रीवा में भ्रष्ट सरपंच-सचिवों में हड़कंप: सोहागी सरपंच की कुर्सी छिनी, तीन गबन आरोपियों को जेल भेजने का फरमान जारी
ऋतुराज द्विवेदी,रीवा/भोपाल। मध्य प्रदेश के रीवा जिले से इस वक्त पंचायती राज व्यवस्था के भीतर चल रहे भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद पर अब तक की सबसे बड़ी और कड़ी प्रशासनिक कार्रवाई सामने आई है। जिला पंचायत रीवा के प्रशासनिक गलियारों में उस वक्त हड़कंप मच गया जब जिला पंचायत प्रशासन ने वित्तीय अनियमितताओं, सरकारी पैसों के गबन और शासकीय नियमों को ताक पर रखकर मलाई चाटने वाले जनप्रतिनिधियों और कर्मचारियों के खिलाफ एक साथ दो बड़े हंटर चलाए।
इस ऐतिहासिक कार्रवाई के तहत जहाँ एक तरफ रसूखदार ग्राम पंचायत सोहागी के सरपंच को उनकी कुर्सी से बेदखल कर दिया गया है, वहीं दूसरी तरफ शासकीय राशि डकार कर बैठे दो अन्य ग्राम पंचायतों के तीन ज़िम्मेदार चेहरों के खिलाफ सीधे जेल भेजने का वारंट जारी कर दिया गया है। जिला पंचायत प्रशासन की इस त्वरित और निष्पक्ष कार्रवाई ने विंध्य क्षेत्र की अन्य ग्राम पंचायतों में भ्रष्टाचार की बुनियाद पर महल खड़े करने वाले बिचौलियों, सचिवों और सरपंचों की रातों की नींद उड़ा दी है।
सोहागी पंचायत का महा-घोटाला: कैसे सरपंच ने सरकारी खजाने को बनाया पारिवारिक जागीर?
रीवा जिले की त्योंथर जनपद पंचायत के अंतर्गत आने वाली ग्राम पंचायत सोहागी विकास कार्यों के नाम पर आए फंड को डकारने का एक बड़ा केंद्र बन चुकी थी। यहाँ के सरपंच शेषमणि मिश्र ने लोकतांत्रिक मर्यादाओं और पंचायती राज के कड़े नियमों को पूरी तरह से दरकिनार कर दिया था। जांच दल द्वारा सौंपे गए आधिकारिक दस्तावेजों के अनुसार, सरपंच शेषमणि मिश्र ने ग्राम पंचायत सोहागी में होने वाले तमाम निर्माण और विकास कार्यों में अपने सगे पुत्र आशुतोष मिश्र को ही मुख्य वेंडर (सामग्री प्रदाता और ठेकेदार) घोषित कर दिया था।
इसके बाद शुरू हुआ पिता-पुत्र की जुगलबंदी का वो गंदा खेल, जिसने सरकार के खजाने को भारी नुकसान पहुँचाया। बिना किसी उचित टेंडर प्रक्रिया या नियमों का पालन किए, सरपंच पिता ने अपने ठेकेदार बेटे के बैंक खातों में 35.17 लाख रुपये की भारी-भरकम राशि का नियम-विरुद्ध और अवैध भुगतान करवा दिया। पंचायत के पैसों को अपनी घरेलू और पारिवारिक जागीर समझकर उड़ाने का यह कृत्य खोजी जांच में पूरी तरह से बेनकाब हो गया।
धारा 40 के तहत शेषमणि मिश्र बर्खास्त, सचिव मनपूर्ण प्रसाद शुक्ल भी सस्पेंड
सोहागी पंचायत में चल रहे इस भारी भ्रष्टाचार के खिलाफ स्थानीय जागरूक नागरिक और शिकायतकर्ता राजीव कुमार दुबे ने जिला प्रशासन के समक्ष पुख्ता साक्ष्यों के साथ लिखित शिकायत दर्ज कराई थी। इस गंभीर शिकायत को संज्ञान में लेते हुए जिला पंचायत प्रशासन ने एक उच्च स्तरीय जांच दल का गठन किया था। जब इस जांच दल ने सोहागी पंचायत के खातों, वाउचरों और जमीनी कार्यों का भौतिक सत्यापन किया, तो वित्तीय अनियमितताओं और नियमों के क्रूर उल्लंघन की सौ फीसदी पुष्टि हो गई।
जांच रिपोर्ट के आधार पर जिला पंचायत रीवा ने कड़ा रुख अपनाते हुए मध्य प्रदेश पंचायती राज एवं ग्राम स्वराज अधिनियम, 1993 की सबसे मारक धारा 40 का प्रयोग किया। इस कानून के तहत सोहागी के सरपंच शेषमणि मिश्र को कदाचार और पद के दुरुपयोग का दोषी पाते हुए तत्काल प्रभाव से सरपंच पद से पृथक (बर्खास्त) कर दिया गया। इतना ही नहीं, इस पूरे काले कारनामे में मूकदर्शक बने रहने और वित्तीय हेरफेर में मूक सहमति देने के आरोप में पंचायत सचिव मनपूर्ण प्रसाद शुक्ल को भी सस्पेंड (निलंबित) कर दिया गया है। सस्पेंशन के दौरान उनका मुख्यालय जनपद पंचायत कार्यालय त्योंथर निर्धारित किया गया है।
देवरा कोठार और फरहदी पंचायत में गबन: पूर्व सरपंच और सचिव समेत 3 को जेल भेजने की तैयारी
जिला पंचायत रीवा की यह कार्रवाई सिर्फ सोहागी पंचायत की बर्खास्तगी तक ही सीमित नहीं रही। भ्रष्टाचार के खिलाफ जारी इस महा-अभियान के दूसरे चरण में जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी (CEO) मेहताब सिंह गुर्जर ने शासकीय धन का गबन करने वाले तीन बेहद रसूखदार चेहरों को सीधे जेल की सलाखों के पीछे भेजने का फरमान जारी कर दिया है।
सीईओ मेहताब सिंह गुर्जर ने जिन तीन लोगों के खिलाफ सीधे जेल वारंट जारी किया है, उनके नाम और पद इस प्रकार हैं:
- रावेंद्र सिंह (पूर्व सरपंच, ग्राम पंचायत देवरा कोठार)
- राजबहोर यादव (तत्कालीन सचिव, ग्राम पंचायत फरहदी)
- नारायण प्रसाद मिश्रा (ग्राम रोजगार सहायक - GRS, ग्राम पंचायत फरहदी)
इन तीनों ही आरोपियों के खिलाफ अलग-अलग विकास कार्यों, मनरेगा योजनाओं और पंचायती राज के फंड में भारी वित्तीय धोखाधड़ी और सीधे तौर पर शासकीय राशि को निजी उपयोग में लेने (गबन) के संगीन आरोप विभागीय जांच में शत-प्रतिशत प्रमाणित पाए गए थे।
रिकवरी न करने पर धारा 92 का प्रहार: सीईओ मेहताब सिंह गुर्जर का सख्त संदेश
आधिकारिक सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, देवरा कोठार के पूर्व सरपंच रावेंद्र सिंह, तत्कालीन सचिव राजबहोर यादव और रोजगार सहायक नारायण प्रसाद मिश्रा को जांच में दोषी पाए जाने के बाद प्रशासन द्वारा गबन की गई पूरी राशि को ब्याज सहित सरकारी खजाने में वापस जमा करने (रिकवरी) के कई कड़े नोटिस जारी किए गए थे। इन्हें पर्याप्त समय दिया गया था कि ये चोरी किया गया पैसा ईमानदारी से सरेंडर कर दें।
परंतु, प्रशासनिक आदेशों को हल्के में लेने और अकड़ दिखाने की आदत के चलते इन तीनों ने तय समय-सीमा के भीतर एक भी रुपया सरकारी खाते में जमा नहीं कराया। इसके बाद जिला पंचायत सीईओ मेहताब सिंह गुर्जर ने पंचायती राज अधिनियम की सबसे कठोर धारा 92 का ब्रह्मास्त्र चलाया। इस धारा के तहत सरकारी पैसे की रिकवरी न होने की दशा में दोषी व्यक्तियों को सीधे जेल भेजने का प्रावधान है। इसी नियम के तहत अब तीनों के खिलाफ गैर-जमानती जेल वारंट तामील करने के निर्देश संबंधित पुलिस थानों को भेज दिए गए हैं।
रीवा की पंचायतों में भ्रष्टाचार की पुरानी फाइलें: लंबित वारंट और रिकवरी का सच
सोहागी, देवरा कोठार और फरहदी पंचायत पर हुई यह ताबड़तोड़ कार्रवाई तो महज़ एक बानगी है। रीवा जिले के पंचायती राज और ग्रामीण विकास विभाग के दफ्तरों में भ्रष्टाचार की ऐसी सैकड़ों फाइलें धूल फांक रही हैं, जिनमें करोड़ों रुपयों की रिकवरी और दर्जनों पूर्व सरपंचों-सचिवों के खिलाफ जेल वारंट पहले से जारी हैं। स्थानीय राजनीतिक दबाव और जमीनी स्तर पर पुलिस व प्रशासनिक अमले की ढीली कार्यप्रणाली के कारण कई पुराने मामलों के आरोपी आज भी खुलेआम घूम रहे हैं।
जिले के प्रबुद्ध नागरिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि जब तक पूर्व के गबन के मामलों में भी इसी तरह की त्वरित और कठोर जेल भेजने की कार्रवाई नहीं होगी, तब तक गांवों तक पहुँचने वाले विकास कार्य के पैसों की चोरी को पूरी तरह नहीं रोका जा सकता। हालांकि, जिला पंचायत के वर्तमान सीईओ मेहताब सिंह गुर्जर के इन हालिया तेवरों ने यह साफ कर दिया है कि अब सरकारी पैसे का गबन करने वालों के लिए रीवा में कोई सुरक्षित ठिकाना नहीं बचा है।
ग्राम पंचायतों को लोकतंत्र की सबसे प्राथमिक और पवित्र इकाई माना जाता है, लेकिन जब इसके रखवाले ही भक्षक बन जाएं, तो विकास की उम्मीदें दम तोड़ देती हैं। रीवा जिला पंचायत द्वारा सोहागी के सरपंच शेषमणि मिश्र की बर्खास्तगी और गबन के तीन अन्य आरोपियों के खिलाफ जेल वारंट जारी करना इस बात का कड़ा प्रमाण है कि देर से ही सही, कानून का डंडा हर भ्रष्टाचारी पर चलता है।
अपने बेटे को वेंडर बनाकर 35 लाख रुपये का डाका डालने वाले सरपंच पर हुई यह कार्रवाई पूरे मध्य प्रदेश के पंचायती राज महकमे के लिए एक बड़ा नजीर साबित होगी। अब देखना यह होगा कि क्या स्थानीय पुलिस प्रशासन इन जेल वारंटों पर मुस्तैदी से अमल करते हुए आरोपियों को सलाखों के पीछे भेजता है या फिर रसूखदार आरोपी एक बार फिर कानून की कमियों का फायदा उठाकर बच निकलने में कामयाब हो जाते हैं।