सावधान रीवा! स्वस्थ हो तो भी टाइफाइड के नाम पर लूट रहे हैं अस्पताल; स्टिंग में खुला बिना डॉक्टर चल रही पैथोलॉजी का बड़ा खेल! CMHO और मंत्री के करीबियों पर उठे सवाल

 
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अदिति मिश्रा। मध्य प्रदेश के रीवा जिले से स्वास्थ्य व्यवस्था को शर्मसार कर देने वाला मामला सामने आया है। दैनिक भास्कर के 10 दिनों तक चले एक गुप्त स्टिंग ऑपरेशन में यह उजागर हुआ है कि कैसे मरीजों की जान और जेब के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। मामूली बीमारी की शिकायत लेकर पहुंचे व्यक्ति को गंभीर बीमारियों का डर दिखाकर अस्पताल में भर्ती होने और हजारों रुपए खर्च करने की सलाह दी जा रही है। इस पूरे सिंडिकेट में पैथोलॉजी लैब, निजी अस्पताल, दलाल और स्वास्थ्य विभाग के जिम्मेदार अफसर तक शामिल पाए गए हैं।

मातेश्वरी पैथोलॉजी लैब के संचालक रामायण सिंह ने बताया कि डॉक्टर को कमीशन जाता है।

मातेश्वरी पैथोलॉजी लैब के संचालक रामायण सिंह ने बताया कि डॉक्टर को कमीशन जाता है।

लक्षण चक्कर आने के, बीमारी बता दी लिवर-किडनी फेल की: प्रयाग अस्पताल का मामला
घूमा स्थित 'प्रयाग हॉस्पिटल' में खुद को एमबीबीएस फिजिशियन बताने वाले यूके श्रीवास्तव के पास जब गुप्त रिपोर्टर केवल चक्कर आने की शिकायत लेकर पहुंचा, तो बिना किसी गहन शारीरिक जांच के उसे पांच तरह की पैथोलॉजी जांचें लिख दी गईं। जांच के नाम पर मरीज को भयभीत करने का सिलसिला यहीं से शुरू हुआ। लगभग एक घंटे बाद पास की ही सतगुरू पैथोलॉजी लैब से रिपोर्ट आई, जिसमें मरीज को '320 काउंट' टाइफाइड होना बताया गया। हैरान करने वाली बात यह थी कि रिपोर्टर को न तो बुखार था और न ही टाइफाइड का कोई अन्य शारीरिक लक्षण।

इसके बावजूद, तथाकथित डॉक्टर ने मरीज को डराते हुए दावा किया कि:

  • उसका शुगर लेवल खतरनाक रूप से गिर चुका है।
  • पेट की आंतें आपस में चिपक रही हैं।
  • लिवर और किडनी खराब होने की कगार पर हैं।

इलाज के नाम पर रोजाना 3 बोतल ड्रिप चढ़ाने और 10 दिनों तक अस्पताल में भर्ती रहने की हिदायत दी गई, जिसका अनुमानित खर्च ₹1,000 से ₹1,200 प्रतिदिन बताया गया।

बिना डॉक्टर चल रही लैब: 7 किमी दूर मातेश्वरी पैथोलॉजी में वही धांधली
प्रयाग अस्पताल के दावे पर संदेह होने पर रिपोर्टर ने सच जानने के लिए 7 किलोमीटर दूर गढ़ स्थित 'मातेश्वरी पैथोलॉजी लैब' का रुख किया। वहां की स्थिति और भी चौंकाने वाली थी।

जनसेवा केंद्र के संचालक मनीष ने आवेदन से लेकर डॉक्टर तक के इंतजाम का दावा किया।

जनसेवा केंद्र के संचालक मनीष ने आवेदन से लेकर डॉक्टर तक के इंतजाम का दावा किया।
  • विशेषज्ञ का अभाव: लैब में कोई प्रशिक्षित डॉक्टर या पैथोलॉजिस्ट मौजूद नहीं था।
  • खुद लिया सैंपल: लैब संचालक ने खुद ही ब्लड सैंपल लिया और कुछ ही देर में जांच रिपोर्ट तैयार करके दे दी।
  • समान नतीजा: इस रिपोर्ट में भी मरीज को टाइफाइड से पीड़ित करार दे दिया गया।

दो अलग-अलग जगहों पर बिना किसी ठोस लक्षण के एक जैसी मनगढ़ंत रिपोर्ट मिलना इस बात का सीधा प्रमाण था कि क्षेत्र में फर्जी रिपोर्टिंग का एक संगठित नेटवर्क काम कर रहा है।

विशेषज्ञों का सवाल: नॉर्मल WBC काउंट पर भी टाइफाइड का डर क्यों?
मीडिया की टीम ने जब दोनों लैब्स की रिपोर्टों को भोपाल के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) डॉ. मनीष शर्मा के समक्ष रखा, तो उन्होंने रिपोर्ट के तकनीकी पहलुओं का विश्लेषण करते हुए इसे स्पष्ट धोखाधड़ी करार दिया।

प्रदूषण विभाग के बाबू रंजीत साहू ने 20 हजार मांगे और 15 दिन में एनओसी भिजवाने का दावा किया।

प्रदूषण विभाग के बाबू रंजीत साहू ने 20 हजार मांगे और 15 दिन में एनओसी भिजवाने का दावा किया।

डॉ. मनीष शर्मा (CMHO, भोपाल): "जब किसी मरीज को गंभीर टाइफाइड या इंफेक्शन होता है, तो उसके रक्त में व्हाइट ब्लड सेल्स (WBC) की संख्या बढ़ जाती है। हालांकि, इन दोनों लैब्स द्वारा दी गई रिपोर्ट में WBC का स्तर पूरी तरह सामान्य था। अगर डॉक्टर को लिवर और किडनी खराब होने का अंदेशा था, तो उन्होंने LFT (लिवर फंक्शन टेस्ट) और KFT (किडनी फंक्शन टेस्ट) की जांच क्यों नहीं लिखी? यह सीधे तौर पर मरीजों में डर पैदा करके कमाई करने का तरीका लगता है।"

स्वास्थ्य विभाग में रिश्वत का खेल: ₹20,000 में फर्जी डॉक्टर और डिजिटल सिग्नेचर
मामला सिर्फ फर्जी रिपोर्ट देने तक सीमित नहीं था। मीडिया टीम ने जब यह पड़ताल की कि ग्रामीण और अर्बन इलाकों में बिना अर्हता के पैथोलॉजी लैब्स की मंजूरियां कैसे मिलती हैं, तो प्रशासनिक भ्रष्टाचार की परतें उधड़ गईं।

रिपोर्टर पैथोलॉजी चेन का प्रतिनिधि बनकर रीवा CMHO कार्यालय पहुंचा। जांच में सामने आया कि:

  • दलालों का नेटवर्क: कार्यालय के बाहर और भीतर बिचौलिये सक्रिय हैं जो मोटी रकम के बदले बिना जांच के लाइसेंस दिलवाते हैं।
  • किराये के डॉक्टर: न्यू बस स्टैंड स्थित 'मातेश्वरी पैथोलॉजी' के संचालक रामायण सिंह से बातचीत में खुलासा हुआ कि पैथोलॉजिस्ट के डिजिटल सिग्नेचर (Digital Signature) का इस्तेमाल करने के लिए ₹20,000 प्रति महीना देना पड़ता है।

दलालों ने दावा किया कि वे स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों और नेताओं के संरक्षण में यह पूरा खेल बेखौफ चला रहे हैं।

खुफिया कैमरे में मनोज ने फाइल आगे बढ़ाने के लिए पैसों की डिमांड की थी, लेकिन जब उनसे पक्ष लिया तो वो ऐसी किसी बात से मुकर गए।

खुफिया कैमरे में मनोज ने फाइल आगे बढ़ाने के लिए पैसों की डिमांड की थी, लेकिन जब उनसे पक्ष लिया तो वो ऐसी किसी बात से मुकर गए।

बायोमेडिकल वेस्ट और एनओसी (NOC) के नाम पर वसूली
स्वास्थ्य केंद्र या लैब स्थापित करने के लिए आवश्यक अन्य सरकारी स्वीकृतियों में भी खुलेआम रिश्वत की मांग की गई:

  • प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड NOC: प्रदूषण बोर्ड के अधिकारी रंजीत साहू से जब प्रक्रिया के बारे में बात की गई, तो कथित तौर पर ₹20,000 की मांग की गई और 15 दिनों में एनओसी दिलाने का भरोसा दिया गया।
  • बायोमेडिकल वेस्ट निष्पादन: चित्रकिरण वेस्ट मैनेजमेंट के प्रतिनिधि शुभम ने प्रति माह नियम विरुद्ध ₹3,500 के शुल्क की बात स्वीकार की।

स्टिंग के बाद हड़कंप: आरोपों से मुकरे आरोपी, काटा फोन
जब मीडिया ने स्टिंग ऑपरेशन के साक्ष्यों के साथ संबंधित लोगों से उनका पक्ष जानने की कोशिश की, तो सभी ने अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ लिया:

मनीष (शिव जनसेवा केंद्र): पहले ₹30,000 में डॉक्टर उपलब्ध कराने की बात कहने वाले मनीष बाद में मुकर गए और कहा कि उनके पास कोई डॉक्टर नहीं है।
रामायण सिंह (मातेश्वरी पैथोलॉजी): डिजिटल सिग्नेचर के लिए ₹20,000 देने के दावों पर उन्होंने कहा, "मुझे कोई जानकारी नहीं है। आपकी टीम कब आई, मुझे नहीं पता।"
शुभम (चित्रकिरण वेस्ट मैनेजमेंट): महीने के ₹3,500 लेने की बात तो मानी, लेकिन अन्य सवालों पर बात टालते हुए अपने विभागाध्यक्ष (HOD) से संपर्क करने को कहा।
रंजीत साहू (प्रदूषण बोर्ड): रिश्वत मांगने और 15 दिन में एनओसी देने के सवाल सुनते ही उन्होंने फोन काट दिया।

खबर सोर्स दैनिक भास्कर 

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