"45 हजार की रिश्वत, एमएलसी बदलने का खेल और कैमरे में कैद सच... क्या रीवा के संजय गांधी अस्पताल में ईमानदार डॉक्टरों का अकाल पड़ गया है?"

 
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रीवा: स्टिंग में फंसे रिटायर्ड डॉक्टर को फिर मिली कमान, संजय गांधी अस्पताल में नियुक्ति पर उठे सवाल | 

ऋतुराज द्विवेदी,रीवा/भोपाल। (राज्य ब्यूरो) मध्य प्रदेश के विंध्य क्षेत्र के सबसे बड़े चिकित्सा संस्थान यानी रीवा के संजय गांधी अस्पताल (SGMH) की कार्यप्रणाली एक बार फिर गंभीर चर्चा और विवादों के केंद्र में आ गई है। एक तरफ जहां अस्पताल और स्वास्थ्य विभाग में कुशल और ईमानदार चिकित्सकों की कमी का रोना रोया जाता है, वहीं दूसरी तरफ गंभीर आरोपों से घिरे और सेवानिवृत्त हो चुके दागी चिकित्सकों को मलाईदार पदों पर दोबारा बैठाया जा रहा है। ताजा मामला रीवा के एसजीएमएच से जुड़ा है, जहां एक ऐसे डॉक्टर को प्रभारी सीएमओ (CMO) नियुक्त किया गया है, जिनका पुराना रिकॉर्ड भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी के आरोपों से कलंकित रहा है।

संजय गांधी अस्पताल में दागियों की नियुक्ति पर गंभीर सवाल
रीवा स्थित संजय गांधी अस्पताल में प्रशासनिक पदों की स्थिति पहले से ही अजीब बनी हुई है। जानकारों के अनुसार, अस्पताल परिसर में पहले से ही एक दर्जन से अधिक सीएमओ पदस्थ हैं, जिन पर सुचारू व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी है। इसके बावजूद, अस्पताल में काम का बोझ कम होने या योग्य मैनपॉवर की कमी का हवाला देकर एनएचएम (NHM) के माध्यम से एक रिटायर्ड चिकित्सक को पुनः सेवा में रख लिया गया है।

क्षेत्रीय संचालक द्वारा की गई इस नियुक्ति के बाद अस्पताल अधीक्षक ने उन्हें तुरंत प्रभाव से महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंप दी। हैरानी की बात यह है कि अस्पताल के प्रशासनिक प्रमुख इस बात से पूरी तरह वाकिफ थे कि संबंधित चिकित्सक का अतीत किस तरह के विवादों से जुड़ा रहा है, फिर भी उन्हें मुख्य चिकित्सा अधिकारी (आकस्मिक चिकित्सा) का प्रभार सौंप देना विभागीय पारदर्शिता पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है।

साल 2014 का वह चर्चित स्टिंग ऑपरेशन: आरटीआई कार्यकर्ता के खुलासे
यह पूरा विवाद नया नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें वर्ष 2014 के एक सनसनीखेज खुलासे से जुड़ी हैं। आरटीआई कार्यकर्ता संजय सिंह ने इस पूरे मामले से जुड़े कई चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। वर्ष 2014 में नयागांव से जुड़ा एक मामला सामने आया था, जिसमें एक व्यक्ति ने दूसरे को चाकू मार दिया था। बताया गया कि जिसे चाकू मारा गया था, वह संबंधित आरोपी की बहन को परेशान करता था और इस दौरान चाकू के जख्म काफी गहरे थे।

इसी गंभीर मामले में मेडिकल लीगल सर्टिफिकेट (MLC) की रिपोर्ट बदलने के लिए अस्पताल में डॉ. अतुल सिंह से पियूष त्रिपाठी के साथ मुलाकात की गई थी। उस मुलाकात के दौरान डॉ. अतुल सिंह ने अपनी पर्ची पर अपना नंबर लिखकर दिया था और कहा था कि इस पर फोन पर बात करना। इसके बाद 10 फरवरी 2014 को फोन पर बातचीत हुई, जिसमें उन्होंने भारी-भरकम रकम की मांग की थी।

एमएलसी बदलने के लिए रिश्वतखोरी और पैसों का लेन-देन
फोन पर बातचीत के दौरान डॉ. अतुल सिंह ने एमएलसी बदलने के एवज में 40 से 45 हजार रुपए खर्च होने की बात कही थी और आरटीआई कार्यकर्ता को अपने घर बुलाया था। इसके बाद तय योजना और पूरी तैयारी के साथ अगले दिन यानी 11 फरवरी 2014 को संजय सिंह, डॉ. अतुल सिंह के गोड़हर स्थित आवास पर पहुंचे।

वहां पहुंचने पर डॉक्टर ने 10 से 15 हजार रुपए एडवांस के रूप में मांगे। उस समय मौके पर केवल 3 हजार रुपए ही उपलब्ध थे, इसलिए उन्होंने वही 3 हजार रुपए ले लिए और शेष राशि जल्द से जल्द देने का दबाव बनाया। बातचीत के दौरान यह भी कहा गया था कि इस काम में केवल अकेले वही नहीं हैं, बल्कि तीन-चार डॉक्टर और शामिल हैं, जिन्हें भी हिस्सा देना होगा। यह पूरा वाकया और रिश्वतखोरी कैमरे में कैद हो गई थी।

तत्कालीन जांच कमेटी और डॉ. प्रियंक शर्मा की भूमिका
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में यह मामला और भी अधिक गंभीर इसलिए बन जाता है क्योंकि डॉ. अतुल सिंह सेंगर को वर्तमान में प्रभारी सीएमओ आकस्मिक चिकित्सा बनाया गया है, और यह आदेश अस्पताल के वर्तमान अधीक्षक डॉ. प्रियंक शर्मा द्वारा ही जारी किया गया है।

आपको बता दें कि जब डॉ. अतुल सिंह रिश्वत लेते हुए कैमरे में कैद हुए थे, उस समय तत्कालीन डीन डॉ. पीसी द्विवेदी थे। इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच के लिए एक उच्च स्तरीय जांच कमेटी गठित की गई थी, जिसमें डॉ. एचपी सिंह को अध्यक्ष बनाया गया था और वर्तमान एसजीएमएच अधीक्षक डॉ. प्रियंक शर्मा स्वयं उस जांच कमेटी के सदस्य के रूप में शामिल थे। इस प्रकार डॉ. प्रियंक शर्मा को भली-भांति मालूम था कि डॉ. अतुल सिंह की पूर्व में क्या करतूतें रही हैं और उन्होंने किस तरह भ्रष्टाचार किया था। सब कुछ जानते-बूझते हुए भी उन्हें इतनी बड़ी और संवेदनशील जिम्मेदारी सौंप देना प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

अस्पताल प्रबंधन की कार्यप्रणाली और सीएमओ की भरमार
स्थानीय जानकारों और स्वास्थ्य कर्मचारियों का कहना है कि संजय गांधी अस्पताल में पदस्थ अधिकांश सीएमओ केवल कागजों पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं। भारी संख्या में अधिकारियों के मौजूद होने के बावजूद आपातकालीन सेवाओं या मरीजों की वास्तविक देखरेख में अपेक्षित सुधार देखने को नहीं मिलता है। ऐसे में, जिन डॉक्टरों के कार्यकाल पर पहले से ही प्रशासनिक लापरवाही और भ्रष्टाचार के दाग लगे हों, उन्हें पुनः महत्वपूर्ण पदों पर बैठाना आम जनता के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ के समान प्रतीत होता है। अब देखना यह होगा कि इस नई नियुक्ति के बाद उच्च प्रशासनिक अधिकारी इस मामले पर क्या रुख अपनाते हैं।

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