रीवा नगर निगम का बड़ा घोटाला: कबाड़ बने यूरिन बॉक्स, कागजों पर चमका स्वच्छता सर्वेक्षण
ऋतुराज द्विवेदी,रीवा/भोपाल। मध्य प्रदेश के रीवा जिले से सरकारी धन के दुरुपयोग और प्रशासनिक लापरवाही का एक ऐसा हैरान करने वाला मामला सामने आया है, जिसने स्वच्छ भारत अभियान के जमीनी सच को उजागर कर दिया है। शहर को सुंदर और स्वच्छ बनाने का दम भरने वाले रीवा नगर निगम ने स्वच्छता सर्वेक्षण में सिर्फ रैंकिंग बटोरने के लिए लाखों रुपये पानी की तरह बहा दिए, लेकिन आज वह पूरी व्यवस्था शहर के चौराहों से गायब होकर सरकारी गोदामों में कबाड़ बन चुकी है। आम जनता के टैक्स की कमाई से खरीदे गए फैंसी प्लास्टिक यूरिन बॉक्स अब रीवा की बदहाल प्रशासनिक व्यवस्था की गवाही दे रहे हैं।

स्वच्छता सर्वेक्षण के नाम पर जनता के पैसों की बर्बादी कैसे हुई?
कुछ वर्ष पहले जब देश भर में स्वच्छता सर्वेक्षण को लेकर होड़ मची थी, तब रीवा नगर निगम के तत्कालीन अधिकारियों ने शहर को ओडीएफ (Open Defecation Free) और साफ-सुथरा दिखाने के लिए आनन-फानन में एक योजना तैयार की थी। शहर के सबसे व्यस्ततम व्यावसायिक क्षेत्रों, प्रमुख चौराहों और सार्वजनिक स्थानों पर अस्थायी रूप से फाइबर और प्लास्टिक से बने आधुनिक यूरिन बॉक्स स्थापित किए गए थे। इस कवायद का मुख्य उद्देश्य यह था कि बाजार आने वाले राहगीर और स्थानीय नागरिक खुले में पेशाब न करें, जिससे गंदगी और संक्रामक बीमारियों का खतरा कम हो सके।
शुरुआती कुछ हफ्तों तक तो इन चमचमाते यूरिन बॉक्सों का उपयोग जनता द्वारा किया गया और नगर निगम ने भी इसकी खूब पीठ थपथपाई। लेकिन जैसे ही सर्वेक्षण की टीमें रीवा से विदा हुईं, वैसे ही नगर निगम प्रशासन ने इन बॉक्सों की सुध लेना पूरी तरह बंद कर दिया। इन अस्थायी यूरिन बॉक्सों को लगाने से पहले अधिकारियों ने इस बात का कतई ध्यान नहीं रखा कि इनके संचालन के लिए नियमित पानी की आपूर्ति और सफाईकर्मियों की आवश्यकता होगी। नतीजा यह हुआ कि कुछ ही महीनों में ये बॉक्स गंदगी और भयंकर बदबू का केंद्र बन गए, जिसके कारण लोगों ने इनके पास फटकना भी छोड़ दिया।
सरकारी गोदामों में तब्दील हुई लाखों की सरकारी संपत्ति और कचरा प्रबंधन फेल
आज यदि आप रीवा नगर निगम के मुख्य गोदाम के पिछले हिस्से का मुआयना करेंगे, तो आपको विकास के नाम पर हुए विनाश की असली तस्वीर दिखाई देगी। शहर की सड़कों पर जनता की सहूलियत के लिए लगाए गए लाखों रुपये के यूरिन बॉक्स आज कबाड़ के ढेर के नीचे दबे पड़े हैं। देखरेख के अभाव में जो बॉक्स टूट गए या क्षतिग्रस्त हो गए, उन्हें सड़कों से हटाकर गोदाम में फेंक दिया गया, लेकिन उनकी मरम्मत कराने की जहमत किसी भी जिम्मेदार अधिकारी ने नहीं उठाई।
लापरवाही की यह कहानी केवल यूरिन बॉक्स तक सीमित नहीं है। स्वच्छ भारत मिशन के तहत रीवा शहर के अलग-अलग वार्डों और मुख्य मार्गों पर गीले और सूखे कचरे के निपटान के लिए लगाए गए महंगे डस्टबिन भी अब इतिहास बन चुके हैं। कहीं डस्टबिन के लोहे के स्टैंड गायब हैं, तो कहीं प्लास्टिक के डिब्बों के ढक्कन टूटकर सड़कों पर बिखर चुके हैं। रख-रखाव की इस घोर कमी के चलते शहर का कचरा प्रबंधन पूरी तरह चरमरा गया है और रीवा की जनता एक बार फिर खुले में कचरा फेंकने और सार्वजनिक स्थानों को गंदा करने पर मजबूर है।
स्थायी समाधान बनाम अस्थायी तमाशा: प्रशासनिक विफलता पर जनता के सवाल
रीवा के प्रबुद्ध नागरिकों और सामाजिक संगठनों द्वारा पिछले कई वर्षों से यह मांग लगातार उठाई जा रही थी कि शहर के प्रमुख बाजारों जैसे कि सिरमौर चौराहा, जयस्तंभ चौक, और अस्पताल परिसर के पास स्थायी और पक्के सार्वजनिक शौचालयों का निर्माण किया जाए। महिलाओं और राहगीरों के लिए शहर में एक भी सुव्यवस्थित सार्वजनिक प्रसाधन केंद्र नहीं है। लेकिन नगर निगम के योजनाकारों ने एक दीर्घकालिक और स्थायी ढांचा तैयार करने के बजाय, ठेकेदारों को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से अस्थायी प्लास्टिक यूरिन बॉक्स लगाने का शार्टकट रास्ता चुना।
यह एक ऐसी प्रशासनिक विफलता है जिसका खामियाजा आज रीवा की पूरी आबादी भुगत रही है। फाइबर के ये बॉक्स धूप, बारिश और हवा के थपेड़े नहीं झेल पाए और कुछ ही सालों में गलकर नष्ट हो गए। सबसे बड़ी लापरवाही यह है कि जब ये बॉक्स अनुपयोगी हो गए या इन्हें हटा दिया गया, तो नगर निगम ने उन संवेदनशील स्थानों पर कोई भी वैकल्पिक या नई व्यवस्था नहीं बनाई। आज हालत यह है कि शहर के व्यस्ततम बाजारों में आने वाले ग्रामीणों और महिलाओं को भारी मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ता है।
आंकड़ों का खेल: 65 यूरिन बॉक्स पर खर्च हुए थे लाखों रुपए, ऑडिट की मांग
अगर इस पूरे प्रोजेक्ट के वित्तीय आंकड़ों पर नजर डाली जाए, तो यह साफ हो जाता है कि स्वच्छता के नाम पर रीवा में कितना बड़ा खेल हुआ है। सरकारी दस्तावेजों के अनुसार, स्वच्छता सर्वेक्षण के दौरान रीवा नगर निगम क्षेत्र के भीतर लगभग 65 अलग-अलग पॉइंट पर ये यूरिन बॉक्स लगाए गए थे। सूत्रों का दावा है कि प्रत्येक सिंगल यूरिन बॉक्स की खरीदी और स्थापना पर नगर निगम ने 80 हजार रुपये से अधिक की राशि खर्च की थी। इस प्रकार, पूरे शहर में इस अस्थायी व्यवस्था पर कुल मिलाकर लाखों रुपये फूंक दिए गए।
जनता के मन में अब यह सवाल उठ रहा है कि जो सरकारी संपत्ति मात्र तीन साल भी सुरक्षित नहीं रह सकी और बिना किसी उपयोग के गायब हो गई, उसकी वित्तीय जवाबदेही किसकी है? क्या इस खरीदी में किसी प्रकार का कमीशन का खेल शामिल था? रीवा के स्थानीय निवासियों ने अब इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय तकनीकी जांच और कैग (CAG) से वित्तीय ऑडिट कराने की मांग शुरू कर दी है ताकि यह स्पष्ट हो सके कि जनता के टैक्स का पैसा किसकी जेब में गया।
महापौर अजय मिश्रा ने खोली रीवा नगर निगम की पोल: व्यवस्था में सुधार की जरूरत
इस पूरे मामले के सामने आने के बाद रीवा नगर निगम के महापौर अजय मिश्रा ने भी प्रशासनिक अमले की कार्यप्रणाली पर तीखे सवाल खड़े किए हैं। महापौर ने स्पष्ट शब्दों में स्वीकार किया है कि नगर निगम प्रशासन की घोर लापरवाही और समय पर मेंटेनेंस (रखरखाव) न होने के कारण यह पूरी महत्वाकांक्षी व्यवस्था मलबे में तब्दील हो गई। उन्होंने कहा कि केवल यूरिन बॉक्स ही नहीं, बल्कि शहर में बनाए गए आधुनिक बस स्टॉप, कचरा कलेक्शन बॉक्स और स्ट्रीट लाइट्स जैसी कई जनसुविधाएं आज अफसरों की उदासीनता के कारण दम तोड़ रही हैं।
महापौर अजय मिश्रा ने जोर देकर कहा कि जब तक सरकारी संपत्तियों के संरक्षण और उनके दैनिक रखरखाव के लिए एक कड़ा नियम और जवाबदेही तय नहीं की जाएगी, तब तक शहर का विकास संभव नहीं है। उन्होंने आश्वासन दिया है कि वे आगामी परिषद की बैठक में इस मुद्दे को उठाएंगे और दोषियों पर कार्रवाई के साथ-साथ शहर में पक्के और आधुनिक सामुदायिक शौचालयों के निर्माण के लिए नया रोडमैप तैयार करेंगे।