एक वीडियो ने खोली रीवा SGMH की पोल: कल्पना मिश्रा के लिए न्याय की मांग सही, पर अगस्त में 384 लाशें निकलने वाले इन 4 डॉक्टरों पर कब होगी FIR?

 
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कल्पना मिश्रा की मौत के बाद रीवा के संजय गांधी अस्पताल में अगस्त माह की 384 मौतों और डॉक्टरों की लापरवाही पर उठे गंभीर सवालों की विस्तृत रिपोर्ट।

ऋतुराज द्विवेदी,रीवा/भोपाल। (राज्य ब्यूरो) रीवा के एसजीएमएच और जीएमएच (GMH) अस्पतालों में लोग अपनी बीमारी का इलाज कराने और जीवन की उम्मीद लेकर पहुंचते हैं. पहले परंपरा यह थी कि परिजन अपने किसी अपने को खोने के बाद चुपचाप खामोशी से घर लौट जाते थे. कोई आवाज नहीं उठाता था, और न ही डॉक्टरों की लापरवाही को खुलकर सामने ला पाता था. लेकिन कल्पना मिश्रा की मौत और उसके बाद आए वीडियो ने लोगों को एक नई हिम्मत दी है. अब लोग यह सवाल पूछने लगे हैं कि आखिर अस्पताल में मरने वाले बाकी मरीज कौन थे और उनका क्या कसूर था?

अगस्त माह में 384 मौतें: बाकियों की आवाज क्यों नहीं उठी?

  • आंकड़े बताते हैं कि संजय गांधी अस्पताल और सुपर स्पेशलिटी तथा जीएमएच में स्थिति कितनी भयावह है।
  • अकेली अगस्त के महीने में एसजीएमएच और संबद्ध अस्पतालों में कुल 384 मरीजों ने दम तोड़ा.
  • अगस्त महीने में कल्पना मिश्रा और उनके नवजात को मिलाकर सिर्फ दो मौतें ऐसी थीं जिन पर बड़ा हंगामा हुआ और पिता धरने पर बैठे.

सवाल यह है कि बाकी जो सैंकड़ों लोग मरे, उनकी आवाज बुलंद क्यों नहीं हुई? क्या अन्य मृतकों के परिवारों को न्याय का हक नहीं है? यदि कल्पना मिश्रा के मामले में एफआईआर और सख्त कार्रवाई की मांग जायज है, तो अगस्त महीने में हुई सभी मौतों की निष्पक्ष जांच कर दोषियों पर एफआईआर क्यों नहीं होनी चाहिए?

मेडिसिन विभाग की काली करतूत और अव्यवस्था
अस्पताल का मेडिसिन विभाग सबसे बड़ा विभाग माना जाता है. यहां ओपीडी (OPD) और आईपीडी (IPD) का दबाव सबसे ज्यादा रहता है, बेडों की संख्या अधिक है और यहां डॉक्टरों की फौज भी तैनात है. इसके बावजूद सबसे ज्यादा मौतें इसी विभाग में हो रही हैं:

  • लापरवाही की इंतहा: मेडिसिन विभाग में हर सेकंड और मिनट मरीजों की लाशें बाहर निकलती हैं.
  • डॉक्टरों की गैर-मौजूदगी: जिन वरिष्ठ डॉक्टरों के अंडर में मरीज भर्ती होते हैं, वे उनकी सुध लेने कभी वार्ड में नहीं आते.
  • जूनियर डॉक्टरों का भरोसा: रात के समय कोई भी वरिष्ठ चिकित्सक मरीज को देखने नहीं आता, सारा काम केवल एसआर (Senior Residents) के भरोसे चलता है. सुबह 10 बजे के पहले डॉक्टर राउंड पर नहीं आते और तब तक कई मरीज दम तोड़ चुके होते हैं.

डॉक्टरों की लापरवाही और मरीजों की मौत के आंकड़े
मेडिसिन विभाग में पदस्थ डॉक्टरों की कार्यशैली और उनके अंडर में मरने वाले मरीजों के आंकड़े बेहद चौंकाने वाले हैं:

  • डॉ. हरिओम गुप्ता: यह तत्कालीन डीन डॉ. सुनील अग्रवाल के सबसे खास व्यक्तियों में गिने जाते रहे हैं. इसका खामियाजा मरीजों को अपनी जान देकर भुगतना पड़ा. नाम मेडिसिन विभाग में दर्ज होने के बावजूद इन्होंने शायद ही कभी वार्ड में मरीजों का हाल जाना हो. महीनों बीत जाते थे और छात्र या मरीज इनका चेहरा तक नहीं देख पाते थे. अगस्त महीने में इनके अंडर में भर्ती मरीजों में से सर्वाधिक 33 मरीजों ने अपनी जान गंवाई.
  • डॉ. अनुराग चौरसिया: यह वही चिकित्सक हैं जिनके अंडर में एक जिंदा इंसान को मृत घोषित करने का गंभीर मामला सामने आ चुका है. अगस्त माह में इनके अंडर भर्ती 23 मरीजों की मौत हुई.
  • डॉ. राकेश पटेल: इन पर आरोप है कि वे अस्पताल बहुत कम आते हैं, केवल अपनी अटेंडेंस लगाते हैं और कुछ घंटे रहकर अपने निजी अस्पताल को संभालने चले जाते हैं. इनके अंडर में भी 22 मरीजों की मौत का दाग है.
  • डॉ. पी.के. बघेल: मेडिसिन विभाग के पूर्व एचओडी (HOD) के अंडर में अगस्त के दौरान 20 मरीजों ने दम तोड़ा.

हर मिनट होती मौतें: एक दिन में 21 मौतों का रिकॉर्ड
अगस्त महीने के भीतर मौतों का सिलसिला किस कदर बेकाबू था, इसका अंदाजा इन तिथियों और समय के आंकड़ों से लगाया जा सकता है:

2 अगस्त: सुबह 9:31 और इसके ठीक एक मिनट बाद 9:32 पर दो मौतें हुईं.
3 अगस्त: इस दिन का रिकॉर्ड सबसे डरावना था जब कुल 21 मौतें हुईं. सुबह 10:22 पर एक ही झटके में 5 मौतें हुईं, 10:26 पर 2, 10:27 पर 3, दोपहर 12:23 पर 3, और इसी तरह दोपहर 12:24 से 12:33 के बीच लगातार मौतें दर्ज की गईं.
अन्य तारीखें: 6 अगस्त को रात में मौतें हुईं, 8 अगस्त को 7, 10 अगस्त को एक दिन में 19 मौतें, 12 अगस्त को 7, 13 अगस्त को 8, 17 अगस्त को 14, और 21 अगस्त को 12 मौतें दर्ज की गईं.

किस डॉक्टर के अंडर कितने मरीजों ने तोड़ा दम
प्रशासनिक और चिकित्सकीय लापरवाही के दावों को पुख्ता करते हुए विभागवार और डॉक्टरवार आंकड़ों की सूची इस प्रकार है:

  • डॉ. हरिओम गुप्ता: 33 मौतें
  • डॉ. अनुराग चौरसिया: 23 मौतें
  • डॉ. राकेश पटेल: 22 मौतें
  • डॉ. पी.के. बघेल: 20 मौतें
  • डॉ. के.एस. कपूर: 15 मौतें
  • डॉ. मनोज इंदूरकर: 15 मौतें
  • डॉ. प्रदीप निगम: 08 मौतें
  • डॉ. एम.एच. उस्मानी: 02 मौतें

(नोट: यह सभी आंकड़े मरीजों के अस्पताल में एडमिशन और मौत के रिकॉर्ड पर आधारित हैं।)

निष्कर्ष और जनमानस की मांग
कल्पना मिश्रा की मौत ने रीवा की स्वास्थ्य व्यवस्था का पर्दाफाश कर दिया है. रीवा और पूरे विंध्य की जनता अब यह मांग कर रही है कि न्याय केवल एक वायरल वीडियो वाले मामले तक सीमित न रहे. यदि कल्पना के मामले में एफआईआर और जांच हो रही है, तो अगस्त महीने में दम तोड़ने वाले सभी 384 मरीजों के मामलों की भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए. डॉक्टरों की इस बेलगाम लापरवाही पर लगाम कसना अब बेहद जरूरी हो गया है ताकि आगे कोई गरीब मरीज अस्पताल के कमरों में बेसहारा न मरे.

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