रीवा शिक्षा विभाग में 'कुर्सी' का महासंग्राम: रिटायरमेंट से पहले डीईओ पद के लिए दिल्ली-भोपाल तक जुगत, जानिए कौन है रेस में सबसे आगे?

 
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रामराज मिश्रा के रिटायरमेंट के बाद डीईओ की कुर्सी के लिए प्राचार्यों में मची है खींचतान, कोई वरिष्ठता तो कोई राजनीतिक सिफारिश के भरोसे, भ्रष्टाचार की चर्चाओं के बीच क्या ईमानदार अफसर को मिलेगा मौका?

ऋतुराज द्विवेदी, रीवा/भोपाल। रीवा के शिक्षा महकमे में इन दिनों सन्नाटा नहीं, बल्कि एक भारी हलचल है। वर्तमान डीईओ रामराज मिश्रा के जुलाई में रिटायर होने के साथ ही, जिला शिक्षा अधिकारी की कुर्सी खाली हो रही है। लेकिन इस कुर्सी पर काबिज होने के लिए मची दौड़ यह दर्शाती है कि यह पद सिर्फ 'सेवा' का नहीं, बल्कि 'असीमित अधिकारों' का केंद्र बन चुका है।

आरएल दीपांकर: अनुभव और सिफारिश का तालमेल
फिलहाल मार्तण्ड उत्कृष्ट क्रमांक-3 के प्राचार्य आरएल दीपांकर का नाम इस दौड़ में सबसे आगे बताया जा रहा है। वे न केवल वरिष्ठ हैं, बल्कि राजनीतिक गलियारों में भी उनकी पकड़ मजबूत है। डिप्टी सीएम के करीबियों में माने जाने वाले दीपांकर ने पहले भी इस कुर्सी के लिए लंबी मशक्कत की थी, लेकिन तब वे बाजी चूक गए थे। इस बार जिला पंचायत अध्यक्ष की सिफारिश और भोपाल भेजी गई नोटसीट उनके पक्ष में माहौल बना रही है।

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वरिष्ठता का कार्ड: क्या सुधा मिश्रा बाजी मारेंगी?
अगर शासन ने इस बार 'वरिष्ठता' को मुख्य मानक बनाया, तो खेल पूरी तरह पलट सकता है। सबसे वरिष्ठ प्राचार्य के रूप में सगरा की प्राचार्य सुधा मिश्रा का दावा सबसे मजबूत है। इतिहास गवाह है कि पिछली बार भी वरिष्ठता के आधार पर ही रामराज मिश्रा की ताजपोशी हुई थी। यदि मामला विधानसभा स्तर तक पहुंचता है, तो जेपी जैसवाल या संजय सक्सेना जैसे नाम भी इस रेस में दावेदारी ठोक सकते हैं।

दौड़ में शामिल अन्य दावेदार और 'पीएल मिश्रा' का बाहर होना
कुर्सी पाने की चाहत में आकांक्षा सोनी, शिव कुमार त्रिपाठी और महेश कुमार तिवारी जैसे नाम भी चर्चाओं में हैं। वहीं, एक समय दौड़ में माने जा रहे पीएल मिश्रा का पत्ता पूरी तरह कट चुका है। राजनीतिक समीकरणों और पूर्व विधानसभा अध्यक्ष से नजदीकी उनके लिए घातक साबित हुई, जिससे उनका नाम रेस से बाहर हो गया है।

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वरुणेन्द्र प्रताप सिंह: ईमानदार विकल्प की उम्मीद
यदि डिप्टी सीएम शिक्षा विभाग में शुद्धता और पारदर्शिता लाने का साहसी निर्णय लेते हैं, तो पीके स्कूल के प्राचार्य वरुणेन्द्र प्रताप सिंह इस दौड़ में 'डार्क हॉर्स' साबित हो सकते हैं। वे अपनी बेदाग कार्यशैली और भ्रष्टाचार से दूरी के लिए जाने जाते हैं। शिक्षा विभाग को पटरी पर लाने के लिए उनके नाम को सबसे सटीक विकल्प माना जा रहा है।

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भ्रष्टाचार का 'सुरक्षित कवच': आखिर डीईओ की कुर्सी इतनी आकर्षक क्यों?
डीईओ की कुर्सी भ्रष्टाचार के मामलों के बावजूद 'सुरक्षित' मानी जाने लगी है। पिछले वर्षों का रिकॉर्ड देखें, तो अनुरक्षण घोटाला हो या अनुकंपा नियुक्ति का फर्जीवाड़ा—अधिकारियों पर लगे गंभीर आरोपों के बावजूद, ऊपर से 'संरक्षण' मिलने के कारण वे बचते रहे हैं। यही वजह है कि अब हर कोई इस पद को हथियाना चाहता है, क्योंकि उन्हें पता है कि अगर पकड़े भी गए, तो 'सिस्टम' उन्हें बचा लेगा।

रीवा की शिक्षा व्यवस्था अब एक चौराहे पर है। क्या अगला डीईओ अपनी प्रशासनिक योग्यता से विभाग का मान बढ़ाएगा या फिर वही पुरानी भ्रष्टाचार की परंपरा जारी रहेगी? निर्णय डिप्टी सीएम को लेना है कि वे 'जुगाड़' को चुनते हैं या 'ईमानदारी' को।

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