जिसे निर्माण के लिए बाहर भेजा जाता था। इस पूरी प्रक्रिया में कई महीनों का समय लग जाता था। कई बार गरीब हितग्राही आर्थिक तंगी और लंबी यात्राओं की परेशानी के कारण बीच में ही प्रयास छोड़ देते थे। लेकिन अब रीवा रेड क्रॉस सोसाइटी तकनीकी रूप से पूरी तरह आत्मनिर्भर हो चुकी है। अब नाप लेने से लेकर अंगों को तैयार करने और उनके फिटमेंट की पूरी प्रक्रिया स्थानीय स्तर पर ही पूरी की जाएगी।

दिव्यांगों के लिए सेंसर वाले अंग कैसे काम करते हैं और इसके क्या फायदे हैं?
रीवा में स्थापित की गई यह नई यूनिट पारंपरिक तरीकों से बिल्कुल अलग है। यहाँ जो मशीनें लगाई गई हैं, वे आधुनिकतम कंप्यूटर सॉफ्टवेयर और सेंसर तकनीक पर काम करती हैं।
तकनीकी विशेषताएं और लाभ:
सटीक फिटिंग : कंप्यूटर आधारित स्कैनिंग की मदद से दिव्यांग व्यक्ति के शरीर के अंगों का बिल्कुल सटीक नाप लिया जाता है, जिससे कृत्रिम अंग पहनने में कोई असुविधा या दर्द नहीं होता।
सेंसर तकनीक : सेंसर वाले कृत्रिम अंग व्यक्ति की मांसपेशियों के मूवमेंट को भांपकर काम करते हैं, जिससे कृत्रिम हाथ या पैर का संचालन काफी हद तक प्राकृतिक अंगों जैसा महसूस होता है।
स्थानीय स्तर पर मरम्मत: यदि भविष्य में इन उपकरणों में कोई तकनीकी खराबी आती है, तो मरीज को परेशान होने की जरूरत नहीं होगी। रेड क्रॉस के तकनीशियन स्थानीय स्तर पर ही इसे तुरंत ठीक कर सकेंगे।
रीवा में उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ल ने किस विजन के साथ किया इस यूनिट का उद्घाटन?
इस महत्वपूर्ण अवसर पर उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ल ने जनता को संबोधित करते हुए स्वास्थ्य क्षेत्र में आत्मनिर्भरता के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि समय बदलने के साथ-साथ चिकित्सा तकनीकों में भी भारी बदलाव आया है और सरकार का प्रयास है कि विंध्य के नागरिकों को देश की सबसे बेहतरीन स्वास्थ्य सुविधाएं उनके घर के पास ही मिल सकें।
डिप्टी सीएम ने बताया कि इस केंद्र पर विशेष रूप से प्रशिक्षित डॉक्टरों, बायो-मेडिकल इंजीनियरों और कुशल तकनीशियनों की एक टीम तैनात की गई है। यह टीम न केवल अंगों का निर्माण करेगी, बल्कि दिव्यांगजनों को उन अंगों के इस्तेमाल के लिए आवश्यक फिजियोथेरेपी और प्रशिक्षण भी प्रदान करेगी, ताकि वे आत्मविश्वास के साथ समाज की मुख्यधारा में शामिल हो सकें।
जयपुर पैर और रीवा की नई यूनिट के ऐतिहासिक सफर की कहानी क्या है?
अपने संबोधन के दौरान उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ल भावुक भी हुए और उन्होंने दो दशक पुराना एक संस्मरण साझा किया। उन्होंने बताया कि वर्ष 2003 से 2008 के बीच जब वे पहली बार रीवा के विधायक थे, तब क्षेत्र में दिव्यांगों की बेबसी को देखकर उन्होंने एक विशाल 'दिव्यांग मेगा शिविर' का आयोजन करवाया था।
उस समय रीवा में कोई बुनियादी ढांचा नहीं था, जिसके कारण जयपुर से विशेषज्ञों की एक बहुत बड़ी टीम को विशेष रूप से रीवा बुलाना पड़ा था। उस शिविर में हजारों जरूरतमंदों को कृत्रिम अंग बांटे गए थे। डिप्टी सीएम ने गर्व व्यक्त करते हुए कहा कि जो रीवा कभी बाहरी टीमों के भरोसे था, आज 2026 में वह खुद इतना सक्षम हो चुका है कि यहाँ की रेड क्रॉस सोसाइटी स्वयं हाईटेक अंग बनाकर पूरे विंध्य की सेवा करने के लिए तैयार खड़ी है।