रीवा: विकास की बलि चढ़ते गरीबों के आशियाने, दिलीप बिल्डकॉन की ब्लास्टिंग से मचा हड़कंप

 
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ऋतुराज द्विवेदी,रीवा/भोपाल। रीवा जिले के गुढ़ क्षेत्र से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है जो विकास के दावों की पोल खोल रही है। यहाँ 'जल जीवन मिशन' के तहत काम कर रही नामी कंपनी दिलीप बिल्डकॉन (Dilip Buildcon) की लापरवाही ने दर्जनों गरीब परिवारों का जीवन संकट में डाल दिया है। इटार पहाड़ पर की जा रही अनियंत्रित और भारी ब्लास्टिंग (Heavy Blasting) के कारण आसपास के गांवों में बने ग्रामीणों के पक्के और कच्चे मकान खंडहर में तब्दील होने लगे हैं।

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इटार पहाड़ पर हैवी ब्लास्टिंग: विकास या विनाश?
सरकार की 'नल जल योजना' का उद्देश्य हर घर तक पानी पहुँचाना है, लेकिन गुढ़ के इटार पहाड़ पर यह योजना ग्रामीणों के लिए मुसीबत बन गई है। दिलीप बिल्डकॉन कंपनी पहाड़ों को तोड़ने के लिए जिस तीव्रता की ब्लास्टिंग कर रही है, उसका कंपन मीलों दूर तक महसूस किया जा रहा है। ब्लास्टिंग के दौरान बड़े-बड़े पत्थर ग्रामीणों के घरों पर गिर रहे हैं। कई मकानों की दीवारें बीच से फट गई हैं, जिससे कभी भी बड़ी दुर्घटना होने की संभावना बनी हुई है।

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4 महीने से मुआवजे का इंतजार: क्या कर रहा है प्रशासन?
पीड़ित ग्रामीणों का आरोप है कि नुकसान होने के बाद कंपनी के अधिकारियों ने सर्वे किया था और जल्द मुआवजा देने का भरोसा दिलाया था। लेकिन अब 4 महीने बीत जाने के बाद भी एक भी परिवार को फूटी कौड़ी नहीं मिली है। "क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है?" यह सवाल अब हर ग्रामीण की जुबान पर है। जब गरीब अपनी शिकायत लेकर अधिकारियों के पास जाते हैं, तो उन्हें केवल आश्वासन का 'झुनझुना' थमाया जाता है।

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बारिश और फटी दीवारें: डर के साये में जीने को मजबूर परिवार
मध्य प्रदेश में मानसून की दस्तक के साथ ही इन ग्रामीणों की मुसीबतें दोगुनी हो गई हैं। ब्लास्टिंग से जिन घरों की छतें और दीवारें फट गई हैं, उनमें अब बारिश का पानी रिस रहा है। जर्जर हो चुकी दीवारों के ढहने का डर इतना ज्यादा है कि लोग रात-रात भर जागकर पहरा देने को मजबूर हैं। छोटे बच्चों और बुजुर्गों के साथ इन खंडहर होते घरों में रहना किसी मौत के कुएं में रहने जैसा है।

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फोन तक नहीं उठाते जिम्मेदार अधिकारी
पत्रकारिता के नैतिक मूल्यों के आधार पर जब इस मामले की तहकीकात की गई, तो चौंकाने वाली बात सामने आई। ग्रामीणों का कहना है कि अब कंपनी के जिम्मेदार अधिकारी उनका फोन तक रिसीव नहीं करते। शुरूआती दिनों में मीठी बातें करने वाले अधिकारी अब ग्रामीणों को पहचानने से भी इंकार कर रहे हैं। यह सीधे तौर पर एक बड़ी कंपनी की तानाशाही और गरीबों के अधिकारों का हनन है।

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जवाबदेही किसकी?
विकास कार्यों के नाम पर गरीबों के सिर से छत छीन लेना कहाँ का न्याय है? दिलीप बिल्डकॉन जैसी बड़ी कंपनी को क्या सुरक्षा मानकों का ध्यान नहीं रखना चाहिए था? रीवा जिला प्रशासन और क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों को इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप करना चाहिए। यदि समय रहते इन परिवारों को मुआवजा और सुरक्षा नहीं दी गई, तो यह 'विकास' किसी बड़े 'विनाश' का कारण बन सकता है।

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