रीवा SGMH में महाघोटाला: बाजार से दोगुने दाम पर खरीदी दवाई और इलेक्ट्रॉनिक मशीनें, करोड़ों का बजट डकार गया अफसरों का सिंडिकेट
ऋतुराज द्विवेदी, रीवा/भोपाल। मध्य प्रदेश के विंध्य क्षेत्र का सबसे बड़ा चिकित्सा केंद्र, संजय गांधी स्मृति चिकित्सालय (SGMH) एक बार फिर विवादों के घेरे में है। इस बार मामला किसी प्रशासनिक लापरवाही का नहीं, बल्कि सीधे तौर पर सरकारी खजाने में करोड़ों रुपये की सेंधमारी का है। रीवा के इस प्रमुख अस्पताल में दवाइयों की सप्लाई से लेकर इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों और रोजमर्रा की सामग्रियों की खरीदी में एक बहुत बड़े वित्तीय महाघोटाले का भंडाफोड़ हुआ है। शुरुआती इनसाइड रिपोर्ट्स के मुताबिक, अस्पताल प्रबंधन और ठेकेदारों के एक रसूखदार सिंडिकेट ने मिलकर सरकार द्वारा जनता के इलाज के लिए भेजे गए करोड़ों रुपये के बजट को अपनी जेबों में भर लिया है। इस खुलासे के बाद से ही रीवा के प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मच गया है।
बाजार से दोगुने दामों पर खरीदी: कैसे हुआ सरकारी खजाने का बंदरबांट?
इस पूरे घोटाले का सबसे चौंकाने वाला और गंभीर पहलू यह है कि अस्पताल के भीतर जो भी सामग्रियां खरीदी गईं, उनकी कीमतें खुले बाजार (Open Market) की दरों से दोगुनी या उससे भी ज्यादा दिखाई गईं। उदाहरण के तौर पर, जो इलेक्ट्रॉनिक उपकरण या लाइफ-सेविंग ड्रग्स (जीवन रक्षक दवाइयाँ) आम बाजार में बेहद किफायती दामों पर उपलब्ध हैं, उन्हें अस्पताल के बिलों में आसमान छूती कीमतों पर दर्ज किया गया।
यह कोई मानवीय भूल या तकनीकी गलती नहीं है, बल्कि एक सोची-समझी साजिश है। नियमों के मुताबिक, किसी भी सरकारी खरीदी के लिए पारदर्शी टेंडर प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए और न्यूनतम दर (L-1) पर ही सामान लिया जाना चाहिए। लेकिन संजय गांधी अस्पताल में चहेते वेंडरों और फर्मों को फायदा पहुंचाने के लिए कोटेशन और टेंडरों के साथ खुलेआम छेड़छाड़ की गई, ताकि ऊंची कीमतों पर बिल पास कराकर मोटी 'कमीशनखोरी' की जा सके।
दवाई से लेकर इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों तक: कहाँ-कहाँ हुआ बड़ा खेल?
संजय गांधी अस्पताल के भीतर भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहराई तक फैली हैं, इसे इस बात से समझा जा सकता है कि किसी एक विभाग में नहीं, बल्कि चौतरफा लूट मचाई गई है। मुख्य रूप से दो विभागों में सबसे बड़ा खेल देखने को मिला है:
ए) दवाइयों की खरीदी में बड़ा फर्जीवाड़ा (The Medicine Scam)
अस्पताल के स्टोर में आने वाली कई आवश्यक दवाइयों, सर्जिकल आइटम्स, ग्लव्स, और पट्टियों की खरीदी में भारी अनियमितता बरती गई है। जो दवाइयाँ गरीब मरीजों को मुफ्त मिलनी चाहिए थीं, उनके नाम पर कागजों में बड़ी-बड़ी एंट्रियां की गईं। बाजार में मिलने वाली जेनेरिक और ब्रांडेड दवाओं के रेट्स और अस्पताल द्वारा चुकाए गए रेट्स में जमीन-आसमान का अंतर पाया गया है। सूत्रों का कहना है कि कई ऐसी दवाइयों के भी भुगतान कर दिए गए, जो कभी अस्पताल के वार्डों तक पहुंची ही नहीं।
बी) इलेक्ट्रॉनिक और मेंटेनेंस सामग्री में लूट (Electronic Materials Fraud)
अस्पताल के वार्डों, आईसीयू और प्रशासनिक कमरों के लिए खरीदे गए इलेक्ट्रॉनिक सामान जैसे—एसी (AC), वाटर कूलर, पंखे, सीसीटीवी कैमरे, कंप्यूटर पार्ट्स और मेडिकल मशीनरी के स्पेयर पार्ट्स में अंधेरगर्दी मचाई गई है।
- बाजार भाव बनाम सरकारी बिल: जो कमर्शियल इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बाजार में ₹20,000 में उपलब्ध हैं, उनके बिल ₹40,000 से लेकर ₹50,000 तक के बनाए गए।
- घटिया क्वालिटी का सामान: ऊंची कीमतें चुकाने के बावजूद जो इलेक्ट्रॉनिक सामान अस्पताल में लगाया गया, वह बेहद घटिया और लोकल क्वालिटी का है, जो कुछ ही हफ्तों में खराब हो जाता है ताकि दोबारा 'रिपेयरिंग और मेंटेनेंस' के नाम पर नया बिल फाड़ा जा सके।
सिंडिकेट का पर्दाफाश: कौन है इस पूरे भ्रष्टाचार के पीछे?
बिना किसी उच्च प्रशासनिक संरक्षण के इतना बड़ा वित्तीय घोटाला सालों-साल नहीं चल सकता। अस्पताल के भीतर सक्रिय इस सिंडिकेट में कुछ बड़े प्रशासनिक अधिकारी, परचेज कमेटी (क्रय समिति) के सदस्य, स्टोर कीपर और रीवा व बाहर के कुछ चुनिंदा सप्लायर्स शामिल हैं।
जांच की आंच अब श्याम शाह मेडिकल कॉलेज के शीर्ष अधिकारियों तक भी पहुंच रही है। यह आरोप लग रहे हैं कि परचेज ऑर्डर जारी करते समय जानबूझकर बाजार दरों की समीक्षा (Market Rate Verification) नहीं की गई। जब भी किसी ईमानदार कर्मचारी ने इस विसंगति पर आवाज उठाने की कोशिश की, तो उसे डरा-धमका कर या ट्रांसफर की धमकी देकर शांत करा दिया गया। यह पूरा नेटवर्क 'ऑफ द रिकॉर्ड' कमाई का एक बड़ा जरिया बन चुका है, जिसने अस्पताल को सेवा भाव के केंद्र से बदलकर 'कमीशनखोरी का अड्डा' बना दिया है।
जमीनी हकीकत: जनता के टैक्स के पैसे पर अफसरों की ऐश
रीवा और आसपास के जिलों (जैसे सीधी, सतना, सिंगरौली) से आने वाले अत्यंत गरीब और लाचार मरीज इस उम्मीद में संजय गांधी अस्पताल आते हैं कि उन्हें मुफ्त या कम दाम पर इलाज मिलेगा। लेकिन यहाँ की हकीकत यह है कि बजट का एक बड़ा हिस्सा तो अफसरों और ठेकेदारों की मिलीभगत से कागजों पर ही साफ हो जाता है।
नतीजतन, जब गरीब मरीज अस्पताल पहुंचता है, तो उसे स्ट्रेचर से लेकर बुनियादी दवाइयाँ और सिरिंज तक बाहर की दुकानों से महंगे दामों पर खरीदनी पड़ती हैं। जनता के टैक्स के पैसे से खरीदे गए महंगे इलेक्ट्रॉनिक उपकरण या तो डॉक्टरों के निजी केबिनों की शोभा बढ़ा रहे हैं या फिर खराब होकर कबाड़ में तब्दील हो रहे हैं, जबकि जनरल वार्डों में मरीज गर्मी और अव्यवस्था के बीच तड़पने को मजबूर हैं।
क्या दोषियों पर होगी एफआईआर या ठंडे बस्ते में जाएगी फाइल?
करोड़ों रुपये के इस दवा और इलेक्ट्रॉनिक सामग्री खरीदी घोटाले ने रीवा के प्रशासनिक इकबाल पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा कर दिया है। अब देखना यह है कि मध्य प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री, रीवा कमिश्नर और जिला कलेक्टर इस मामले को कितनी गंभीरता से लेते हैं। क्या इस महाघोटाले की निष्पक्ष उच्च स्तरीय जांच (जैसे लोकायुक्त या ईओडब्ल्यू) कराई जाएगी? क्या दोषी अधिकारियों और फर्जी बिल लगाने वाले ठेकेदारों को जेल भेजा जाएगा और उनसे रिकवरी की जाएगी? या फिर हमेशा की तरह एक दिखावटी जांच कमेटी बनाकर पूरे मामले को रफा-दफा कर दिया जाएगा? रीवा की जागरूक जनता अब इस भ्रष्ट सिंडिकेट के खिलाफ सीधी और कड़ी दंडात्मक कार्रवाई की मांग कर रही है।