TI मेरे रिश्तेदार हैं; SP बैचमेट : 72 घंटे बाद भी विश्वविद्यालय थाना प्रभारी और एक पत्रकार पर FIR दर्ज नहीं, सुसाइड नोट के वो 5 पन्ने जो व्यवस्था को नंगा करते हैं 

 
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रीवा में शिक्षक अनिल तिवारी ने प्रताड़ना से तंग आकर आत्महत्या की कोशिश की। विश्वविद्यालय TI और पत्रकार निशांत मिश्रा पर FIR न होने से परिवार में आक्रोश।

ऋतुराज द्विवेदी,रीवा/भोपाल। मध्य प्रदेश के रीवा जिले से एक ऐसी झकझोर देने वाली घटना सामने आई है जिसने न केवल कानून व्यवस्था, बल्कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ कहे जाने वाले मीडिया के एक हिस्से को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है। रीवा के विश्वविद्यालय थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले एक सरकारी शिक्षक अनिल कुमार तिवारी वर्तमान में संजय गांधी मेमोरियल अस्पताल के आईसीयू (ICU) में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे हैं। आरोप सीधे तौर पर स्थानीय विश्वविद्यालय थाना प्रभारी (TI) हितेंद्रनाथ शर्मा और एक कथित रसूखदार पत्रकार निशांत मिश्रा उर्फ अंकित पर हैं। खाकी और रसूख के इस जानलेवा कॉकटेल ने एक साफ-सुथरी 28 साल की नौकरी वाले शिक्षक को इस कदर तोड़ दिया कि उन्होंने पहले अपनी नस काटी और फिर अस्पताल के भीतर ही जहर खा लिया।

जमीन विवाद से शुरू हुआ प्रताड़ना का खेल: पूरी क्रोनोलॉजी
इस पूरे खूनी खेल की शुरुआत शिक्षक अनिल कुमार तिवारी की निजी जमीन पर लगे एक पेड़ की कटाई के विवाद से हुई थी। चश्मदीदों और परिजनों के मुताबिक, कथित पत्रकार निशांत मिश्रा और उसका परिवार दबंगई के बल पर शिक्षक की जमीन पर कब्जा करना चाहता था और वहां लगे पेड़ काट रहा था। जब एक सम्मानित शिक्षक ने अपनी ही संपत्ति पर हो रहे इस अवैध कृत्य का विरोध किया, तो पत्रकारिता की धौंस दिखाते हुए निशांत मिश्रा ने उन्हें अंजाम भुगतने की धमकी दी।

बात सिर्फ धमकी तक नहीं रुकी। कथित पत्रकार ने अपने राजनैतिक और प्रशासनिक संपर्कों का इस्तेमाल कर विश्वविद्यालय थाने में शिक्षक के खिलाफ एक सोची-समझी साजिश के तहत फर्जी मुकदमा दर्ज करवा दिया। पुलिस ने बिना किसी निष्पक्ष जांच के, केवल एकतरफा रसूख के दबाव में आकर शिक्षक और उनके परिवार पर ही केस लाद दिया। थाने बुलाकर शिक्षक को मानसिक रूप से इस कदर प्रताड़ित और अपमानित किया गया कि उनका आत्मसम्मान पूरी तरह बिखर गया।

'टीआई पुलिस नहीं जल्लाद है' - सुसाइड नोट के वो 5 पन्ने जो व्यवस्था को नंगा करते हैं
गुरुवार सुबह आत्मघाती कदम उठाने से पहले शिक्षक अनिल कुमार तिवारी ने पांच पन्नों का एक विस्तृत सुसाइड नोट लिखा था। यह सुसाइड नोट रीवा पुलिस की कार्यप्रणाली पर एक ऐसा बदनुमा दाग है जिसे धोना नामुमकिन होगा। शिक्षक ने अपने सुसाइड नोट में सीधे तौर पर विश्वविद्यालय थाना प्रभारी हितेंद्रनाथ शर्मा को अपनी मौत का जिम्मेदार ठहराया है।

    "मैंने आज तक अपने पूरे जीवन और 28 वर्ष की शासकीय सेवा में कोई अपराध नहीं किया। मेरी साफ-सुथरी नौकरी पर थाना प्रभारी ने पैसे लेकर दाग लगा दिया। उसे पुलिस की वर्दी में नहीं, बल्कि एक जल्लाद होना चाहिए था।" - शिक्षक अनिल कुमार तिवारी (सुसाइड नोट से अंश)

सुसाइड नोट में यह भी खुलासा हुआ है कि आरोपी निशांत मिश्रा खुद को एसपी गुरकरण सिंह का बैचमेट और टीआई हितेंद्रनाथ शर्मा को अपना सगा रिश्तेदार बताता था। शिक्षक के भाई धीरेंद्र तिवारी के अनुसार, आरोपी ने सरेआम शिक्षक को जलील करते हुए कहा था, "मेरे जूते पर अपनी नाक रगड़ो, तभी पुलिस केस से माफी मिलेगी।" इसके अलावा, नोट में परमानंद मिश्रा के फौजी बेटे द्वारा शिक्षक को सरेआम गोली मारने की धमकी देने का भी स्पष्ट उल्लेख है। शिक्षक ने देश के प्रधानमंत्री, केंद्रीय गृह मंत्री और मानवाधिकार आयोग से इस पूरे नेक्सस की सीबीआई (CBI) जांच कराने की गुहार लगाई है।

अस्पताल के बाहर 45 डिग्री में बिलखता परिवार: सामूहिक आत्मदाह की चेतावनी

एक तरफ जहां संजय गांधी अस्पताल के भीतर शिक्षक अनिल तिवारी वेंटिलेटर पर जिंदगी की जंग लड़ रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ रीवा की झुलसा देने वाली 45 डिग्री की भीषण गर्मी में उनका पूरा परिवार पिछले 48 घंटों से अस्पताल के बाहर खुले आसमान के नीचे अन्न-जल त्याग कर बैठा है।

शिक्षक की पत्नी और बेटी प्रिया तिवारी का रो-रोकर बुरा हाल है। बेटी प्रिया ने प्रशासन को सीधे शब्दों में चेतावनी देते हुए कहा है:

    "अगर मेरे पिता को इस मानसिक प्रताड़ना का न्याय नहीं मिला, अगर उस भ्रष्ट टीआई और फर्जी पत्रकार को जेल नहीं भेजा गया, तो हमारा पूरा परिवार अस्पताल के सामने ही सामूहिक रूप से अपनी जान दे देगा। इस सामूहिक आत्महत्या की जिम्मेदार सिर्फ और सिर्फ रीवा पुलिस होगी।"

हैरत की बात यह है कि जब शिक्षक को गुरुवार को नस काटने के बाद अस्पताल लाया गया था, तो होश आते ही उन्होंने अपने बेटे से पूछा था, "क्या हमारी फरियाद किसी ने सुनी? उन पर कोई कार्रवाई हुई?" जब बेटे ने रोते हुए कहा कि पुलिस ने अब तक कोई एफआईआर नहीं की है, तो हताशा और गहरे सदमे में आकर शिक्षक ने आईसीयू के भीतर ही दोबारा जहर खा लिया। जहर अब उनके पूरे शरीर में फैल चुका है और स्थिति अत्यंत नाजुक बनी हुई है।

रीवा पुलिस की संदिग्ध भूमिका: 72 घंटे बाद भी FIR क्यों नहीं?

घटना को 72 घंटे से अधिक का समय बीत चुका है, शिक्षक का पांच पन्नों का सुसाइड नोट सोशल मीडिया पर वायरल है, पीड़ित जिंदगी और मौत के बीच वेंटिलेटर पर है, लेकिन रीवा पुलिस के हाथ अब तक खाली हैं। न तो आरोपी कथित पत्रकार निशांत मिश्रा की गिरफ्तारी हुई है और न ही उस थाना प्रभारी पर कोई दंडात्मक कार्रवाई हुई है जिसने कानून को अपनी जागीर समझ रखा था। 

रीवा पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका का पूरा सच
इस पूरे मामले में रीवा पुलिस और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका पूरी तरह संदेहास्पद और पक्षपाती नजर आ रही है। घटना को 72 घंटे से अधिक बीत जाने के बाद भी आरोपियों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं होना पुलिस की कार्यप्रणाली पर सीधे सवाल खड़े करता है।

विश्वविद्यालय थाना प्रभारी हितेंद्रनाथ शर्मा इस पूरे मामले में अपनी सफाई देते हुए अजीब तर्क दे रहे हैं। उनका कहना है कि पुलिस एक स्वतंत्र एजेंसी के रूप में कार्य करती है और वे बिना किसी बाहरी दबाव के अपनी जिम्मेदारी निभाते हैं। उनके मुताबिक, यदि कोई व्यक्ति थाने में शिकायत लेकर आता है तो उसे दर्ज करना पुलिस का कानूनी दायित्व होता है। टीआई शर्मा ने दावा किया है कि उन्होंने शिक्षक या उनके परिवार को किसी भी तरह से परेशान नहीं किया है, जबकि शिक्षक का पांच पन्नों का सुसाइड नोट सीधे तौर पर उनके इस दावे को खारिज करता है।

दूसरी तरफ, रीवा के पुलिस अधीक्षक (SP) गुरकरण सिंह का इस मामले पर कहना है कि दूसरे पक्ष यानी कथित पत्रकार की शिकायत के आधार पर पुलिस ने शुरुआती तौर पर एकतरफा कार्रवाई करते हुए शिक्षक के परिवार पर ही केस दर्ज कर लिया था। अब पीड़ित परिवार की शिकायत और शिक्षक के आत्मघाती कदम उठाने के बाद, पुलिस प्रशासन होश में आया है। एसपी ने दोनों पक्षों के बिंदुओं को गंभीरता से लेते हुए मामले की आंतरिक जांच बैठा दी है। उनका कहना है कि जांच रिपोर्ट के आधार पर ही आगे की वैधानिक और दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी।

इसके अलावा, फरार आरोपी कथित पत्रकार निशांत मिश्रा ने खुद को एसपी का बैचमेट और टीआई का रिश्तेदार बताकर जिस तरह शिक्षक पर अपने जूते पर नाक रगड़ने का दबाव बनाया, वह रीवा में पनप रहे 'अपराधी-पुलिस नेक्सस' का जीता-जागता सबूत है। पुलिस का ढुलमुल रवैया साफ दर्शाता है कि विभाग अपने ही एक दागी अधिकारी और रसूखदार अपराधी को बचाने की पुरजोर कोशिश कर रहा है।

पुलिस का यह ढुलमुल रवैया साफ दर्शाता है कि विभाग अपने ही एक दागी अधिकारी और रसूखदार अपराधी को बचाने की पुरजोर कोशिश कर रहा है। क्या एक सरकारी शिक्षक का सुसाइड नोट और उसकी मरणासन्न स्थिति भी रीवा पुलिस को जगाने के लिए काफी नहीं है

कलेक्टर नरेंद्र सूर्यवंशी के सख्त तेवर: आधी रात को हिला प्रशासनिक अमला

जब यह पूरा मामला रीवा कलेक्टर नरेंद्र सूर्यवंशी के संज्ञान में आया, तो उन्होंने इस पर कड़ा रुख अख्तियार किया। देर रात ही कलेक्टर ने एक्शन मोड में आते हुए जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) रामराज मिश्रा और ब्लॉक एजुकेशन ऑफिसर (BEO) को कॉन्फ्रेंस कॉल पर लिया और पूरे घटनाक्रम की विस्तृत रिपोर्ट तलब की।

कलेक्टर के निर्देश पर जिला शिक्षा अधिकारी रामराज मिश्रा और सहायक संचालक राजेश मिश्रा तुरंत आधी रात को संजय गांधी मेमोरियल अस्पताल पहुंचे। उन्होंने आईसीयू के बाहर बैठे पीड़ित परिवार से मुलाकात की और शिक्षक के इलाज की व्यवस्थाओं का जायजा लिया। सूत्रों के अनुसार, कलेक्टर नरेंद्र सूर्यवंशी ने विश्वविद्यालय थाना प्रभारी को फोन पर बेहद कड़ी हिदायत देते हुए कहा है कि इस मामले में किसी भी स्तर पर लीपापोती बर्दाश्त नहीं की जाएगी। यदि जांच में शिक्षक के खिलाफ दर्ज की गई एफआईआर फर्जी पाई जाती है, तो पुलिस विभाग के संबंधित अधिकारियों पर भी गाज गिरना तय है।

रक्षक ही जब भक्षक बन जाएं तो न्याय कहां मांगे जनता?

रीवा की यह घटना मध्य प्रदेश शासन के 'सुशासन' के दावों की धज्जियां उड़ाती है। जब एक शासकीय शिक्षक, जो समाज को दिशा देता है, वह खुद को कानून के रखवालों और रसूखदारों के आगे इतना असहाय पाता है कि उसे मौत को गले लगाना बेहतर लगता है, तो आम जनता की सुरक्षा भगवान भरोसे ही है।

कलेक्टर की सख्ती के बाद अब देखना यह होगा कि क्या रीवा पुलिस अपने ही महकमे के टीआई हितेंद्रनाथ शर्मा और कथित पत्रकार निशांत मिश्रा के खिलाफ धारा 306 (आत्महत्या के लिए उकसाना) या संबंधित धाराओं के तहत तत्काल मामला दर्ज कर उन्हें जेल भेजती है, या फिर यह मामला भी फाइलों में दबा दिया जाएगा। रीवा के समस्त शिक्षक संगठनों में इस घटना को लेकर भारी आक्रोश है और यदि जल्द ही न्याय नहीं मिला, तो यह आक्रोश एक बड़े जन-आंदोलन का रूप ले सकता है।

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