रीवा के सबसे बड़े अस्पताल में अंधेर नगरी: पार्किंग से लेकर जांच पर्ची तक महाघोटाला, बाबू जितेश और राजू कर्चुली का 25 हजारी खेल बेनकाब! कलेक्टर साहब, अब तो जागिए
ऋतुराज द्विवेदी, रीवा/भोपाल। मध्य प्रदेश के विंध्य क्षेत्र का सबसे बड़ा चिकित्सा केंद्र, संजय गांधी स्मृति चिकित्सालय (SGMH), इन दिनों मरीजों के इलाज के लिए कम और प्रशासनिक भ्रष्टाचार के नित नए कारनामों के लिए ज्यादा चर्चा में है। अस्पताल परिसर में आने वाले गरीब, लाचार मरीजों और उनके परिजनों की जेब पर पिछले दो वर्षों से सरेआम डकैती डाली जा रही है।
चौंकाने वाला और बेहद गंभीर तथ्य यह है कि अस्पताल परिसर के भीतर संचालित हो रही विशाल पार्किंग का कोई आधिकारिक ठेका या वैध टेंडर पिछले दो साल से हुआ ही नहीं है। इसके बावजूद, हर दिन हजारों वाहनों से लाखों रुपए की अवैध वसूली धड़ल्ले से की जा रही है। इसे प्रशासनिक लापरवाही कहें या फिर अधिकारियों की मौन सहमति, लेकिन इस 'गुंडा टैक्स' रूपी वसूली से सीधे तौर पर जनता को लूटा जा रहा है।
रीवा SGMH में बिना टेंडर कैसे चल रही अवैध वसूली?
जब कोई सरकारी विभाग या अस्पताल परिसर किसी सार्वजनिक सेवा जैसे पार्किंग का संचालन करता है, तो उसके लिए बाकायदा पारदर्शी टेंडर प्रक्रिया अपनाई जाती है। टेंडर की अवधि समाप्त होने के बाद या तो नया टेंडर जारी किया जाता है या फिर उस व्यवस्था को शासकीय नियंत्रण में लिया जाता है।
लेकिन संजय गांधी अस्पताल में नियमों को पूरी तरह से ताक पर रख दिया गया है। पिछले दो सालों से बिना किसी वैध रसीद, बिना किसी सरकारी आदेश और बिना किसी वैध अनुबंध के पार्किंग का साम्राज्य चल रहा है। दूर-दराज के गांवों से अपनी जमीन-जायदाद बेचकर या कर्ज लेकर इलाज कराने आए तीमारदारों से दुपहिया वाहनों के नाम पर ₹10 से ₹20 और चार पहिया वाहनों से ₹50 तक की मनमानी वसूली की जा रही है। यदि कोई तीमारदार रसीद मांगता है या पैसे देने से मना करता है, तो उसके साथ गाली-गलौज और अभद्रता की जाती है।
अधिकारी बने ठेकेदार: बाबू जितेश रावत और राजू करचूली का खेल
अस्पताल के भीतर चल रहे इस काले कारोबार की जड़ें बेहद गहरी हैं। अस्पताल के ही पुख्ता सूत्रों ने नाम न छापने की शर्त पर एक बेहद सनसनीखेज खुलासा किया है। सूत्रों का कहना है कि इस पूरे सिंडिकेट में "अधिकारी ठेकेदार बन चुके हैं और ठेकेदार खुद को अधिकारी समझ रहे हैं।"
इस पूरे अवैध साम्राज्य को संरक्षण देने का मुख्य आरोप अस्पताल प्रबंधन से जुड़े एक रसूखदार बाबू जितेश रावत पर लग रहा है। अंदरखाने की पुख्ता खबर है कि इस अवैध दुकान को बिना किसी बाधा के चलाने और टेंडर की फाइलों को ठंडे बस्ते में दबाए रखने के लिए हर महीने ₹25,000 की मोटी रकम (कमीशन) सीधे तौर पर इस बाबू तक पहुंचाई जा रही है। जमीन पर इस पूरी अवैध वसूली का जिम्मा राजू करचूली नामक व्यक्ति के हाथों में है, जो बिना किसी वैधानिक अधिकार के जनता से मनमाना पैसा वसूल रहा है।
क्या डीन डॉ. सुनील अग्रवाल और अधीक्षक राहुल मिश्रा के संरक्षण में हो रहा खेल?
इस महाघोटाले की आंच अब श्याम शाह मेडिकल कॉलेज और अस्पताल के शीर्षतम अधिकारियों तक भी पहुंचती दिखाई दे रही है। रीवा की जनता और पीड़ित मरीज अब सीधे तौर पर श्याम शाह मेडिकल कॉलेज, रीवा के डीन डॉ. सुनील अग्रवाल (Dr. Sunil Agrawal, Dean Shyam Shah Medical College, Rewa) और अस्पताल के अधीक्षक डॉ. राहुल मिश्रा पर तीखे सवाल उठा रहे हैं।
बड़ा सवाल: क्या यह पूरा खेल डीन डॉ. सुनील अग्रवाल और अधीक्षक राहुल मिश्रा के संरक्षण में हो रहा है? या फिर इन शीर्ष अधिकारियों को हर महीने इस अवैध वसूली से मोटी रकम पहुंचाई जा रही है, जिसके कारण वे कुंभकर्णी नींद सो रहे हैं?
खुलेआम सिस्टम की धज्जियां उड़ाकर की जा रही इस वसूली की कहानी बयां करती है कि बिना उच्च अधिकारियों की शह और बंधी-बंधाई रकम के दो साल तक इतना बड़ा अवैध धंधा रीवा के सबसे बड़े अस्पताल परिसर के भीतर कतई नहीं चलाया जा सकता। इसके साथ ही, अस्पताल प्रबंधन और इस पूरे ताने-बाने से जुड़े सुनील अग्रवाल (DN) का नाम भी इस खेल में सामने आ रहा है। चर्चाएं आम हैं कि क्या सुनील अग्रवाल भी इस सिंडिकेट का हिस्सा हैं? क्या उन्हें भी हर महीने इस अवैध वसूली से मोटी रकम पहुंचाई जा रही है? यह जांच का एक बेहद गंभीर विषय है, क्योंकि बिना उच्च अधिकारियों की शह के दो साल तक इतना बड़ा अवैध धंधा खुलेआम नहीं चलाया जा सकता।
केंद्रीय पंजीयन और जांच पर्ची में भी बिना टेंडर लाखों का खेल
संजय गांधी अस्पताल में भ्रष्टाचार की कहानी सिर्फ पार्किंग तक ही सीमित नहीं है। सूत्रों ने एक और बड़े वित्तीय घोटाले की ओर इशारा किया है। अस्पताल में आने वाले मरीजों के लिए जो केंद्रीय पंजीयन (Registration Counter) और विभिन्न प्रकार की जांचों की पर्चियां कटती हैं, उसके प्रबंधन और संचालन का टेंडर भी लंबे समय से अटका हुआ है।
बिना किसी वैध टेंडर और रिन्यूअल के, प्रत्येक महीने लाखों रुपए का भुगतान किया जा रहा है। यह सीधे तौर पर सरकारी राजस्व को चूना लगाने और चहेतों को फायदा पहुंचाने का मामला है। खुलेआम सिस्टम की धज्जियां उड़ाकर की जा रही इस 'ऑफ-द-रिकॉर्ड' कमाई ने अस्पताल को भ्रष्टाचार का अड्डा बना दिया है।
पार्किंग स्थल बना अपराधियों का अड्डा: मारपीट और शराबखोरी आम
बिना टेंडर और बिना किसी प्रशासनिक निगरानी के चल रही इस पार्किंग का माहौल पूरी तरह से अराजक हो चुका है। यहाँ राजू करचूली और उसके अवैध कारिंदों का बोलबाला है। आए दिन पार्किंग स्थल पर मरीजों के परिजनों के साथ मारपीट, गाली-गलौज की घटनाएं हो रही हैं।
इतना ही नहीं, अस्पताल परिसर के भीतर सुरक्षा व्यवस्था को ठेंगा दिखाते हुए इस पार्किंग एरिया में देर रात शराबखोरी, जुआ और असामाजिक तत्वों का जमावड़ा लगा रहता है। अस्पताल जैसी संवेदनशील जगह पर, जहाँ लोग जिंदगी और मौत की लड़ाई लड़ रहे होते हैं, वहाँ इस तरह का आपराधिक माहौल प्रशासन की मुस्तैदी पर एक बहुत बड़ा तमाचा है।
रीवा कमिश्नर और कलेक्टर से जनता के तीखे सवाल
रीवा में अब यह मामला पूरी तरह से तूल पकड़ चुका है। सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक जनता में भारी आक्रोश है। अब सीधे तौर पर मप्र के स्वास्थ्य मंत्री, रीवा कमिश्नर और रीवा कलेक्टर की कार्यप्रणाली पर उंगलियां उठ रही हैं।
जनता की मुख्य मांगें:
- तत्काल रोक: इस अवैध पार्किंग और जांच पर्ची के खेल को तुरंत प्रभाव से बंद किया जाए।
- रिकवरी की जाए: पिछले 2 वर्षों में जनता से जितनी भी अवैध वसूली की गई है, उसका सही आकलन करके दोषियों की संपत्ति से उसकी रिकवरी की जाए।
- (FIR) दर्ज हो: बाबू जितेश रावत, राजू करचूली, और संलिप्त पाए जाने पर सुनील अग्रवाल व उच्च अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मामला दर्ज कर उन्हें जेल भेजा जाए।
क्या रीवा का जिला प्रशासन इस सिंडिकेट को बेनकाब करने का साहस दिखा पाएगा, या फिर हमेशा की तरह फाइलें दबा दी जाएंगी?