रीवा में हड़कंप: प्रशासन की कार्रवाई से बौखलाए प्राइवेट डॉक्टर, अब हड़ताल की धमकी! फार्मासिस्टों ने भी दिखाए ठेंगा

 
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रीवा में लगातार हो रही सख्त प्रशासनिक कार्रवाई से प्राइवेट अस्पताल संचालकों और डॉक्टरों की नींद उड़ गई है। अब डॉक्टर लामबंद होकर हड़ताल की धमकी दे रहे हैं, लेकिन मेडिकल स्टोर और फार्मासिस्टों ने उनका साथ देने से साफ़ इंकार कर दिया है।

ऋतुराज द्विवेदी,रीवा/भोपाल। (राज्य ब्यूरो) मध्य प्रदेश के विंध्य क्षेत्र यानी रीवा जिले में इन दिनों स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर जबरदस्त उथल-पुथल मची हुई है। रीवा की चरमराई और लापरवाह चिकित्सा व्यवस्था से त्रस्त होकर अब आम जनता सड़कों पर उतर चुकी है। जनता के तीखे गुस्से और विरोध प्रदर्शन को देखते हुए जिला प्रशासन भी पूरी तरह से एक्शन मोड में आ गया है।

अवैध रूप से संचालित क्लीनिक, मनमाने ढंग से चल रहे प्राइवेट अस्पताल और नियमों को ताक पर रखने वाले ब्लड बैंकों पर ताबड़तोड़ छापेमारियां की जा रही हैं। प्रशासन की इस सख्त और ताबड़तोड़ कार्रवाई ने रीवा के उन तमाम प्राइवेट अस्पताल संचालकों और झोलाछाप डॉक्टरों की नींद उड़ा दी है, जो लंबे समय से मरीजों की जान और जेब के साथ खिलौड़ कर रहे थे।

कल्पना मिश्रा कांड के बाद बदला माहौल, सिस्टम के आगे झुकने को मजबूर हुए दिग्गज
रीवा की जनता में जागे इस आक्रोश की मुख्य वजह चर्चित 'कल्पना मिश्रा मौत कांड' रहा है। इस दर्दनाक घटना के बाद रीवा के आम नागरिकों ने डॉक्टरों और स्वास्थ्य विभाग की मनमानी के खिलाफ खुलकर मोर्चा खोल दिया। जनता के इस दबाव का ही असर था कि शासन-प्रशासन को झुकना पड़ा और विरोध के आगे बड़े-बड़े जिम्मेदारों को भी कार्रवाई का सामना करना पड़ा।

यहाँ तक कि प्रशासनिक दबाव और जनता के कड़े रुख के चलते रीवा के तत्कालीन डीन डॉ. सुनील अग्रवाल तक को अपने पद से हटना पड़ा था। इस हाई-प्रोफाइल मामले के बाद से ही जिला प्रशासन लगातार प्राइवेट अस्पतालों और नर्सिंग होम पर शिकंजा कस रहा है, जिससे स्वास्थ्य माफियाओं में हड़कंप मचा हुआ है।

कार्रवाई से घबराए प्राइवेट डॉक्टर करने जा रहे हैं हड़ताल, फार्मासिस्टों ने नकारा
प्रशासनिक हंटर चलने से घबराए रीवा के कई प्राइवेट अस्पताल संचालक और डॉक्टर अब एकजुट होने लगे हैं। प्रशासन के इस कड़े रुख के खिलाफ वे गोलबंदी कर रहे हैं और आने वाले एक-दो दिनों में शहर में मेडिकल हड़ताल का ऐलान करने की तैयारी में हैं।

इस हड़ताल को बड़ा रूप देने के लिए डॉक्टर शहर के विभिन्न मेडिकल संगठनों और फार्मासिस्ट संघों से लगातार संपर्क साध रहे हैं और अपना समर्थन मांग रहे हैं। हालांकि, डॉक्टरों की इस मनमानी और शोषण से पहले ही परेशान बैठे फार्मासिस्टों ने उनका समर्थन करने से साफ़ इनकार कर दिया है और उनसे पूरी तरह दूरी बना ली है।

फार्मासिस्टों ने क्यों बनाई डॉक्टरों से दूरी? अंदर की बड़ी कहानी
फार्मासिस्टों और मेडिकल स्टोर संचालकों द्वारा डॉक्टरों का साथ न देने के पीछे एक बहुत बड़ा और कड़वा सच छिपा है:

अस्पतालों के अंदर ही मेडिकल और पैथोलॉजी: रीवा के लगभग सभी बड़े प्राइवेट डॉक्टरों ने अब अपने खुद के आलीशान अस्पताल खड़े कर दिए हैं। इन अस्पतालों के भीतर ही दवा की दुकानें, पैथालॉजी लैब्स और कैंटीन तक संचालित की जा रही हैं।
दवा दुकानदारों की टूटी कमर: इन प्राइवेट अस्पतालों के डॉक्टर अपने यहां आने वाले मरीजों को बाहर की कोई भी दवा या जांच लिखने के बजाय सीधे अपने ही अस्पताल के अंदर स्थित मेडिकल स्टोर से दवाइयां और टेस्ट थमा देते हैं।
स्थानीय दुकानदारों का कारोबार ठप: डॉक्टर साहबान द्वारा मरीजों को बाहर के मेडिकल स्टोरों पर भेजना बंद कर दिए जाने की वजह से रीवा की आम दवा दुकानों और फार्मासिस्टों की आर्थिक स्थिति बिल्कुल खराब हो चुकी है। यही मुख्य वजह है कि आज जब डॉक्टर संकट में फंसे हैं, तो स्थानीय फार्मासिस्टों ने उनका समर्थन करने से हाथ खींच लिए हैं।

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