खुलासा: कैसे एक 'दागी' DEO बिना सजा पाए हुआ रिटायर? जानिए रीवा कलेक्टर और कमिश्नर के बीच फंसी उस फाइल का सच!

 
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रीवा में दोहरी अनुकंपा नियुक्ति के मामले में कलेक्टर ने DEO जीपी उपाध्याय के निलंबन का प्रस्ताव भेजा, लेकिन कार्रवाई की फाइल दबी रह गई। 

ऋतुराज द्विवेदी,रीवा/भोपाल। मध्य प्रदेश के रीवा जिले में शिक्षा विभाग के भीतर हुआ अनुकंपा नियुक्ति फर्जीवाड़ा राज्य के सबसे चर्चित घोटालों में से एक बन चुका है। इस मामले में परत-दर-परत खुलते भ्रष्टाचार ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। ताजा मामला तत्कालीन डीईओ गंगा प्रसाद (जीपी) उपाध्याय से जुड़ा है, जिन्हें बचाने के लिए कथित तौर पर 'फाइल को दबाने' का खेल खेला गया।

दोहरी नियुक्ति और लाखों का वेतन: फर्जीवाड़े की पूरी कहानी 
जांच रिपोर्ट के अनुसार, जीपी उपाध्याय के कार्यकाल के दौरान नियमों को ताक पर रखकर दोहरी अनुकंपा नियुक्ति दी गई। नियम यह कहता है कि यदि परिवार का एक सदस्य पहले से सरकारी सेवा में है, तो दूसरे को अनुकंपा नियुक्ति नहीं मिल सकती।

मामला: स्वर्गीय रामसखा कोल के परिवार में उनका बेटा पहले से ही नौकरी में था।
फर्जीवाड़ा: इसके बावजूद उनकी बेटी श्रीमती साधना कोल को शासकीय हाई स्कूल कन्या गंगेव में नियुक्ति दे दी गई।
आर्थिक क्षति: इस फर्जी नियुक्ति के माध्यम से साधना कोल ने शासन के खजाने से 2,40,523 रुपये का वेतन भी आहरित कर लिया। हैरानी की बात यह है कि मामला उजागर होने के बाद भी वह सेवा में बनी रहीं।

कलेक्टर की सख्ती और कमिश्नर की 'खामोशी' 
इस पूरे मामले की गहराई से जांच के लिए तीन सदस्यीय टीम गठित की गई थी। जांच प्रतिवेदन में स्पष्ट रूप से तत्कालीन डीईओ जीपी उपाध्याय को दोषी पाया गया।

23 जनवरी 2026 को रीवा कलेक्टर ने एक कड़ा रुख अपनाते हुए कमिश्नर को पत्र लिखा। इस पत्र में कलेक्टर ने स्पष्ट रूप से अनुशंसा की थी कि:
दोषी डीईओ जीपी उपाध्याय को तत्काल निलंबित किया जाए।
उनके विरुद्ध विभागीय जांच (Departmental Enquiry) शुरू की जाए।

लेकिन, यहाँ से शुरू हुआ फाइलों को घुमाने का खेल। आरोप है कि कमिश्नर कार्यालय ने इस महत्वपूर्ण पत्र पर कोई त्वरित एक्शन नहीं लिया।

रिटायरमेंट का 'कवच': तीन महीने तक दबी रही फाइल 
प्रशासनिक गलियारों में चर्चा है कि जीपी उपाध्याय को सुरक्षित सेवानिवृत्ति दिलाने के लिए कार्रवाई को जानबूझकर टाला गया। जब कलेक्टर ने निलंबन का प्रस्ताव भेजा, तब उपाध्याय की रिटायरमेंट में केवल तीन महीने शेष थे।

देरी का फायदा: कमिश्नर कार्यालय ने उन तीन महत्वपूर्ण महीनों में फाइल को आगे नहीं बढ़ाया।
अंतिम समय का ड्रामा: जब रिटायरमेंट का समय बिल्कुल करीब आ गया (मार्च के महीने में), तब केवल औपचारिकता निभाने के लिए आयुक्त लोक शिक्षण भोपाल को पत्र लिखा गया।

पेंशन नियमों का पेंच और भोपाल की भूमिका 
वर्तमान डीईओ रामराज मिश्रा ने भी इस मामले में सक्रियता दिखाते हुए भोपाल मुख्यालय को पत्र लिखकर आगाह किया था कि दोषी अधिकारी रिटायर होने वाला है। उन्होंने स्पष्ट किया था कि यदि रिटायरमेंट से पहले कार्रवाई नहीं हुई, तो बाद में केवल पेंशन नियमों के तहत ही जांच हो पाएगी, जो एक लंबी और जटिल प्रक्रिया है। हालांकि, भोपाल स्तर से भी इस पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई और दोषी अधिकारी सम्मानपूर्वक रिटायर हो गया।

घोटाले के अन्य किरदार: सुदामा लाल गुप्ता और 6 लोगों पर FIR 
यह घोटाला केवल एक अधिकारी तक सीमित नहीं है। रीवा के इस नियुक्ति कांड में अब तक कई बड़े नाम सामने आ चुके हैं:

सुदामा लाल गुप्ता (तत्कालीन डीईओ): इन्हें पहले ही निलंबित किया जा चुका था, हालांकि बाद में इन्हें बहाल कर मार्तण्ड स्कूल में पदस्थ कर दिया गया।
अखिलेश मिश्रा (नोडल अधिकारी): इन्हें भी निलंबित किया गया था, जो वर्तमान में हाईकोर्ट के स्टे पर कार्यरत हैं।
अन्वेषक रमाप्रसन्न: इनके खिलाफ पुलिस थाने में एफआईआर दर्ज कराई गई है।
कुल मिलाकर, विभाग के भीतर एक पूरा सिंडिकेट काम कर रहा था जिसने अपात्र लोगों को सरकारी नौकरियों की रेवड़ियां बांटीं।

जवाबदेही की बलि चढ़ती व्यवस्था 
रीवा का यह मामला स्पष्ट करता है कि कैसे रसूखदार अधिकारी जांच की आंच से बचने के लिए प्रशासनिक खामियों का फायदा उठाते हैं। जब जिले का सर्वोच्च अधिकारी (कलेक्टर) प्रमाणों के साथ निलंबन की मांग कर रहा हो, तब उच्च पदों पर बैठे अधिकारियों की चुप्पी भ्रष्टाचार को मौन सहमति देने के समान है।

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