रीवा पुलिस की 'रात्रिकालीन सुरक्षा' की पोल खुली, इमरजेंसी में पहुँचे फरियादी तो कौन जगाएगा पुलिस? 4 थानों का रियलिटी चेक, हथकड़ी से बंद मिले मुख्य गेट

 
cxvcv
रीवा में आधी रात रियलिटी चेक में थानों के मुख्य गेट हथकड़ी से बंद मिले, पुलिसकर्मी सोते पाए गए और मुंशी बोले शराबियों से डर लगता है।

ऋतुराज द्विवेदी,रीवा/भोपाल। विंध्य अंचल के मुख्य केंद्र रीवा शहर में आम जनता जिस पुलिस के भरोसे रात में बेफिक्र होकर सोती है, उसी पुलिस तंत्र की ज़मीनी हकीकत आधी रात को किए गए एक रियलिटी चेक में उजागर हुई है। जब शहर के प्रमुख पुलिस स्टेशनों और चौकियों का मुआयना किया गया, तो सुरक्षा देने वाली खाकी खुद गहरी नींद में सोती पाई गई।

कहीं थानों के मुख्य प्रवेश द्वारों (चैनल गेट) को सुरक्षा का बहाना बनाकर अंदर से हथकड़ियों से जकड़ दिया गया था, तो कहीं कुर्सियों व मेज को जोड़कर बिस्तर बना लिया गया था। सबसे ज्यादा हैरान करने वाली बात यह रही कि आम जनता की रक्षा करने वाली पुलिस के मुंशी खुद यह कहते नज़र आए कि "रात में शराबियों और असामाजिक तत्वों से डर लगता है, इसीलिए गेट बंद कर लेते हैं।"

शहर के थानों की ग्राउंड रिपोर्ट: जानिए कहाँ क्या मिला
शहर के सबसे व्यस्त, संवेदनशील और प्रमुख थानों में जब आधी रात के सन्नाटे के बीच स्थिति का जायज़ा लिया गया, तो जो दृश्य सामने आए वे पुलिस महकमे के दावों की धज्जियां उड़ाने के लिए काफी हैं।

कोतवाली थाना: हथकड़ी के पहरे में एफआईआर कक्ष, टेबल बना बिस्तर
शहर के हृदय स्थल में स्थित कोतवाली थाने में पहुँचते ही सबसे पहले नज़र उसके लोहे के चैनल गेट पर पड़ी। थाने का मुख्य गेट अंदर से भारी-भरकम हथकड़ी लगाकर मजबूती से बंद किया गया था। लगातार आवाज़ देने और गेट खटखटाने के बावजूद अंदर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई।

कोतवाली के चैनल गेट को हथकड़ी से बंदकर मुंशी टेबल पर सो रहा था।

कोतवाली के चैनल गेट को हथकड़ी से बंदकर मुंशी टेबल पर सो रहा था।

लगभग 15 मिनट तक लगातार प्रयास करने के बाद आरक्षक जयकरण पटेल नींद से चौंककर बाहर आए। थाने के अंदर एफआईआर कक्ष का नज़ारा और भी चौंकाने वाला था; ड्यूटी पर तैनात मुंशी अखंड प्रताप सिंह दफ़्तर की मेज पर ही गद्दा व चादर बिछाकर विश्राम फरमा रहे थे। कैमरे की रोशनी पड़ते ही वे हड़बड़ाकर उठे और बीमारी की दवा खाकर सोने का तर्क देने लगे।

चोरहटा थाना: शराबियों का खौफ बताकर बंद किया मुख्य द्वार
कोतवाली के बाद जब टीम चोरहटा थाने पहुँची, तो वहाँ भी स्थितियाँ अलग नहीं थीं। यहाँ भी मुख्य चैनल गेट को अंदर से हथकड़ी से लॉक किया गया था। ड्यूटी रूम में टेबल पर आरक्षक सूरज सिंह बेखबर सो रहे थे।
आवाज़ देने पर वे जागे जरूर, लेकिन फरियादी की बात सुनने या सीधे गेट खोलने के बजाए वे अंदर जाकर मुंशी मनोज बागरी को उठाने लगे। जब मुंशी से गेट बंद रखकर सोने की वजह पूछी गई, तो उन्होंने बेहद गैर-ज़िम्मेदाराना जवाब देते हुए कहा कि "रात के समय नशेड़ी व उपद्रवी तत्व थाने के अंदर घुसकर हमला कर सकते हैं, इसलिए सुरक्षा के मद्देनज़र गेट बंद रखना पड़ता है।"

बिछिया थाना: कुर्सियाँ जोड़कर बनाई खाट, कूलर की हवा में गर्क
बिछिया थाने के भीतर का माहौल किसी सार्वजनिक विश्रामगृह जैसा प्रतीत हो रहा था। यहाँ ड्यूटी पर तैनात मुंशी चंद्रशेखर सेन कई कुर्सियों को आपस में सटाकर उस पर लेटे हुए थे और कूलर की ठंडी हवा का आनंद लेते हुए गहरी नींद में डूबे थे।
काफी देर तक आवाज़ लगाने और दस्तक देने के बाद भी वे नींद के आगोश से बाहर नहीं आ सके। सवाल उठता है कि यदि इस दौरान कोई पीड़ित गंभीर वारदात की शिकायत लेकर पहुँचता, तो उसे तत्काल सहायता कैसे मिलती?

बिछिया थाने में मुंशी चंद्रशेखर सेन इस तरह कुर्सियों को जोड़कर सो रहे थे।

बिछिया थाने में मुंशी चंद्रशेखर सेन इस तरह कुर्सियों को जोड़कर सो रहे थे।

नया बस स्टैंड चौकी: संवेदनशील इलाके में पसरा रहा सन्नाटा
नया बस स्टैंड एक ऐसा व्यावसायिक व संवेदनशील क्षेत्र है जहाँ चौबीसों घंटे यात्रियों, बसों और आम नागरिकों की आवाजाही बनी रहती है। लेकिन जब बस स्टैंड पुलिस चौकी का निरीक्षण किया गया, तो वहाँ पूरी तरह सन्नाटा पसरा हुआ था।
चौकी के मुख्य दरवाजे पर बाहर से कुंडी लगी हुई थी और अंदर एक भी पुलिसकर्मी मौजूद नहीं था। रात के वक्त जब किसी मुसाफिर के साथ लूटपाट या झपटमारी जैसी घटना हो जाए, तो वह मदद के लिए कहाँ भटकेगा, इसका कोई जवाब मौके पर उपलब्ध नहीं था।

बस स्टैंड चौकी पर कोई पुलिसकर्मी मौजूद नहीं था। गेट भी बाहर से बंद था।

बस स्टैंड चौकी पर कोई पुलिसकर्मी मौजूद नहीं था। गेट भी बाहर से बंद था।

विश्वविद्यालय थाना: 'अकेले थे तो आँख लग गई' का बहाना
विश्वविद्यालय थाना क्षेत्र में भी मुंशी गंगा प्रसाद सेन ऑन-ड्यूटी झपकी लेते हुए पाए गए। जब उनसे इस संबंध में सवाल किया गया, तो उन्होंने स्थिति को संभालते हुए कहा कि वे सो नहीं रहे थे, बल्कि अकेले बैठे-बैठे अचानक आँख लग गई थी। हालाँकि, सुरक्षा के नाम पर गेट बंद रखने का पुराना राग उन्होंने भी अलापा।

विश्वविद्यालय थाने में मौजूद एकमात्र पुलिसकर्मी भी सोता मिला।

विश्वविद्यालय थाने में मौजूद एकमात्र पुलिसकर्मी भी सोता मिला।

जनता की सुरक्षा पर खड़े होते 5 तीखे सवाल
इस पूरे वाकये ने रीवा जिले की कानून व्यवस्था और रात्रिकालीन गश्त (Night Patrolling) के दावों पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं:

  • फरियादी कहाँ जाए? यदि आधी रात को किसी नागरिक के साथ लूट, डकैती, दुर्घटना या जानलेवा हमला हो जाए, तो क्या वह 15 से 20 मिनट तक थाने के बाहर खड़े होकर पुलिस के जगने का इंतज़ार करेगा?
  • अपराधियों से डरी खाकी? जो पुलिस बल पूरे शहर और जिले के नागरिकों को सुरक्षा देने का दम भरता है, वही पुलिस बल थाने के अंदर 'शराबियों' के डर से हथकड़ी लगाकर सोने को मजबूर क्यों है?
  • चौकी से स्टाफ नदारद क्यों? बस स्टैंड जैसी अति-संवेदनशील चौकियों को रात में लावारिस छोड़कर पुलिसकर्मी कहाँ गायब हो जाते हैं?
  • वरिष्ठ अधिकारियों की गश्त कहाँ है? क्या रीवा पुलिस कप्तान और राजपत्रित अधिकारियों (DSP/ASP) द्वारा थानों का आकस्मिक रात्रिकालीन निरीक्षण (Surprise Night Inspection) नहीं किया जाता?
  • क्या होगी कार्रवाई? ऑन-ड्यूटी टेबल पर सोने वाले और फरियादियों के लिए थाने के दरवाजे बंद करने वाले पुलिसकर्मियों पर क्या दंडात्मक कदम उठाए जाएँगे?

खाकी के इस रवैये से जनता का भरोसा कैसे कायम रहे?
किसी भी लोकतांत्रिक समाज में पुलिस स्टेशन नागरिक के लिए सुरक्षा और विश्वास का सबसे बड़ा केंद्र होता है। लेकिन रीवा शहर के प्रमुख थानों का यह नज़ारा स्पष्ट करता है कि रात्रिकालीन सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह से भगवान भरोसे चल रही है। थानों के दरवाजों पर लटकी हथकड़ियां और सोती हुई खाकी इस बात का सबूत हैं कि जब तक उच्चाधिकारी इस दिशा में सख्त कदम नहीं उठाएंगे, तब तक आम नागरिक आपात स्थिति में खुद को असहाय ही महसूस करेगा।

Related Topics

Latest News