रीवा इको पार्क घोटाला: एंट्री थी पूरी तरह फ्री, RTI की सील और दस्तखत ने खोला ₹8.35 करोड़ की अवैध वसूली का राज! हिल गया प्रशासन

 
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ऋतुराज द्विवेदी, रीवा/भोपाल। मध्य प्रदेश के रीवा जिले से एक बेहद हैरान करने वाला और भ्रष्टाचार से जुड़ा बड़ा मामला सामने आया है। रीवा का प्रसिद्ध इकोटूरिज्म एंड एडवेंचर पार्क, जिसे आमतौत पर लोग 'इको पार्क' के नाम से जानते हैं, वहां आम जनता से करोड़ों रुपये की अवैध वसूली का एक बड़ा भंडाफोड़ हुआ है। यह पूरा खुला

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सा किसी अफवाह या मनगढ़ंत कहानी पर नहीं, बल्कि सूचना के अधिकार (RTI) के तहत निकाले गए असली सरकारी दस्तावेजों के आधार पर हुआ है। आरटीआई से प्राप्त दस्तावेजों (जैसे कि पत्र दिनांक 08.06.2026) से साफ पता चलता है कि इको पार्क के संचालक कंपनी ने नियम और शर्तों की धज्जियां उड़ाते हुए आम नागरिकों से एंट्री फीस (प्रवेश शुल्क) के नाम पर लगभग ₹8.35 करोड़ रुपये अवैध रूप से वसूल लिए हैं।  

इस खूबसूरत इको पार्क का भव्य उद्घाटन 24 सितंबर 2023 को किया गया था। रीवा की जनता को उम्मीद थी कि यह पार्क उनके लिए एक बेहतरीन सार्वजनिक सुविधा और मनोरंजन का केंद्र बनेगा। लेकिन संचालक कंपनी ने उद्घाटन के ठीक दो दिन बाद से ही, यानी 26 सितंबर 2023 से ही, हर एक व्यक्ति (प्रति व्यक्ति) से ₹100 रुपये का प्रवेश शुल्क लेना शुरू कर दिया। यह अवैध वसूली दिनांक 30.09.2023 से लेकर आज तक लगातार बिना किसी रोक-टोक के चल रही है और जब तक आरटीआई के माध्यम से असली कंसेशन एग्रीमेंट (अनुबंध) सामने नहीं आया, तब तक आम जनता को अंधेरे में रखकर यह खुली लूट की जा रही थी।  

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आरटीआई से मिले सरकारी दस्तावेज: अनुबंध की कंडिका 15.2(c) क्या कहती है?
रीवा के जागरूक नागरिकों और निवेदक के पास मौजूद एक्सक्लूसिव आरटीआई दस्तावेजों के मुताबिक, एमपी इकोटूरिज्म डेवलपमेंट बोर्ड और संचालक कंपनी के बीच जो कंसेशन एग्रीमेंट साइन हुआ था, उसके पेज नंबर 54 पर ARTICLE 15: OPERATIONS AND MAINTENANCE PERIOD के तहत आने वाली कंडिका (Clause) 15.2 (c) को पढ़ना बेहद जरूरी है। इस सरकारी क्लॉज में साफ तौर पर लिखा गया है:  

"The Concessionaire recognizes and acknowledges the fact that the Project is intended to provide a public facility, and the Concessionaire shall have no right to prevent, impede or obstruct any bona fide visitor from using the Ecotourism & Adventure Park, save and except for regulating such usage under the terms of this Concession Agreement..."

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इस सरकारी अनुबंध का सीधा और साफ मतलब यह है कि यह पूरा प्रोजेक्ट एक 'पब्लिक फैसिलिटी' (जनता की सुविधा) के लिए बनाया गया है। संचालक कंपनी के पास ऐसा कोई अधिकार नहीं है कि वह किसी भी प्रामाणिक आगंतुक (bona fide visitor) को पार्क के अंदर जाने से रोके, बाधा पहुंचाए या उसे अवरुद्ध करे। संचालक का काम केवल पार्क के उपयोग को विनियमित (regulate) करना है, ना कि वहां आने-जाने वाले स्थानीय लोगों और पर्यटकों पर जबरन ₹100 का टैक्स या टिकट थोप देना। इस अनुबंध के तहत पार्क के अंदर प्रवेश पूरी तरह से निःशुल्क (Free Entry) होना चाहिए।  

ठगी का पूरा गणित: प्रति दिन और प्रति माह की अवैध कमाई का कैलकुलेशन
शिकायत पत्र और आरटीआई के आंकड़ों के आधार पर जब इस पूरे घोटाले के वित्तीय गणित को समझा जाता है, तो यह आंकड़े किसी के भी होश उड़ाने के लिए काफी हैं। पार्क में आने वाले लोगों की संख्या और उनसे लिए जा रहे ₹100/- प्रति व्यक्ति के हिसाब से होने वाली अवैध कमाई का पूरा विवरण इस प्रकार है:  

  • सामान्य दिनों की कमाई: सप्ताह के सामान्य 5 दिनों में प्रतिदिन औसतन 600 व्यक्ति पार्क आते हैं। ₹100/- प्रति व्यक्ति की टिकट दर के हिसाब से सामान्य दिनों में रोजाना लगभग ₹60,000/- की अवैध वसूली की जाती है।  
  • अवकाश के दिनों की कमाई: शनिवार, रविवार या किसी अन्य सरकारी छुट्टी के दिन पार्क में आने वाले लोगों की संख्या बढ़कर 1000 से 1500 व्यक्ति तक पहुंच जाती है। इस लिहाज से छुट्टियों वाले दिनों में प्रतिदिन ₹1,00,000/- से लेकर ₹1,50,000/- तक का कलेक्शन होता है।  
  • मासिक अवैध कमाई: यदि पूरे महीने का औसत निकाला जाए, तो हर महीने लगभग 23,200 लोग पार्क पहुंचते हैं, जिससे संचालक कंपनी की प्रति माह की अवैध कमाई करीब ₹23.2 लाख बैठती है।  
  • वार्षिक अवैध कमाई: इस मासिक लूट को यदि साल के पैमाने पर देखा जाए, तो यह आंकड़ा सालाना ₹2.78 करोड़ रुपये तक पहुंच जाता है।  
  • कुल घोटाले की रकम: 30 सितंबर 2023 से लेकर आज (जून 2026) तक की पूरी अवधि को जोड़ा जाए, तो रीवा की आम जनता की जेब से अब तक कुल ₹8.35 करोड़ रुपये की अवैध वसूली की जा चुकी है, जिसे तुरंत सरकारी खजाने में राजसात किया जाना चाहिए।  

वित्तीय आकलन से साफ झलकता है कि संचालक कंपनी हर महीने रीवा की आम जनता की जेब से लगभग ₹23.2 लाख रुपये का डाका डाल रही है। साल भर में यह राशि ₹2.78 करोड़ रुपये तक पहुंच जाती है। सितंबर 2023 से लेकर जून 2026 तक का अगर कुल जोड़ निकाला जाए, तो यह अवैध वसूली का आंकड़ा ₹8.35 करोड़ रुपये को पार कर चुका है, जिसे तुरंत सरकारी खजाने में राजसात किया जाना चाहिए।  

चाट-फुलकी और सॉफ्ट ड्रिंक्स पर ही टैक्स, पर एंट्री क्यों फ्री? नियम समझिए
अक्सर लोगों के मन में यह सवाल आता है कि यदि संचालक कंपनी टिकट नहीं लेगी, तो पार्क के संचालन का खर्च कैसे निकलेगा? इसका स्पष्ट जवाब भी सरकारी नियमों में छुपा है। कंसेशन एग्रीमेंट का मूल उद्देश्य यह था कि रीवा के नागरिकों को ताजी हवा लेने, टहलने और प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद लेने के लिए कोई भी प्रवेश शुल्क नहीं देना होगा। पार्क का परिसर पूरी तरह से मुफ्त रहेगा।  

कंपनी की वास्तविक कमाई के लिए अनुबंध में अलग से व्यावसायिक प्रावधान (Commercial Provisions) किए गए हैं। नियम के अनुसार, यदि कोई पर्यटक पार्क के अंदर जाने के बाद वहां बने कमर्शियल स्टॉल्स से कुछ खाता-पीता है—जैसे चाट, फुलकी, फास्ट फूड, चाय-कॉफी या कोई सॉफ्ट ड्रिंक लेता है—तो उस खाने-पीने की चीज का तय पैसा संचालक या स्टॉल मालिक द्वारा लिया जाएगा। इसके अतिरिक्त यदि पार्क के अंदर कोई विशेष एडवेंचर एक्टिविटी, बोटिंग या कोई राइड्स हैं, तो उसका अलग से शुल्क लिया जा सकता है। लेकिन कंपनी ने अंदर की सुविधाओं से कमाई करने के बजाय पार्क के मुख्य द्वार पर ही अवैध नाका लगा दिया, जो कि पूरी तरह गैर-कानूनी है।  

कंसेशनर की जिम्मेदारी: मेंटेनेंस और रिपेयर्स पर खर्च करने के बदले लूट
आरटीआई से प्राप्त एग्रीमेंट के पेज 54 की ही दूसरी महत्वपूर्ण कंडिका 15.2 (a) और (b) संचालक की जिम्मेदारियों को तय करती है। कंडिका 15.2 (a) के अनुसार:  

"The Concessionaire shall be responsible, at its own cost, for all the maintenance and repairs of the Ecotourism & Adventure Park and all its components, including roads, buildings, structures, all services and allied works..."

इस नियम का साफ अर्थ है कि पार्क के अंदर की सड़कें, इमारतें, पार्क का रख-रखाव और अन्य सभी आवश्यक कार्य संचालक कंपनी को अपने खुद के खर्च (at its own cost) पर करने थे। इसके बदले उन्हें केवल अंदर की कमर्शियल गतिविधियों से राजस्व (revenue) कमाना था। परंतु कंपनी ने नियमों के विपरीत जाकर, मेंटेनेंस पर अपना पैसा खर्च करने के बजाय उल्टा जनता से ही ₹100 प्रति व्यक्ति वसूल कर अपनी जेबें भरना शुरू कर दिया। यदि कंपनी नियमों का पालन नहीं करती है, तो कंडिका 15.2 (b) के तहत उन पर भारी पेनल्टी लगाने का भी प्रावधान है।  

 निवेदक की मांग: तत्काल एफआईआर और वन विभाग द्वारा राजसात की कार्रवाई
इस गंभीर भ्रष्टाचार और जनता के साथ हुई धोखाधड़ी के खिलाफ जागरूक नागरिकों और निवेदक द्वारा दिनांक 08.06.2026 को वन विभाग और जिला प्रशासन को एक औपचारिक शिकायत पत्र सौंपा गया है। निवेदक ने सरकारी दस्तावेजों के अकाट्य सबूतों के साथ मांग की है कि इको पार्क संचालक कंपनी के खिलाफ आम जनता के साथ जालसाजी (Section 420 IPC / relevant BNS) और सरकारी अनुबंध के उल्लंघन के आरोप में तत्काल एफआईआर (FIR) दर्ज की जाए।  

इसके साथ ही, शिकायत पत्र में यह मुख्य मांग उठाई गई है कि दिनांक 30.09.2023 से लेकर आज तक जितनी भी अवैध राशि (लगभग ₹8.35 करोड़) जनता से धोखे से वसूली गई है, उसे वन विभाग द्वारा तत्काल राजसात (Forfeit/Seize) किया जाए। यह जनता का गाढ़े पसीने का पैसा है, जिसे निजी कंपनी के पास छोड़ने के बजाय सरकारी नियंत्रण में लिया जाना अत्यंत आवश्यक है।  

प्रशासनिक जवाबदेही: रीवा प्रशासन और डीएफओ के सामने खड़ा बड़ा सवाल
यह पूरा गंभीर मामला अब वन मण्डलाधिकारी (DFO) वन मंडल-रीवा (M.P.) और पदेन क्षेत्रीय प्रबंधक, मध्य प्रदेश इकोटूरिज्म डेवलपमेंट बोर्ड के समक्ष है। आरटीआई के इन मुख्य पन्नों पर संबंधित अधिकारियों के बाकायदा हस्ताक्षर और 'सत्यापित' सील (Stamp) मौजूद हैं, जो यह साबित करते हैं कि विभाग को इन नियमों की पहले से पूरी जानकारी थी। ऐसे में रीवा के जागरूक नागरिकों के मन में यह बड़ा सवाल उठ रहा है कि आखिर इतने महीनों से चल रही इस खुली लूट पर प्रशासन ने अपनी आंखें क्यों बंद कर रखी थीं?  

रीवा के जिला कलेक्टर और वरिष्ठ अधिकारियों को इस मामले का तुरंत संज्ञान लेकर पार्क में फ्री एंट्री की व्यवस्था बहाल करानी चाहिए। 'दैनिक रीवा न्यूज मीडिया' और 'बघेली मीडिया' इस पूरे मामले पर अपनी पैनी नजर बनाए हुए हैं। जब तक आरोपी संचालक कंपनी पर कड़ी कार्रवाई नहीं होती और रीवा की जनता को उनका कनोनी अधिकार नहीं मिलता, तब तक इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया जाता रहेगा।  

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