रीवा: रसूख और कानून के दांवपेच में उलझा सिस्टम! भ्रष्टाचार के आरोपी APC की रमसा में 'धमाकेदार' वापसी, कमिश्नर की कार्रवाई धरी रह गई

 
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ऋतुराज द्विवेदी,रीवा/भोपाल। रीवा के स्कूल शिक्षा विभाग में एक बार फिर 'कानून की कमजोरी' और 'भ्रष्टाचार की मजबूती' का अजीबोगरीब नमूना देखने को मिला है। करोड़ों के अनुदान घोटाले और फर्जी नियुक्तियों के दाग झेल रहे इस विभाग में अब 'रंगाई-पुताई घोटाले' के मुख्य पात्रों में से एक, एपीसी सुधाकर तिवारी ने प्रशासन को ठेंगा दिखाते हुए अपनी कुर्सी वापस पा ली है। कमिश्नर रीवा संभाग द्वारा किए गए निलंबन आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती देकर उन्होंने न केवल विभाग में वापसी की है, बल्कि प्रशासनिक अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर भी सवालिया निशान लगा दिए हैं।

रंगाई-पुताई घोटाला: 50 लाख की राशि और 6 स्कूलों का 'कागजी' कायाकल्प
रीवा जिले के हाई और हायर सेकेंडरी स्कूलों के रखरखाव (अनुरक्षण मद) के लिए शासन ने 50 लाख रुपए की भारी-भरकम राशि आवंटित की थी। इस राशि का उद्देश्य स्कूलों की सूरत बदलना था, लेकिन जिम्मेदारों ने मिलकर अपनी किस्मत बदल ली।

  • बिना काम किए भुगतान: जांच में सामने आया कि शासकीय हायर सेकेंडरी स्कूल पैपखरा, दुआरी, गुढ़, खैरा, बर्रैया और कन्या खटखरी में बिना किसी वास्तविक कार्य के ठेकेदार सत्यव्रत तिवारी को ₹28,38,229 का भुगतान कर दिया गया।
  • अधिकारियों की मिलीभगत: इस बंदरबांट में तत्कालीन डीईओ, लेखा अधिकारी और रमसा (RAMSA) के प्रभारी अधिकारियों की भूमिका संदिग्ध पाई गई। जेडी (JD) की जांच रिपोर्ट में 7 लोगों को दोषी माना गया था।

हाईकोर्ट का दरवाजा और कमिश्नर के अधिकार क्षेत्र पर 'चोट'
जब घोटाले की परतें खुलीं, तो कमिश्नर रीवा संभाग बीएस जामोद ने सख्त रुख अपनाते हुए एपीसी सुधाकर तिवारी और गुढ़ प्राचार्य विनय मिश्रा को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया था। लेकिन सुधाकर तिवारी ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दे दी।

  • राहत का आधार: तिवारी ने कोर्ट में दलील दी कि वे अब 'उच्च माध्यमिक शिक्षक' के पद पर प्रमोट हो चुके हैं। नियमानुसार, उन्हें निलंबित करने का अधिकार 'आयुक्त लोक शिक्षण' (DP) के पास है, न कि संभागीय कमिश्नर के पास।
  • कोर्ट का फैसला: इसी तकनीकी आधार (Jurisdiction issue) को देखते हुए माननीय उच्च न्यायालय ने निलंबन आदेश पर रोक लगा दी। नतीजा यह हुआ कि सुधाकर तिवारी वापस रमसा में एपीसी के पद पर आ धमके।

'स्टे' के सहारे जमे 'दीमक': रीवा शिक्षा विभाग की पुरानी विडंबना
यह पहली बार नहीं है जब भ्रष्टाचार में फंसे कर्मचारी स्टे लेकर विभाग में डटे हुए हैं। रीवा डीईओ कार्यालय और शिक्षा विभाग जैसे दागियों की पनाहगाह बन चुका है।

अशोक शर्मा (अनुदान घोटाला): करोड़ों के घोटाले में नाम आया, एफआईआर हुई, लेकिन स्टे के सहारे न केवल जमे रहे बल्कि वहीं से रिटायर भी हुए।
अखिलेश तिवारी (लिपिक): अनुदान घोटाले में फंसे होने के बावजूद आज भी विभाग में पकड़ बनाए हुए हैं। हाल ही में कलेक्टर ने भी इन्हें फटकार लगाई थी।
अखिलेश मिश्रा (योजना अधिकारी): फर्जी अनुकंपा नियुक्ति जैसे गंभीर मामले में आरोपी होने के बाद भी कोर्ट से स्टे लेकर विभाग को 'सेवा' दे रहे हैं।

विभागीय जांच की 'कछुआ चाल' और भ्रष्टाचार को शह
हालांकि सुधाकर तिवारी को केवल निलंबन से राहत मिली है, इसका मतलब यह नहीं कि वे निर्दोष हैं। उनके खिलाफ आरोप पत्र (Charge Sheet) जारी किया जा चुका है और विभागीय जांच अभी भी प्रक्रियाधीन है। लेकिन सवाल यह उठता है कि जब तक जांच पूरी नहीं होती, ऐसे दागी अधिकारियों को महत्वपूर्ण पदों पर क्यों रखा जाता है? क्या यह शासन की भ्रष्टाचार के प्रति 'जीरो टॉलरेंस' नीति का मजाक नहीं है?

प्रशासन की बेबसी या मिलीभगत?
रीवा का शिक्षा विभाग अब भ्रष्टाचार के दीमकों से खोखला हो चुका है। जब कलेक्टर और कमिश्नर जैसे बड़े अधिकारियों के आदेश भी तकनीकी पेच में फंसकर बेअसर हो जाते हैं, तो आम जनता का सिस्टम से भरोसा उठना लाजमी है। सुधाकर तिवारी की वापसी ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि अगर आपके पास कानूनी दांवपेच की समझ और रसूख है, तो भ्रष्टाचार के आरोप भी आपकी कुर्सी नहीं हिला सकते।

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