UGC मुद्दे पर रीवा में महा-बवाल: पुतलों की तेरहवीं और बरसी की तैयारी, प्रयागराज में पिंडदान कर विरोधियों पर साधा निशाना

 
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मध्य प्रदेश के रीवा में यूजीसी के प्रस्तावित रोलबैक के विरोध में सवर्ण समाज ने पुतलों का अंतिम संस्कार कर प्रयागराज में उनकी अस्थियों का विसर्जन किया है।

ऋतुराज द्विवेदी,रीवा/भोपाल। (राज्य ब्यूरो) मध्य प्रदेश के ऐतिहासिक शहर रीवा से एक बेहद चौंकाने वाला और अनूठा मामला सामने आया है, जिसने राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में हलचल मचा दी है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के प्रस्तावित रोलबैक को लेकर स्थानीय स्तर पर विरोध के जो तरीके अपनाए जा रहे हैं, वे सामान्य प्रदर्शनों से बिल्कुल अलग हैं। यहां सवर्ण समाज के लोगों ने यूजीसी के पक्ष में खड़े रहने वाले विचारकों और समर्थकों के विरोध में एक अनूठी और प्रतीकात्मक पहल की है। इस खबर के माध्यम से आइए विस्तार से जानते हैं कि किस तरह से रीवा में इस विरोध को एक नया और आक्रामक रूप दिया गया है।

सवर्ण नेताओं की अस्थियां विसर्जित करते प्रदर्शनकारी।

सवर्ण समाज का अनूठा कदम: पुतलों का सांकेतिक अंतिम संस्कार और प्रयागराज कूच
प्रदर्शनकारियों ने अपने विरोध को प्रशासन और नीति निर्माताओं तक जोरदार तरीके से पहुंचाने के लिए अनोखा रास्ता चुना। रीवा में सवर्ण समाज की ओर से उन लोगों के विरोध में पुतलों का सांकेतिक अंतिम संस्कार किया गया, जो यूजीसी के इस प्रस्ताव का समर्थन कर रहे थे। पुतलों के दहन के बाद मामला यहीं नहीं थमा, बल्कि प्रदर्शनकारी उन पुतलों की जली हुई अस्थियों को सहेजकर सीधे उत्तर प्रदेश के पवित्र तीर्थ स्थल प्रयागराज के लिए रवाना हो गए। इस दौरान यह पूरा घटनाक्रम शहरभर में चर्चा का विषय बन गया और हर कोई इस अनोखे विरोध के तौर-तरीकों की चर्चा करता नजर आया।

मोहित चौबे और प्रशांत सिंह के तीखे तेवर
इस पूरे विरोध प्रदर्शन के दौरान समाज के प्रमुख प्रतिनिधियों ने खुलकर अपनी बात रखी और सरकार को अपनी ताकत का अहसास कराया। मोहित चौबे ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यूजीसी के प्रस्तावित रोलबैक को लेकर समाज का यह कड़ा विरोध थमने वाला नहीं है। उन्होंने कहा कि पुतलों का सांकेतिक अंतिम संस्कार करना और उनकी अस्थियों को लेकर प्रयागराज की यात्रा करना इसी व्यापक आंदोलन का हिस्सा है। प्रशांत सिंह ने भी इस मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि सरकार और प्रशासन को जनता की भावनाओं और मांगों को हल्के में नहीं लेना चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि समय रहते उचित कदम नहीं उठाए गए, तो इस तरह के विरोध प्रदर्शनों को और अधिक तीव्र किया जाएगा।

कर्मकांड, तेरहवीं और बरसी जैसी पारंपरिक रस्मों की तैयारी
इस अनोखे आंदोलन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे पूरी तरह से पारंपरिक और रीति-रिवाजों के सांचे में ढाल दिया गया है। आयोजकों और प्रदर्शनकारियों का कहना है कि जिस प्रकार किसी मनुष्य की मृत्यु के पश्चात पारंपारिक और धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं, ठीक उसी प्रकार इस सांकेतिक विरोध के तहत आगे के सभी संस्कार भी पूरे विधि-विधान के साथ संपन्न किए जाएंगे। उनके अनुसार आने वाले दिनों में निर्धारित परंपरा के तहत कर्मकांड, तेरहवीं, और बरसी जैसे कार्यक्रम भी आयोजित किए जाएंगे, ताकि इस विरोध की गूंज बहुत दूर तक सुनाई दे सके।

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प्रयागराज में गंगा नदी के तट पर अस्थि विसर्जन और पिंडदान
जब रीवा से प्रदर्शनकारियों का जत्था पुतलों की अस्थियां लेकर प्रयागराज पहुंचा, तो वहां भी धार्मिक और पौराणिक मान्यताओं का पूरी तरह से पालन किया गया। प्रयागराज में गंगा नदी के तट पर पहुंचकर इन अस्थियों का विधिवत विसर्जन किया गया और साथ ही पिंडदान की प्रक्रिया को भी पूरा किया गया। प्रदर्शनकारियों का मुख्य उद्देश्य इस प्रतीकात्मक विधि के जरिए अपनी बात को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से रखना था, ताकि शासन और प्रशासन का ध्यान इस गंभीर सामाजिक मुद्दे की ओर आकर्षित हो सके।

रीवा में लगातार बढ़ रहा विरोध और आगे की रणनीति
रीवा जिले में यूजीसी के इस मुद्दे को लेकर लगातार अलग-अलग स्थानों पर बैठकें और विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। आंदोलन से जुड़े लोगों का साफ तौर पर कहना है कि जब तक उनकी मांगों पर गंभीरतापूर्वक विचार नहीं किया जाता, तब तक उनका यह संघर्ष विभिन्न रूपों में जारी रहेगा। पुतलों के सांकेतिक अंतिम संस्कार से शुरू होकर प्रयागराज तक अस्थि विसर्जन का यह पूरा प्रकरण अब केवल रीवा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरे प्रदेश में तूल पकड़ता जा रहा है। आने वाले समय में इस आंदोलन का क्या परिणाम निकलता है, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन इसने प्रशासनिक अमले की नींद जरूर उड़ा दी है।

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