रीवा में आदिवासी की जमीन बचाने पहुंचे वकील नीरज वर्मा के साथ पुलिसकर्मियों ने की मारपीट, कपड़े फाड़े और थाने में घसीटा, प्रशासन पर उठे गंभीर सवाल

 
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मध्य प्रदेश के रीवा जिले से एक ऐसा वीडियो सामने आया है, जिसे देखकर किसी का भी रोंगटे खड़े हो जाएं। एक वकील को पुलिसकर्मियों ने बीच सड़क पर न केवल पीटा, बल्कि उनकी कॉलर पकड़कर घसीटा और उनके कपड़े भी फाड़ दिए। यह घटना लोकतंत्र में कानून की रक्षा करने वाली पुलिस पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

क्या है पूरा मामला? आदिवासी जमीन और प्रशासन की कार्रवाई
मामला आदिवासी परिवार की जमीन से जुड़ा है। श्यामलाल कोल, बृजलाल कोल और अर्जुन कोल के नाम 1980 से आदिवासी पट्टे की जमीन है। आरोप है कि प्रशासन ने बिना उचित नोटिस और कानूनी प्रक्रिया के इस मकान को गिराने की कार्रवाई शुरू कर दी। अधिवक्ता नीरज वर्मा इस कार्रवाई को रोकने और दस्तावेज दिखाने के लिए मौके पर पहुंचे थे।

पुलिसकर्मी वकील को भीड़ के बीच से खींचते ले जा रहे।

पुलिसकर्मी वकील को भीड़ के बीच से खींचते ले जा रहे।

वकील नीरज वर्मा ने लगाए गंभीर आरोप: 'हत्या कर सकते थे'
अधिवक्ता नीरज वर्मा का आरोप है कि पुलिस और प्रशासन भू-माफिया से मिले हुए हैं। उन्होंने कहा, "मैं केवल कानूनी दस्तावेज दिखा रहा था, लेकिन मेरे साथ आतंकवादियों जैसा व्यवहार किया गया। पुलिस ने मेरे कपड़े फाड़े और मेरी कोर्ट की यूनिफॉर्म तक नहीं बख्शी। मुझे घसीटते हुए थाने ले जाया गया और 6 घंटे तक बिठाकर रखा गया। मुझे लगा कि वे मेरी हत्या कर देंगे।"

वकील को धक्का-मुक्की करते और घसीटते ले जा रहे।

वकील को धक्का-मुक्की करते और घसीटते ले जा रहे।

पुलिस और प्रशासन का पक्ष: शासकीय कार्य में बाधा का दावा
समान थाना प्रभारी विजय सिंह ने आरोपों को सिरे से खारिज किया है। उनका तर्क है कि पुलिस टीम कोर्ट के आदेश के तहत काम कर रही थी और अधिवक्ता बार-बार शासकीय कार्य में बाधा उत्पन्न कर रहे थे। उन्होंने कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए वकील को हटाना आवश्यक था।

तहसीलदार और थाना प्रभारी के पास नहीं था कोर्ट का आदेश
जब मीडिया ने इस कार्रवाई की वैधता पर सवाल उठाए, तो तहसीलदार अनुपम पांडेय और थाना प्रभारी कोर्ट के आदेश की कोई भी प्रति नहीं दिखा सके। एसडीएम अनुराग तिवारी ने माना कि मामले में अनियमितता हो सकती है और उन्होंने नए सिरे से जांच का आश्वासन दिया है। यह एक बड़ा विरोधाभास है कि जिस कार्रवाई को 'कानूनी' बताया जा रहा था, उसका कोई ठोस आधार ही नहीं था।

पुलिसकर्मियों ने वकील के कपड़े फाड़े। कॉलर पकड़कर घसीटते थाने ले गए।

पुलिसकर्मियों ने वकील के कपड़े फाड़े। कॉलर पकड़कर घसीटते थाने ले गए।

कानून की रक्षा या गुंडागर्दी?
यह घटना केवल एक वकील की पिटाई का मामला नहीं है, बल्कि यह आदिवासी अधिकारों और कानूनी प्रक्रिया की हत्या जैसा है। जब रक्षक ही भक्षक बन जाए, तो आम जनता को न्याय की उम्मीद किससे होगी? प्रशासन को चाहिए कि वह न केवल इस घटना की निष्पक्ष जांच करे, बल्कि दोषियों पर सख्त से सख्त कार्रवाई सुनिश्चित करे ताकि भविष्य में ऐसी बर्बरता न दोहराई जाए।

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