रीवा में डामर नहीं, 'भ्रष्टाचार' बिछाया गया: EOW का सबसे बड़ा धमाका, 18 करोड़ के घोटाले में 44 रसूखदारों पर FIR, सूची में बड़े नाम

 
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रीवा और मऊगंज में फर्जी इनवाइस के जरिए करोड़ों का फर्जीवाड़ा, तत्कालीन महाप्रबंधक और संविदाकारों पर केस दर्ज। 

ऋतुराज द्विवेदी,रीवा/भोपाल। आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (EOW) रीवा ने मध्य प्रदेश ग्रामीण सड़क विकास प्राधिकरण (MPRRDA) के भीतर चल रहे एक विशाल भ्रष्टाचार नेटवर्क का भंडाफोड़ किया है। जांच में यह सनसनीखेज खुलासा हुआ है कि रीवा और मऊगंज जिलों में सड़क निर्माण के नाम पर 18 करोड़ 59 लाख रुपये से अधिक की राशि का गबन किया गया है। यह पूरा खेल वर्ष 2017 से 2021 के बीच खेला गया, जिसमें घटिया निर्माण सामग्री का उपयोग कर जनता की जान के साथ खिलवाड़ किया गया और सरकारी खजाने को चूना लगाया गया।

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घोटाले का मोडस ऑपरेंडी: फर्जी बिल और असली लूट (Scam Mechanism)

जांच के अनुसार, संविदाकारों (ठेकेदारों) ने विभागीय अधिकारियों के साथ मिलकर एक सुनियोजित साजिश रची। सड़कों के डामरीकरण के लिए असल में निम्न गुणवत्ता (Quality-less) के डामर का उपयोग किया गया, लेकिन भुगतान प्राप्त करने के लिए इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (IOCL) के नाम से फर्जी और कूटरचित (Forged) इनवाइस तैयार किए गए। इन फर्जी बिलों के जरिए यह दिखाया गया कि उच्च गुणवत्ता वाले बिटुमिन का उपयोग हुआ है, और इसी आधार पर करोड़ों का भुगतान डकार लिया गया।

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रीवा और मऊगंज: भ्रष्टाचार का वित्तीय लेखा-जोखा (Financial Stats)

EOW की जांच में दो मुख्य इकाइयों में भ्रष्टाचार की पुष्टि हुई है:

  • रीवा इकाई: यहाँ कुल 12,71,06,372 रुपये का फर्जी भुगतान किया गया। इस मामले में कुल 27 लोगों को आरोपी बनाया गया है।

  • मऊगंज इकाई: यहाँ 5,88,26,713 रुपये की राशि का गबन हुआ। इसमें 17 आरोपियों के खिलाफ अपराध पंजीबद्ध किया गया है।

कुल मिलाकर 44 आरोपियों पर शिकंजा कसा गया है, जिसमें तत्कालीन बड़े अधिकारी और नामचीन ठेकेदार शामिल हैं।

रीवा इकाई के मुख्य आरोपी: बड़े नामों पर गाज (Accused in Rewa)

ईओडब्ल्यू ने रीवा परियोजना क्रियान्वयन इकाई के तत्कालीन अधिकारियों को मुख्य साजिशकर्ता माना है। प्रमुख आरोपियों में शामिल हैं:

  1. राजीव कुमार दवे (तत्कालीन महाप्रबंधक)

  2. कैलाश कुमार सोनी, जुगल किशोर गुप्ता, रामकुमार तिवारी (तत्कालीन महाप्रबंधक)

  3. मोहम्मद शाहनवाज, नारायण त्रिपाठी, अमरेश कुमार पाण्डेय (सहायक प्रबंधक)

  4. दिनेश कुमार शुक्ला, मुनि माधव मिश्रा (सहायक प्रबंधक)

  5. दुर्गादास द्विवेदी, गीता कान्तोड़े, आशीष शर्मा (उपयंत्री)

इसके अलावा मेसर्स शान्ति कन्स्ट्रक्शन कम्पनी, के.के. सोहगौरा और अन्य संविदाकारों पर भी एफआईआर दर्ज की गई है।

मऊगंज इकाई: यहाँ भी हुआ करोड़ों का वारा-न्यारा (Accused in Mauganj)

मऊगंज में भी भ्रष्टाचार की जड़ें गहरी मिली हैं। यहाँ के प्रमुख आरोपियों में:

  • रामकुमार तिवारी और जुगल किशोर गुप्ता (तत्कालीन महाप्रबंधक)

  • ए.के. सिंह और सुजीत कुमार निगम (सहायक प्रबंधक)

  • भास्कर शर्मा, दिनेश प्रसाद तिवारी, अमित कुमार गुप्ता (उपयंत्री)

  • संविदाकार: रामसज्जन शुक्ला, के.के. सोहगौरा और मेसर्स वानको कन्स्ट्रक्शन कम्पनी के प्रतिनिधि।

धाराओं का जाल: भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत केस (Legal Action)

प्रकोष्ठ मुख्यालय भोपाल से प्राप्त दस्तावेजों के सत्यापन के बाद, ईओडब्ल्यू ने आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की कडी धाराओं में केस दर्ज किया है:

  • धारा 420: धोखाधड़ी (Cheating)

  • धारा 467, 468, 471: दस्तावेजों की कूटरचना और फर्जी बिलों का उपयोग।

  • धारा 7-सी (भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988/2018): लोक सेवक द्वारा पद का दुरुपयोग।

सुशासन की दिशा में कड़ा संदेश (Conclusion)

यह घोटाला केवल वित्तीय गबन नहीं है, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों की बुनियादी सुविधाओं के साथ किया गया विश्वासघात है। घटिया डामर से बनी सड़कें कुछ ही महीनों में उखड़ जाती हैं, जिससे जनता को परेशानी होती है। ईओडब्ल्यू की इस कार्रवाई ने यह साफ कर दिया है कि भ्रष्टाचार चाहे कितना भी पुराना हो, कानून के हाथ उन तक जरूर पहुंचेंगे। फिलहाल, मामले की विस्तृत विवेचना जारी है और आने वाले दिनों में कुछ और गिरफ्तारियां संभव हैं।

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